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शिक्षा में सुधार के लिए तबादला पॉलिसी बनना क्यों जरूरी?

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संपादकीय-@एडवोकेट हरेश पंवार  29दिसम्बर2024  *शिक्षा में सुधार के लिए तबादला पॉलिसी बनना क्यों जरूरी?*  शिक्षा विभाग में तबादले की खबर आते ही हलचल सी मच जाती है। दूरदराज़ के जिलों में बैठे शिक्षक लोग अपने गृह जिले में आने को आतुर हो जाते हैं, तो दूसरी और खुद के गृह जिले में बैठी शिक्षक लॉबी सरकार के पक्षधर नेताओं के यहां चिलम भरना शुरू कर देते हैं। जैसे ही सरकार बदलती है वैसे ही कुछ तथाकथित शिक्षक नेता अपनी चिलम की साफ़ी झाड़कर गिरगिट की तरह रंग बदलने  में देर नहीं करते हैं। क्योंकि उन्हें सबसे बड़ा जो डर सताता है। वह जानता है कहीं उसका तबादला ना हो जाए। इस बात को लेकर कई शिक्षक तो नेताओं के प्रवक्ता तक बने हुए हैं । उनके प्रचार प्रसार और कार्यक्रमों के आयोजनों के लिए व्यवस्थापक बने हुए हैं। वे चंदा उगाई के तो मास्टरमाइंड पॉलिसी मेकर है। ताजूब की बात तो यह है कि कई मास्टरमाइंड शिक्षकों के तो तबादले ही नहीं होते हैं। सरकार किसी की भी आ जाए, उन्हें कोई छेड़ता ही नहीं। आखिर चुनाव के परिणाम आते ही वे रंग बदलू दुपट्टा गले में डालकर सरकार के प्रतिनिधि नेताओं के...

अंबेडकर को लेकर गृहमंत्री के पेट में दर्द क्यों?

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संपादकीय@एडवोकेट हरेश पंवार  दिनांक 22दिसम्बर2024 *अंबेडकर को लेकर गृहमंत्री के पेट में दर्द क्यों?*  खैर, खासी, खुशी, बैर, प्रीत, मदपान।  ये छुपाए, न छुपे, जानत सकल जहान।।  जैसा भाव मन के अंदर पलवित होता है। वैसी भाव मुद्राएं अंकुरित होकर अक्सर चेहरे पर उभर कर सामने आ ही जाती है। सालों साल से अंबेडकर विचारधारा से बौखलाई बैठे भाजपा पौषित अमित शाह के पेट में ऐसे दर्द उठा कि वे अपनी जुबान से ज़हर ही उगलने लगे। और उनके अंदर की सारी गंदगी उनकी जुबान पर देखी गई । अंबेडकर को लेकर देश की संसद में गृहमंत्री अमित शाह ने जो शर्मनाक टिप्पणी करते हुए उनकी जो बौखलाहट देखने को मिली। ऐसी स्थिति में मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।  अंबेडकर  देश की भावनाओं का दर्पण है। जिनके प्रति श्रद्धा के भाव है। आज अंबेडकर घट-घट के वासी हैं। हर-घर अंबेडकर है। आस्था और विश्वास के प्रतीक अंबेडकर हैं। गरीबों के मसीहा, दलितों के दातार और नारी मुक्ति के दाता हैं  अंबेडकर,मानवता के इफाजक ओर तो ओर,अंधों की आंख, गुगों की जुबान, बहरों के कान, और भारत के संविधान है अंबेडकर।...