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Showing posts from February, 2025

सच का तमाशा और झूठ की तारीफ

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संपादकीय  28 फरवरी 2025।   *सच का तमाशा और झूठ की तारीफ*  व्यर्थ का खर्चा और व्यर्थ की चर्चा जीवन की व्यवस्था और मन की अवस्था को प्रभावित करते हैं। यह एक कटु सच्चाई है जिसे हमें स्वीकार करना चाहिए। संघर्ष के अंधेरे से अपने हौसले कमजोर ना होने दें, क्योंकि समय का ग्रहण तो सूर्य और चंद्रमा भी झेलते हैं। हकीकत में तमाशा तो सच का ही होता है, हमेशा झूठ की तो तारीफ होती है। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण सच्चाई है जिसे हमें समझना चाहिए। चुगली की धार इतनी तेज होती है कि खून के रिश्तों को भी काट कर रख देती है। यह एक खतरनाक सच्चाई है जिसे हमें समझना चाहिए। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। हमें अपनी गलतियों की सज़ा अभी भले न मिले, परंतु समय के साथ कभी ना कभी अवश्य मिलती है। यह एक कटु सच्चाई है जिसे हमें स्वीकार करना चाहिए। हमारी जिंदगी में होने वाली हर चीज के जिम्मेदार हम ही होते हैं, इस बात को जितनी जल्दी मान लोगे, जिंदगी उतनी बेहतर होती जाएगी। इसलिए, हमें अपने जीवन में संघर्ष और सच्चाई का महत्व समझना चाहिए। हमें अपने हौसले कमजोर ना होने देने चाहिए और समय के साथ च...

उदामांडी की बहू अनिता कुमारी ने हिन्दी मे 98.98 प्रतिशत अंक प्राप्त कर नेट जेआरएफ में रचा डाला इतिहास

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दिनांक 28 फरवरी 2025@एडवोकेट हरेश पंवार।  *उदामांडी की बहू अनिता कुमारी ने हिन्दी मे 98.98 प्रतिशत अंक प्राप्त कर नेट जेआरएफ में रचा डाला इतिहास*  *अच्छा घर या अच्छा वर मिले तो नाम रोशन कर सकती हैं बेटियां*  अनिता कुमारी के जज्बे के सफरनामें से उद्धरण- "नौ वीं में पढ़ते पढ़ते बड़ी बहन के साथ हो गई थी शादी, फिर ससुराल में खेती-बाड़ी व पशुपालन के काम धंधे के कारण छूट गई पढ़ाई, फिर पति का मिला मोटिवेशन तो घूंघट की ओट में  दुबारा पढ़ाई शुरू कर दसवीं पास कर साइंस में लिया दाखिला, 12 वीं में बेटे को जन्म दिया, फिर जापें में छुट्टी गई पढ़ाई, दो बच्चों के लालन पालन और गृह संचालन के बीच सेल्फ स्टडी कर बीएसटीसी व ग्रेजुएशन किया। पति की नौकरी लग गई तो बच्चों के लालन पालन और घर गृहस्ती के संभालने की जिम्मेदारी के चलते पढ़ाई पर नहीं दिया ध्यान,11 साल बाद फिर कोरोना काल में घर बैठे बैठे फिर पढ़ाई करने का जुनून सवार हुआ, हिंदी साहित्य से पोस्ट ग्रेजुएशन किया। पहले व दूसरे चांस में नेट क्वालिफाइड हुई ,तीसरे चांस में 98.98 प्रतिशत अंक के साथ नेट जेआरएफ क्वालिफाइड कर रच डा...

रिश्तों की सच्चाई: स्वार्थ या प्रेम?

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संपादकीय: दिनांक 27 फरवरी 2025  _"रिश्तों की सच्चाई: स्वार्थ या प्रेम?"_ रिश्तों की मधुरता केवल प्रेम की ही दौलत होती है। प्रेम में जहां स्वार्थ नजर आए वहां रिश्ते या तो शर्मसार होते हैं। या फिर टिक ही नहीं पाते हैं । रिश्तो में प्रेम की बजाय स्वार्थ का मिश्रण ज्यादा हो तो रिश्ते स्वार्थ के बली चढ़कर टूट ही जाते हैं। जीवन को सुखी या दुखी रखने के संसाधनों में रिश्तों का बड़ा महत्व है जिन लोगों के रिश्ते सीमित होते हैं वे लोग दुखों से घिरे हुए होते हैं अक्सर लोग रिश्तों से जुड़कर स्वार्थ की प्रतिपूर्ति में छूट रहते हैं ऐसे लोग दुख के भाग्य बनते हैं निस्वार्थ पूर्ण प्रेम-भाव की खेती से सींचे गए रिश्ते हमेशा फलीभूत होते हैं। रिश्तो की सच्चाई में स्वार्थ से नुकसान और प्रेम से फायदे के संदर्भ में मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।  किसी भी रिश्ते को खराब होने का पूर्ण जिम्मेदार हमेशा सामने वाला ही नहीं होता, बल्कि कहीं ना कहीं आप भी होते हो। इसलिए जब भी रिश्तों के प्रति प्रेम, कर्तव्य, कृतज्ञता की भावना ही खत्म हो जाए तो ऐसे रिश्ते को बोझ की तरह ढ़ोने से अच्छा है कि ...

शिक्षा और संगठन: जीवन की निर्मलता

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संपादकीय: दिनांक 26 फरवरी 2025 - *"शिक्षा और संगठन: जीवन की निर्मलता"*  आज के बदलते परिवेश में सामाजिक तौर पर हम एक नहीं हैं। समाज बंटता हुआ दिखाई दे रहा है, और हम आपस में एक-दूसरे को बर्दाश्त करने की स्थिति में भी नहीं हैं। ऐसी स्थिति में जब समाज टूटता बंटता है, तो हर व्यक्ति भी किसी ना किसी रूप में उसकी चपेट में आता ही है। मनुष्य के जीवन में शिक्षा और संगठन का बड़ा महत्व है। अकेला मनुष्य शक्तिहीन है, जबकि शिक्षित व संगठित होने पर उसमें शक्ति आ जाती है। शिक्षा व संगठन की शक्ति से मनुष्य बड़े-बड़े कार्य भी आसानी से कर सकता है। यह मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।  जीवन में शिक्षा और संगठन का है बड़ा महत्व है, जबकि अकेला मनुष्य शक्तिहीन है।आज के बदलते परिवेश में सामाजिक तौर पर हम एक नहीं हैं क्योंकि न सिर्फ यह समाज बंटता हुआ दिखाई दे रहा है, बल्कि आज हम आपस में एक-दूसरे को बर्दाश्त करने की स्थिति में भी नहीं है। ऐसी स्थिति में जब समाज टूटता बंटता है तो हर व्यक्ति भी किसी ना किसी रूप में उसकी चपेट में आता ही है। यह सब आए दिन की दर्दनाक घटनाओं से स्वत: जाहिर हो रहा...

मर्यादा की महत्ता: जीवन की व्यवस्थित शैली

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संपादकीय: 24 फरवरी 2025  *"मर्यादा की महत्ता: जीवन की व्यवस्थित शैली"*  जीवन में मर्यादा का महत्व बहुत अधिक है। यह हमें व्यवस्थित और निर्मल जीवन जीने की शैली सिखाती है। मर्यादा की लक्ष्मण रेखाएं हमें जीवन की विभिन्न परिस्थितियों में सही निर्णय लेने में मदद करती हैं। लेकिन यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगी बोलता है। मर्यादा में रहने वाला इंसान अपनी जिम्मेदारियों को समझता है और उनका पालन करता है। वह कोई भी जिम्मेदारी कबूल करने से पहले यह जानने की कोशिश करता है कि उससे क्या करने की उम्मीद की जा रही है। यह सोच और समझ मर्यादा की महत्ता को दर्शाती है। मर्यादा की महत्ता को समझने के लिए हमें जीवन की विभिन्न परिस्थितियों में इसका पालन करना होगा। यह हमें व्यवस्थित और निर्मल जीवन जीने में मदद करेगी। मर्यादा की महत्ता को समझने के लिए हमें यह भी समझना होगा कि इसका पालन करने से हमें क्या लाभ होते हैं। मर्यादा का पालन करने से हमें जीवन में कई लाभ होते हैं। यह हमें व्यवस्थित और निर्मल जीवन जीने में मदद करती है। मर्यादा का पालन करने से हमें अपनी जिम्मेदारियों को समझने में मदद मिलती है...

वक्त और फितरत: बदलाव की कहानी

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संपादकीय: 23 फरवरी 2025।  "वक्त और फितरत: बदलाव की कहानी" जीवन में बदलाव एक नियमित प्रक्रिया है। लोग वक्त के साथ बदलते रहते हैं और उनकी फितरत में परिवर्तन आता है। यह बदलाव इंसानी फितरत का एक अभिन्न अंग है।  वक्त किसी एक के साथ होकर नहीं रहता। यह बदलता रहता है और लोगों को भी बदलता रहता है। आज जो किसी की संतान हैं, आने वाले कल में वे पैरंट्स बनेंगे, लेकिन उन्होंने अपने पैरंट्स से जो सीखा, महज उतना ही वे अपने बच्चों को सिखाने तक सीमित नहीं हैं। हर दूसरी जेनरेशन पहले से थोड़ी अलग होती जाती है। यह बदलाव वक्त और हालात के कारण होता है। लोगों की फितरत में परिवर्तन आता है और वे अपने रिश्तों को नए सिरे से परिभाषित करने लगते हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। जिसकी फितरत हमेशा बदलने की हो, वह कभी किसी का नहीं हो सकता, चाहे वह समय हो या इंसान । बदलाव इंसानी फितरत है। लोग वक्त के साथ बदलते रहते हैं। वक्त किसी एक के साथ होकर नहीं रहता। बदलने में उसका यकीन है । आज जो किसी की संतान हैं, आने वाले कल में वे पैरंट्स बनेंगे, लेकिन उन्होंने अपने पैरंट्स से जो सीखा, महज उत...

संगति और व्यक्तित्व का निखार

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संपादकीय आलेख: 22 फरवरी 2025।  *संगति और व्यक्तित्व का निखार*  'जैसा खाएं अन्न, वैसा रहे मन। जैसी हो संगति वैसी को प्रगति।' व्यक्ति के आचरण और संगति का प्रभाव होता है कि उसका व्यक्तित्व का निखार किस ढंग से होगा व्यक्ति की संगति अच्छी है तो प्रगति भी होगी और यदि संगति गलत है तो निश्चित रूप से दुर्गति होगी। संगति का प्रभाव जैसे पारस पत्थर के पास रखा लोहा भी सोना बन जाता है। एक गंदा सेब अच्छे से फलों की टोकरी जो सेब से भरी पेटी को खराब कर देता है। इसलिए यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। जीवन में हम अक्सर दूसरों के दिखावे से प्रभावित होते हैं और उनके व्यक्तित्व की पहचान उनके रंग, रूप, पहनावे या एक क्षण के आचरण से करते हैं। लेकिन क्या यह सही है? क्या हमें व्यक्तित्व की पहचान के लिए दिखावे से परे जाना चाहिए? व्यक्तित्व की पहचान के लिए हमें दूसरों के वाणी, व्यवहार और कर्मों की सुगन्ध को समझना चाहिए। यही वह चीजें हैं जो हमें व्यक्तित्व की असली पहचान देती हैं। आजकल दिखावे की दुनिया है और हम अक्सर इस दिखावे में फंस जाते हैं। हमें यह समझना चाहिए कि कौन हमारा अपना है ...

भ्रम और जिंदगी: जरूरत और आदत के बीच का अंतर

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संपादकीय  दिनांक 20 फरवरी 2025  भ्रम और जिंदगी: जरूरत और आदत के बीच का अंतर" जीवन में हम अक्सर अपनी जरूरतों और आदतों के कारण दूसरों का इस्तेमाल करते हैं। हमें लगता है कि वे हमारे लिए जरूरी हैं, लेकिन वास्तव में यह एक भ्रम है। यह भ्रम हमें अपने जीवन में सही और गलत के बीच के अंतर को समझने में मदद नहीं करता है। जब हम किसी की जरूरत होते हैं, तो हम उन्हें अपने जीवन में शामिल करते हैं। लेकिन जब हमें लगता है कि वे हमारे लिए जरूरी हैं, तो हम उन्हें अपने जीवन में अधिक महत्व देते हैं। यह हमें अपने जीवन में असंतुलन पैदा कर सकता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। हम किसी की जरूरत हो सकते हैं, आदत हो सकते हैं, परंतु हकीकत में जरूरी किसी के लिए नहीं होते क्योंकि लोग जरुरत के मुताबिक हमें इस्तेमाल करते हैं और हम ये सोचते हैं कि लोग हमें पसंद करते हैं । बस यही भ्रम है, जिंदगी का । बुरे वक्त में जो इंसान आपका साथ छोड़ दें तो ये मान लेना कि वो कभी आपके साथ था ही नहीं  । भ्रम होना एक तरह का ग्रे क्षेत्र है जहाँ कोई भी नहीं रहना चाहता। आज, खुद को भ्रमित कहना ज्ञान और ...

नशे की गिरफ्त में युवा- शादियों में बार लगाने की परंपरा का आविर्भाव

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संपादकीय- दिनांक 19 फरवरी 2025।  नशे की गिरफ्त में युवा  *शादियों में बार लगाने की परंपरा का आविर्भाव*  शादी जैसे पवित्र बंधन में फेरे की रस्म में फेरे देखने वालों की भीड़ कभी हुआ करती थी लेकिन यह चारम अब बिल्कुल खत्म हो गया है। शादी समारोह में शामिल होने वाले युवाओं का एक ही निशान रहता है दारू बियर की तान कहां लगे। मंडप से लेकर स्वागत द्वार तक हुकों की प्रदर्शनी और तरह-तरह के फ्लेवर के धुंआ के गुबार से आनंद लेते न केवल युवाओं को बल्कि आजकल महिलाओं को भी देखा जा सकता है।  दारू बियर के अलग से लगने वाले टैंट में झूम रही भीड़ के दृश्य को देखकर आपको नहीं लगता कि समाज की बड़ी तादाद नशे की गिरफ्त में जा रही है। और समाज सामूहिक रूप से गुनहगार बनता जा रहा है। एंजॉय के नाम पर शराब की परिवहन करते हुए कई बार शादी विवाह के समय दूल्हे तक ड्रग्स एक्ट में गिरफ्तार होते देखे गए हैं। लेकिन विवाह शादियों में लगने वाले इस बार के बारे में समाज की क्या राय है। कोई किसी को मतलब नहीं।  इन दिनों टेंट व्यवसाईयों के साथ-साथ हुक्का व्यवसाययों का प्रचलन बड़ा है। बियर बार डेकोरे...

घोड़ी पर बैठने, व न बैठने देनी की ज़िद

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संपादकीय@एडवोकेट हरेश पंवार  17 फरवरी 2025 *घोड़ी पर बैठने, व न बैठने देनी की ज़िद* घोड़ी पर बैठने की रस्म और इसके पीछे की सामाजिक और सांस्कृतिक कहानी एक जटिल मुद्दा है। एक तरफ यह परंपरा सदियों पुरानी है, और भारतीय शादियों में एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन दूसरी तरफ यह परंपरा आज भी दलित वर्ग को घोड़ी पर न बैठने देने की जिद को बढ़ावा देता है, जो सामाजिक असमानता को दर्शाता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।  घोड़ी पर बैठने व न बैठने देने की ज़िद कही परंपराएं, तो कहीं सामंती दकियानूसी सोच के चलते सामाजिक व्यवस्था में विषाक्त घुला हुआ है। विवाह शादी में घोड़ी पर बैठने की रस्म और कहीं-कहीं आज भी दलित वर्ग को घोड़ी पर न बैठने देने की जिद सामाजिक असमानता को दर्शाता है। आजादी के इस टेक्निकल युग में  घोड़ी पर बैठने को लेकर हो रहे टकराव सामाजिक सद्भाव और देश हित के लिए शर्मनाक घटनाएं हैं।  एक तरफ हम शिक्षित होने का दावा करते हैं वहीं दूसरी ओर विषाक्त मानसिकता का परिचय देते हुए कुंठित परंपराओं के पालन में शक्ति प्रदर्शन करते देखे जा सकते हैं । लेकिन परं...

व्यवहार और स्वभाव: जीवन की दो शैलियां

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संपादकीय- 16 फरवरी 2025  *व्यवहार और स्वभाव: जीवन की दो शैलियां*  पहली मुलाकात में मायना यह नहीं रखता कि आप कितने बड़े आदमी हैं। मायना यह रखता है कि आपका परिचय कौन करवा रहा है। किस समय करवा रहा है और कहां करवा रहा है। इस दौरान आपका व्यवहार क्या है? आपके व्यवहार और बोलचाल के आधार पर सामने वाला आपके व्यक्तित्व के स्टेटस का मूल्यांकन करता है कि आपको तवज्जो कितना देना है, क्योंकि  हर व्यक्ति का स्वभाव अलग-अलग होता है, इसलिए लोगों का व्यवहार भी हर बार अलग मिलेगा। यही कारण है कि हम व्यवहार को लेकर सभी के साथ एक जैसा मानदंड नहीं अपना सकते। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम अपना व्यवहार भी बार-बार बदलें। हम बात करने का तरीका तो बदल सकते हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। जीवन जीने की दो शैलियां 'व्यवहार व स्वभाव' हैं। आमतौर पर लोग व्यवहार में जीते हैं, यही वजह है कि विकास के बाद भी वे मानसिक रूप से असंतुष्ट व अशांत रहते हैं। जबकि स्वभाव में जीने वाले व्यक्ति का विकास होने के साथ ही उसे आत्मसंतुष्टि व शांति भी मिलती है। वर्तमान में कोई भी व्यक्ति किसी एक शै...

शांति और प्रेम: जीवन की सबसे बड़ी जीत

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संपादकीय  *शांति और प्रेम: जीवन की सबसे बड़ी जीत*  15 फरवरी 2025  जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए हमें दैनिक आदतों को अपनाना होता है, न कि एक बार में किया हुआ बदलाव। यह बात हमें हमेशा याद रखनी चाहिए कि सफलता एक दिन में नहीं मिलती, बल्कि यह हमारे दैनिक प्रयासों का परिणाम होती है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। सफलता दैनिक आदतों का परिणाम है, ना कि पूरे जीवन के लिए एक बार में किया हुआ बदलाव। कहते हैं कि जैसे जैसे आपका नाम ऊंचा होता है, वैसे वैसे शांत रहना सीखिए । महात्मा गौतम बुद्ध ने कहा है कि जीवन में हजारों लड़ाइयां जीतने से बेहतर स्वयं पर विजय प्राप्त करना है। यदि स्वयं पर विजय प्राप्त कर लिया तो फिर जीत हमेशा तुम्हारी होगी। इसे तुमसे कोई नहीं छीन सकता। शांत दिमाग लाइफ में किसी भी चुनौती के खिलाफ लडने के लिए सबसे बड़ा हथियार है । गौतम बुद्ध कहते हैं कि व्यक्ति कभी भी बुराई से बुराई को खत्म नहीं कर सकता है। इसे खत्म करने के लिए व्यक्ति को प्रेम का सहारा लेना पड़ता है। प्रेम से दुनिया की हर बड़ी चीजों को जीता जा सकता है। इसलिए अपनी आवाज सीमित रखि...

शिक्षा की दोहरी भूमिका - सामाजिक और रोजगार सम्बन्धी

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संपादकीय : 8/10/2024  *शिक्षा की दोहरी भूमिका - सामाजिक और रोजगार सम्बन्धी*  शिक्षा हमारे जीवन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह न केवल हमें ज्ञान प्रदान करती है, बल्कि हमें सामाजिक और आर्थिक रूप से भी सशक्त बनाती है। लेकिन, क्या हमने कभी सोचा है कि शिक्षा के दो महत्वपूर्ण पहलू हैं - सामाजिक/ऐतिहासिक शिक्षा और रोजगार सम्बन्धी शिक्षा? सामाजिक/ऐतिहासिक शिक्षा हमें हमारे समाज, इतिहास, संस्कृति और मूल्यों के बारे में जानकारी प्रदान करती है। यह हमें अपने अधिकारों और कर्तव्यों के बारे में जागरूक करती है और हमें समाज में एक जिम्मेदार नागरिक बनने में मदद करती है। लेकिन, यदि यह शिक्षा अपूर्ण है, तो हम पाखंडियों के द्वारा शोषण के शिकार हो सकते हैं। दूसरी ओर, रोजगार सम्बन्धी शिक्षा हमें आर्थिक रूप से सशक्त बनाती है। यह हमें अपने कौशल और ज्ञान के आधार पर रोजगार प्राप्त करने में मदद करती है और हमें आर्थिक स्वतंत्रता प्रदान करती है। लेकिन, यदि यह शिक्षा अधूरी है, तो हम आर्थिक असमानता के शिकार हो सकते हैं। शिक्षा के महत्व के संबंध में मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। शि...

जीवन की सच्चाई: सुख, दुःख और मौन

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संपादकीय:  9 फरवरी 2025 "जीवन की सच्चाई: सुख, दुःख और मौन" एक चुपी सौ को हरा दे। अर्थात क्रोध के समय मौन भाषा अनेको लोगों को हरा सकती है। सच्चाई को छुपा कर मौन धारण करना भी गुनाह है।  जीवन में सुख और दुःख दोनों ही अविभाज्य हैं। हर व्यक्ति सुख पाने की लालसा रखता है, लेकिन अक्सर अपने सुख के लिए दूसरों को दुखी कर स्वयं को नष्ट करने जैसी स्थिति पैदा कर लेता है। यही कारण है कि जीवन में सुख और दुःख के बीच संतुलन बनाना बहुत जरूरी है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। कहते हैं कि अज्ञान की शक्ति क्रोध है और ज्ञान की शक्ति मौन है। यह सच है कि मौन रहने से हम अपने जीवन को शांत और सुखी बना सकते हैं। लेकिन यह भी सच है कि मौन रहने का मतलब यह नहीं है कि हम सच का पता होने पर भी चुप रहें। जीवन में नसीहत देना और सीखना दोनों ही जरूरी हैं। लेकिन नसीहत देते समय हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि हम दूसरों को शर्मिंदा न करें। हमें उद्देश्य को ध्यान में रखकर नसीहत देनी चाहिए, न कि दूसरों को नीचा दिखाने के लिए। जीवन में सुख और दुःख के बीच संतुलन बनाने के लिए हमें मौन रहने की शक्ति को अ...

जीवन की दृष्टि: सुख और दुःख का संतुलन

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संपादकीय:  13 फरवरी 2025 "जीवन की दृष्टि: सुख और दुःख का संतुलन" जीवन एक अनंत यात्रा है, जिसमें हमें सुख और दुःख दोनों का सामना करना पड़ता है। लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि जीवन को जीने का सही तरीका क्या है? क्या हमें सुखों को निहारना चाहिए या दुःखों को देखना चाहिए? यह मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। जीवन को, जीवन की दृष्टि से जीने का अनुभव ही जीवन में अतंर्दृष्टि को खोलने का आधार है। अगर हम दुःखों को देखने जाएंगे, तो धरती पर ऐसा कौन-सा प्राणी है जिसे अपने जीवन में दुःखों और कष्टों का सामना नहीं करना पड़ा हो। अगर सुखों को निहारते जाएं, तो ऐसा कौन-सा स्थान और घटक है, जहां हम सुखी होकर सुख देखने जाएं और हमें सुख ना दिखाई दे। वहीं सुख की चाहत में आप कांटों को निहारोगे तो जीवन में कष्ट ही कष्ट दिखाई देंगे और कांटों के ऊपर खिलने वाले गुलाबों पर ध्यान देंगे तो जीवन में खिलावट ही खिलावट नजर आएगी।  हमारा जीवन तो हमारे लिए किसी तानपुरे की तरह होता है, जिसके तारों को अगर कसना और साधना आ जाए तो तानपुरे के तार संगीत का सुकून देने लग जाते हैं और अगर तारों को कसना और साध...

जीवन का सार-जो तकलीफ खुद बर्दाश्त नहीं कर सकते वह दूसरों को क्यों दे?

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संपादकीय 14 फरवरी 2025  *जीवन का सार-जो तकलीफ खुद बर्दाश्त नहीं कर सकते वह दूसरों को क्यों दे?*  जीवन में हमें अक्सर बुरे लोगों का सामना करना पड़ता है, लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि बुरे लोगों की जीत क्यों होती है? इसका जवाब बहुत ही सरल है - अच्छे लोगों की खामोशी। जब अच्छे लोग खामोश रहते हैं, तो बुरे लोगों को अपने गलत कामों को करने का मौका मिलता है। हमें यह याद रखना चाहिए कि जो तकलीफ़ हम खुद बर्दाश्त नहीं कर सकते, वह तकलीफ़ दूसरों को नहीं देनी चाहिए। हमें अपने जीवन में सुख और दुःख दोनों को स्वीकार करना चाहिए और बुरे लोगों की बुराई के सामने खामोश नहीं रहना चाहिए। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। जीवन में हमें सुख और दुःख दोनों का सामना करना पड़ता है, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सुख और दुःख दोनों ही जीवन का हिस्सा हैं। हमें सुख की हंसी और दुःख की रुलाई दोनों को स्वीकार करना चाहिए। लेकिन जब हम बुरे लोगों की बुराई के सामने खामोश रहते हैं, तो हम अपने जीवन को बर्बाद कर लेते हैं। बुरे लोगों की पहचान उनकी ख़राब नजरों से भी की जा सकती है। निगाहों के भिन्न भिन...

जीवन की पाठशाला: सीखने का अनंत साधन"*

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संपादकीय:  11 फरवरी 2025  *"जीवन की पाठशाला: सीखने का अनंत साधन"*  जीवन एक अनंत पाठशाला है, जहां हम हर दिन नई चीजें सीखते हैं और आगे बढ़ते हैं। यह पाठशाला हमें हर पल एक नया पाठ पढ़ाती है, जो हमारी सोच को बदलती है और हमें जीवन के सही मायने समझाती है। जीवन की इस पाठशाला में हमें कई सबक मिलते हैं, जो हमें आगे बढ़ने में मदद करते हैं। सबसे बड़ा सबक तो यही है कि गलतियों को दोहराओ मत और जब भी जहां भी, जिस किसी से भी, जो अच्छा सीखने को मिले, उसे ग्रहण करो। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। हम नींद में सपने देखते हैं, लेकिन प्रकृति हमें हर दिन नींद से जगा कर उन सपनों को पूरा करने के लिए एक मौका देती है। जीवन की पाठशाला दुनिया की हर पाठशाला से बड़ी है। इसका सबक जिसने ईमानदारी से सीख लिया, वह व्यक्ति हमेशा प्रगति करता है।  इस पाठशाला का सबसे बड़ा सबक तो यही है कि ‘गलतियों को दोहराओ मत और जब भी जहां भी, जिस किसी से भी, जो अच्छा सीखने को मिले, उसे ग्रहण करो।हर व्यक्ति का जीवन में एक प्रमुख लक्ष्य होता है, जिसमें दूसरों की मदद करना, समाज में सकारात्मक योगदान द...

राग और द्वेष: जीवन की सबसे बड़ी बाधा

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संपादकीय:  7 फरवरी2025  "राग और द्वेष: जीवन की सबसे बड़ी बाधा" आज के समय में, हमारा देश, समाज और परिवार कलह से ग्रस्त है। इसका मुख्य कारण है राग और द्वेष से उपजी जीवनशैली। राग और द्वेष दोनों एक दूसरे के विपरीत हैं, लेकिन दोनों ही जीवन को नकारात्मक दिशा में ले जाते हैं। राग में जन्मती हैं अपेक्षाएं, और अपेक्षा जब टूट जाती है तो उत्पन्न होता है द्वेष। यही कारण है कि अक्सर परिवारों में पति-पत्नी के बीच कलह होती है। दोनों एक दूसरे से द्वेष रखने लगते हैं और सम्बंध में प्रेम नाम मात्र का रह जाता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।  राग और द्वेष से उपजी जीवनशैली के कारण वर्तमान में हमारा देश, समाज और परिवार कलह से ग्रस्त है। राग और द्वेष दोनों एक दूसरे के विपरीत हैं । जैसे तुम्हें किसी से घृणा हो गयी हो और तुम्हें कोई फूटी आँख न सूहाय तो इसका मतलब है कि उसके प्रति तुम द्वेष रखते हो । द्वेष अगर कहीं है तो इसकी पूरी सम्भावना है कि पहले कहीं राग रहा होगा । राग में जन्मती हैं अपेक्षाएं, और अपेक्षा जब टूट जाती है तो उत्पन्न होता है द्वेष । अक्सर परिवारों में यह...

मन की शक्ति और जीवन की दिशा

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संपादकीय:  6 फरवरी 2025 "मन की शक्ति और जीवन की दिशा" प्रकृति का नियम है यदि बरसात के समय खेत में अच्छे बीज डालकर जुताई नहीं की गई तो प्रकृति उसे खेत को घास फूस से हरा भरा कर देती है। प्रकृति का नियम है बरसात ऋतु आते ही प्रकृति को हरा भरा कर देना। प्रकृति के इस सिद्धांत पर मनुष्य ने अपनी पसंद का बीज बोकर अपनी पसंद की उपज लेने की कला किसान ने सीखी जो मानव का पेट भरने वाला अन्न पैदा करता है। ऐसे ही विचार मन में आते हैं यदि अच्छा साहित्य अच्छे संस्कार नहीं सीखे तो मन में गंदे विचार भी आ सकते हैं अच्छे विचारों की पृष्ठभूमि बनाने के लिए मन की खुराक अच्छी होनी चाहिए क्योंकि मन में आने वाले विचारों की आयु सिर्फ एक पल की होती है, किंतु इसके प्रभाव को हम अनंत समय तक महसूस करते हैं। यह बात हमें सोचने पर मजबूर करती है कि हमारे विचार हमारे जीवन को कितना प्रभावित कर सकते हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। इंसानी दिमाग बहुत पावरफुल है, जिसमें खरबों न्यूरॉन होते हैं। यह हमारे पास एक अनमोल उपहार है, जिसका उपयोग हम अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए कर सकते हैं। लेकिन जब...

जीवन के अनमोल सबक

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संपादकीय:  5 फरवरी 2025  *"जीवन के अनमोल सबक"*  जीवन में हमें कई अनमोल सबक मिलते हैं, जो हमें जीवन के सही मार्ग पर चलने में मदद करते हैं। इन सबकों को सीखने से हम अपने जीवन को बेहतर बना सकते हैं। यह मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।  चाय के साथ खाने वाले बिस्कुट ने जीवन में एक तो सबक सीखा ही दिया कि किसी में ज्यादा डुबोगे तो टूट ही जाओगे क्योंकि दूसरों की छांव में खड़े होकर हम अपनी परछाई खो देते हैं, जबकि अपनी परछाई के लिए हमें खुद ही धूप में खड़ा होना पड़ता है । यह याद रखें कि अपनी जेब कभी खाली मत होने देना, वरना आपके अपने भी आपको पहचानने से इंकार कर देंगे । जिंदगी में दो ही व्यक्ति जीवन को नई दिशा देकर जाते हैं, एक वह जो “मौका” देता है और दूसरा वह जो “धोखा” देता है। हमारा घर बदल जाए या हमारा समय बदल जाए, इसका कोई गम नही।  लेकिन सबसे ज्यादा दुख तब होता है, जब कोई अपना ही बदल जाता है। वैसे जिंदगी में कुछ जख्म ऐसे भी होते हैं, जो कभी भरते नहीं है, बस इंसान अपनी सूझबूझ से उन जख्मों को छुपाने का हुनर सीख जाता है। उदाहरण के लिए, चाय के साथ खाने वाले ब...

एकाकी जीवनशैली और कुंठा

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संपादकीय: 4 फरवरी 2025   *"एकाकी जीवनशैली और कुंठा"*  आज के समय में एकाकी जीवनशैली एक बड़ी समस्या बन गई है। लोग अपने परिवार और समाज से दूर होकर अकेले जीवन जीने को प्राथमिकता दे रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप, वे कुंठा और अवसाद के शिकार हो रहे हैं। यही कारण है कि आज हर व्यक्ति की सोच बनती जा रही है कि मैं और मेरो नाथों फोड़ा दूसरा को माथो अर्थात एकलखोर जीवन शैली से मोह रखने वाले लोगों की काफी तादाद बढ़ती जा रही है। जिन उम्मीदों के साथ मां-बाप अपने बच्चों की परवरिश कर अपनी जीवन की कायनात बच्चों को सक्सेस बनाने पर खर्च कर रहे हैं वे बच्चे ही पलायन होकर शहरों में बस रहे हैं वही बुजुर्ग गांव में जर्जर जीवन गुजार रहे हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। एकाकी जीवनशैली में लोग अपने सुख-दुःख को किसी के साथ बांटने का मौका नहीं पाते हैं। इसके कारण, वे अपने दुखों को दबाए रखते हैं और धीरे-धीरे कुंठा के शिकार हो जाते हैं। इसके अलावा, एकाकी जीवनशैली में लोग अपने परिवार और समाज से दूर हो जाते हैं। इसके कारण, वे अपने रिश्तों को मजबूत बनाने का मौका नहीं पाते हैं और धीरे...

आधुनिकता में सुख की कमी

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संपादकीय:  2 फरवरी 2025  "आधुनिकता में सुख की कमी" आज का समाज विज्ञान और प्रौद्योगिकी की प्रगति के कारण सुविधाओं से भरा पड़ा है। लेकिन इसके बावजूद, अधिकांश लोग मानसिक तनाव, दुखी, उदास, चिंतित और क्षुब्ध दिखाई देते हैं। इसका कारण वस्तुओं की कमी नहीं है, बल्कि जो कुछ उपलब्ध है, उसका सदुपयोग नहीं हो पाना है। मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। बुद्धिमत्ता का वास्तविक स्वरूप यही है कि जो कुछ हस्तगत है, उसका श्रेष्ठतम सदुपयोग किया जाए। लेकिन आज के समाज में लोग अपने स्वार्थ के कारण एक-दूसरे का फायदा उठाने की कोशिश करते हैं। यही वजह है कि आज के समाज में सुख की कमी है। वर्तमान समय को प्रगति का युग कहा जाता है। इन दिनों ज्ञान और विज्ञान का असाधारण विस्तार हुआ है। इसके साथ ही सुविधाजनक साधनों की भी अतिसय वृद्धि हुई है। आज के युग में विज्ञानिक उपकरणों का उपयोग इतना बढ़ गया है कि इन उपकरणों के बिना हमें अपने जीवन में कमी का एहसास होता है।  विज्ञान की प्रगति के कारण ही आज हमारे पास आधुनिक उपकरण उपलब्ध हैं। वहीं अतीत में इतने साधन नहीं थे, फिर भी लोग सुखपूर्वक रहते थे, ले...