सरकारी की हडबड़ी और चुनाव सुधार बिल
संपादकीय@हरेश पंवार- हाल ही में चल रहे शीतकालीन सत्र में सरकार द्वारा चुनाव सुधार बिल पास कराने को लेकर सरकार की हड़बड़ी के कई सियासी मायने निकाले जा रहे है। ऐसी ही हड़बड़ी में बनाए गए कृषि कानूनों ने सरकार को कितनी असुविधाजनक स्थिति में डाला और कैसे कृषि सुधार के अजेंडे को पीछे की ओर धकेल दिया, यह सब देख चुके हैं। चुनाव सुधार बिल में बरती गई हड़बड़ी के सदंर्भ में मैं बोलूगां तो फिर कहोगें कि बोलता है। आधार नंबर को वोटर आईडी कार्ड से जोड़ने की बात जब से शुरू हुई है, तभी से इसके संभावित दुरुपयोग की आशंकाएं जताई जा रही हैं। इन्हीं आशंकाओं की वजह से इसका विरोध भी देखा जा रहा है। 2015 में चुनाव आयोग की तरफ से आधार डेटा के सहारे मतदाता सूची से फर्जी नाम हटाने और दोहराव मिटाने का एक पायलट प्रॉजेक्ट शुरू किया गया था। मगर सुप्रीम कोर्ट ने इस पहल पर रोक लगा दी थी। हालांकि मौजूदा विधेयक में आधार नंबर को वोटर आईडी कार्ड से जोड़ने की व्यवस्था को ऐच्छिक रखा गया है और इसी आधार पर सरकार इसके विरोध को अनावश्यक बता रही है, लेकिन इससे उस हड़बड़ी का औचित्य नहीं साबित होता जो बिल पास करने में दिखाई गई है। राज्...