वक्त और फितरत: बदलाव की कहानी
संपादकीय:
23 फरवरी 2025।
"वक्त और फितरत: बदलाव की कहानी"
जीवन में बदलाव एक नियमित प्रक्रिया है। लोग वक्त के साथ बदलते रहते हैं और उनकी फितरत में परिवर्तन आता है। यह बदलाव इंसानी फितरत का एक अभिन्न अंग है।
वक्त किसी एक के साथ होकर नहीं रहता। यह बदलता रहता है और लोगों को भी बदलता रहता है। आज जो किसी की संतान हैं, आने वाले कल में वे पैरंट्स बनेंगे, लेकिन उन्होंने अपने पैरंट्स से जो सीखा, महज उतना ही वे अपने बच्चों को सिखाने तक सीमित नहीं हैं।
हर दूसरी जेनरेशन पहले से थोड़ी अलग होती जाती है। यह बदलाव वक्त और हालात के कारण होता है। लोगों की फितरत में परिवर्तन आता है और वे अपने रिश्तों को नए सिरे से परिभाषित करने लगते हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
जिसकी फितरत हमेशा बदलने की हो, वह कभी किसी का नहीं हो सकता, चाहे वह समय हो या इंसान । बदलाव इंसानी फितरत है। लोग वक्त के साथ बदलते रहते हैं। वक्त किसी एक के साथ होकर नहीं रहता। बदलने में उसका यकीन है । आज जो किसी की संतान हैं, आने वाले कल में वे पैरंट्स बनेंगे, लेकिन उन्होंने अपने पैरंट्स से जो सीखा, महज उतना ही वे अपने बच्चों को सिखाने तक सीमित नहीं हैं
क्योंकि किसी की संतान होने से लेकर किसी बच्चे का माता-पिता बनने के दरम्यान वक्त और हालात उन्हें कई तरह से बदलते और सिखाते रहे हैं। इस तरह हर दूसरी जेनरेशन पहले से थोड़ी अलग होती जाती है। निभाएं किस तरह रिश्ते, समझ में कुछ नहीं आता, किसी से दिल नहीं मिलता, कोई दिल से नहीं मिलता। एक मुकाम जिंदगी में ऐसा भी आता है कि क्या भूलना है, बस यही याद रह जाता है क्योंकि वक़्त के साथ, लोगों की फ़ितरत बदल जाती है और स्वार्थ के वशीभूत शोहरत के साथ लोगों की चाहत भी बदल जाती है !
कल तक जो बने थे दुश्मन, आज वही लोग सगे हो जाते हैं और नीजी स्वार्थ में अपना काम साधने के लिए वही लोग सब कुछ करने को तैयार हो जाते हैं। ऐसे लोग बड़े घातक होते हैं जो हर पल पैंतरा बदलते रहते हैं।
ऐसे लोग अपनों को ही भूल जाते हैं और गैरों से जुड़ जाते हैं। गैर जब देते हैं झटका, तो वही लोग सही दिशा में आ जाते हैं। वैसे सूखा भी कई तरह का होता है, कहीं पानी का, तो कहीं समझदारी का।। बाकि: प्रेम जवाब नहीं मांगता, सवाल ही व्यर्थ कर देता है। जैसे जब हम अपनी चिंता को आस्था में परिवर्तित कर देते हैं, तब प्रकृति रूपी ईश्वर हमारे संघर्ष को आशीर्वाद में परिवर्तित कर ही देता हैं।
लेकिन यह बदलाव हमेशा सकारात्मक नहीं होता। कई बार लोग अपनों को ही भूल जाते हैं और गैरों से जुड़ जाते हैं। यह बदलाव उनके लिए घातक हो सकता है।
आखिर में, यह बदलाव हमें यह सिखाता है कि जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं है। वक्त और फितरत में परिवर्तन आता रहता है और हमें इसके साथ तालमेल बैठाना होता है।
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