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Showing posts from June, 2025

इलाज के नाम पर व्यापार: क्या इंसान अब सिर्फ मुनाफे का शरीर बन गया है?

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✍️ संपादकीय 29 जून 2025  *“इलाज के नाम पर व्यापार: क्या इंसान अब सिर्फ मुनाफे का शरीर बन गया है?”*  आज का दौर ऐसा हो चला है जहाँ इलाज अब सेवा नहीं, एक ‘सिस्टमेटिक बिजनेस मॉडल’ बन गया है। डॉक्टर अब देवता नहीं, कॉरपोरेट अस्पतालों के वे कर्मचारी बनते जा रहे हैं जिनके सामने मरीज सिर्फ एक “केस” होता है — एक मुनाफे का स्रोत है। मरीज जितना बड़ा, बीमारी जितनी गंभीर, और केस जितना लंबा—उतना ही अस्पताल का बिल बड़ा। यह कोई भावुक आरोप नहीं, यह हमारे आसपास रोज़ घट रही सच्चाई है। फ्री इलाज: नाम में राहत नहीं, बल्कि हकीकत में फरेब है।सरकारें गरीबों और बुजुर्गों के लिए “फ्री इलाज” की योजना बनाती हैं। सुनने में बड़ा अच्छा लगता है, लेकिन जब जमीन पर इसे देखा जाए तो सच्चाई बिल्कुल अलग मिलती है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर करोगे कि बोलता है। बुजुर्गों को अस्पतालों में जबरन भर्ती किया जाता है, कई बार ऐसी स्थिति में जब घर पर देखभाल से भी उनका जीवन अधिक शांत और गरिमामय हो सकता था। लेकिन क्योंकि इलाज “फ्री” है, इसलिए अस्पतालों को मरीज़ चाहिए। और फिर शुरू होता है असली खेल—जांच पर जांच, दवा पर दव...

जो बचता नहीं, उसी में उलझे हैं

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✍🏻 संपादकीय  28jun2025  *"जो बचता नहीं, उसी में उलझे हैं"*   जीवन का गणित  सीखने के लिए असली ट्रिक जो  हम भूल रहे हैं, जो लेकर जाना है, उसे छोड़ रहे हैं; और जो यहीं रह जाना है, उसे जोड़ रहे हैं। यह जीवन एक गूढ़ गणित है, जिसे सुलझाने के लिए अंकों से ज्यादा आत्मबोध और अनुभव की आवश्यकता होती है। इंसान का स्वभाव बड़ा ही विचित्र है। वह उन वस्तुओं, संबंधों और आकांक्षाओं के पीछे भागता है जिन्हें एक दिन यहीं छोड़कर जाना है, और उन मूल्यों, संवेदनाओं और विचारों को नज़रअंदाज़ कर देता है जो सदा साथ चलते हैं—जिनसे जीवन का वास्तविक अर्थ बनता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। आज की तेज़ भागती दुनिया में मनुष्य अपनी "मूल जीवन गणना" से भटकता जा रहा है। समाज में दिखावा, भौतिकता और पद की होड़ इतनी तीव्र हो चुकी है कि लोग यह भूलते जा रहे हैं कि सच्ची खुशी कैसे जोड़ी जाती है, और मानसिक शांति कैसे घटाई जाती है। हम यह तो जानते हैं कि धन कैसे कमाया जाए, लेकिन यह नहीं सीख पाए कि दुःख को कैसे कम किया जाए या संबंधों में अपनत्व कैसे बढ़ाया जाए। गणित की एक सीध...

लोकतंत्र की आँच पर सुलगते सवाल – क्या भारत अपने मूल्यों से भटक रहा है?

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संपादकीय  27 जून 2025  *"लोकतंत्र की आँच पर सुलगते सवाल – क्या भारत अपने मूल्यों से भटक रहा है?"*  भारतवर्ष आज एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। एक ओर विश्व पटल पर देश की छवि एक उभरती आर्थिक शक्ति, तकनीकी महाशक्ति और वैश्विक नेतृत्वकर्ता की बनी हुई है; तो वहीं दूसरी ओर भीतर से यह राष्ट्र लोकतंत्र की नींव, सामाजिक न्याय, समरसता, पारदर्शिता और संवैधानिक मूल्यों को लेकर गहरी बेचैनी में जकड़ा हुआ प्रतीत होता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगी कि बोलता है। आज जब आमजन रोटी, रोजगार, शिक्षा और चिकित्सा जैसी बुनियादी आवश्यकताओं के लिए संघर्ष कर रहा है, तब सत्तासीन ताकतें इन मुद्दों से ध्यान भटकाकर धार्मिक ध्रुवीकरण, दिखावटी राष्ट्रवाद और मीडिया के भ्रम जाल में देश को उलझा रही हैं। लोकतंत्र की आत्मा "जनता के लिए, जनता के द्वारा, जनता की सरकार" अब बहुराष्ट्रीय पूंजी, कॉरपोरेट हित और सत्ता की सुविधा के लिए गढ़ी जा रही भाषा बनती जा रही है। भारत का संविधान – जो बाबा साहब डॉ. अंबेडकर की बुद्धिमत्ता और सामाजिक चेतना की विरासत है – आज महज एक संदर्भ पुस्तिका बनकर रह गया है। जात...

संस्कार बनाम प्रदर्शन – मृत्यु परंपराओं में बदलाव की पुकार”

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संपादकीय  26 जून 2025  “संस्कार बनाम प्रदर्शन – मृत्यु परंपराओं में बदलाव की पुकार” मृत्यु जीवन का अंतिम सत्य है। समाज में किसी व्यक्ति की मृत्यु होने पर उसके अंतिम संस्कार की प्रक्रिया न केवल भावनात्मक होती है, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक चेतना, परंपराओं और सामाजिक व्यवहार का भी प्रतिबिंब होती है। किंतु इन परंपराओं में समय, परिस्थिति और समाज के अनुसार बदलाव भी अपरिहार्य है। आज जब हम अंतिम संस्कारों के बदलते स्वरूप पर नज़र डालते हैं, तो एक ऐसा पहलू सामने आता है जिस पर गंभीरता से विचार की आवश्यकता है। पहले जहां अर्थी पर वस्त्र, साड़ी, लूगड़ी जैसे पारंपरिक वस्त्र मृतक को श्रद्धांजलि स्वरूप अर्पित किए जाते थे, वहीं सामाजिक सुधारकों ने इसका विकल्प नारियल जैसे प्रतीकात्मक और उपयोगी भेंट देने का सुझाव दिया। इसका उद्देश्य पर्यावरणीय दृष्टि से सराहनीय था, ताकि वस्त्रों का अपव्यय और प्रदूषण रोका जा सके। लेकिन अब यह नया विकल्प भी अपने मूल उद्देश्य से भटक चुका है। आज 50 से 100 तक नारियल मृतक की देह पर अर्पित किए जा रहे हैं। एक नारियल की कीमत ₹30 से ₹35 तक है, यानी अंतिम संस्कार...

शराब के प्याले में डूबी शिक्षा की नाव

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संपादकीय  24/06/2025  *शराब के प्याले में डूबी शिक्षा की नाव*  राजस्थान राज्य सरकार के फैसलों की दिशा को देखकर यह समझ में आ गया है कि आने वाला भविष्य किस नाव में सवार होकर डूबेगा—शिक्षा के जहाज में छेद किए जा रहे हैं और शराब के जहाज को पतवार दी जा रही है। राजस्थान की रेत पर जब-जब विकास की इबारत लिखी गई, तब-तब उम्मीद जगी कि अब इस प्रदेश के बच्चों के हाथ में किताब होगी, कलम होगी, उज्ज्वल भविष्य होगा। लेकिन हालिया सरकारी फैसलों ने उस उम्मीद पर बोतल का ढक्कन कस दिया है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।  एक तरफ राज्य में 67 नई शराब की दुकानें खोलने की घोषणा हुई है, जिससे कुल ठेकों की संख्या 741 हो जाएगी, वहीं दूसरी तरफ 4000 सरकारी स्कूल बंद करने और 35,000 शिक्षकों के पद खत्म करने का फरमान जारी किया जा रहा है। यह नीतिगत फैसला नहीं, बल्कि सामाजिक आत्महत्या का सरकारी दस्तावेज है, जिसमें लिखा है कि अब  शिक्षा की नहीं, शराब की जरूरत है। सरकार शायद यह मान बैठी है कि जब नौकरी नहीं है, रोजगार नहीं है, तब आदमी को रोजगार की चिंता से राहत देने का सबसे सस्त...

योग दिवस नहीं, जीवन में लौटे योग

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संपादकीय 22-06-2025  *योग दिवस नहीं, जीवन में लौटे योग*  योग दिवस पर जितना हो-हल्ला सरकारी दस्तावेजों, पोस्टरों और सोशल मीडिया पर देखने को मिला, उतनी ही चुप्पी असल ज़िन्दगी में योग को लेकर दिखाई देती है। योग, जो कभी भारतीय जनजीवन का स्वाभाविक हिस्सा हुआ करता था, आज महज़ एक दिखावा बनकर रह गया है। कार्यक्रमों में माला पहनाकर, फोटो खिंचवाकर और दो-चार घण्टे की औपचारिकता निभाकर योग दिवस “मना” लिया जाता है, लेकिन सवाल यह है कि योग वास्तव में कहाँ गया? यह केवल पार्कों और अखाड़ों तक सीमित क्यों रह गया है? क्या घरों में, खेतों में, रसोई में, दैनिक जीवन में योग के मूल स्वरूप को हम भूल चुके हैं? यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। हमारी परंपरा में हर कार्य एक सहज योग था। किसान जब हल चलाता था, महिलाएं जब मथनी चलाती थीं, दूध निकालती थीं, चूल्हे पर रोटियां सेंकती थीं, सिलबट्टे पर चटनी पीसती थीं, कुओं से बाल्टी खींचकर पानी भरती थीं — ये सभी कार्य योग के जीवंत रूप थे। यह वो योग था जो शरीर को भी स्वस्थ रखता था और मन को भी स्थिर। लेकिन जैसे-जैसे जीवन में भौतिक संसाधनों की घुस...

बधाई नहीं, सहभागिता चाहिए: जाति के गौरव से आगे बढ़िए, ज़रूरतमंद की मदद कीजिए

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संपादकीय  21-06-2025 *बधाई नहीं, सहभागिता चाहिए:  जाति के गौरव से आगे बढ़िए, ज़रूरतमंद की मदद कीजिए*  अपनी जाति के सफल लोगों को ढूंढ कर बधाई देने वाले लोग, अपनी जाति के करीब लोगों को ढूंढ कर सहायता क्यों नहीं करते? हमारा समाज एक विचित्र दोराहे पर खड़ा है। एक तरफ हम अपने समाज की किसी महान शख्सियत—डॉक्टर, अफसर, नेता या उद्योगपति—की उपलब्धि पर गर्व महसूस करते हैं, उन्हें सोशल मीडिया पर ढूंढ-ढूंढ कर बधाइयाँ देते हैं, और पूरे समाज का गौरव घोषित कर देते हैं। वहीं दूसरी ओर, हमारी गली-मोहल्ले में रहने वाला गरीब, असहाय, बेरोजगार या बीमार व्यक्ति—जो हमारी ही जाति का, समाज का, या पड़ोस का है—उसे हम नज़रअंदाज़ कर जाते हैं, जैसे वह समाज का हिस्सा ही न हो। यह कैसी विडंबना है कि हम जातीय पहचान पर आधारित "सफलता की पूजा" करते हैं लेकिन "जरूरतमंद की सेवा" से कतराते हैं? यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। जातिवादी गौरव बनाम सामाजिक ज़िम्मेदारी यह एक कोतुहल सवाल है। हमारे समाज में आज भी जातिवादी मानसिकता इतनी गहराई से बैठी हुई है कि कोई जब IAS, RAS, NEET या IIT पास ...

समय – सबसे बड़ा, अपना या पराया

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✍️ संपादकीय  20/06/2028  "समय – सबसे बड़ा, अपना या पराया" "किसी ने पूछा: इस दुनिया में आपका अपना कौन है? बहुत सुंदर जवाब था – समय, अगर वो सही है तो सब अपने, अगर वो गलत है तो अपने भी पराए लगते हैं।" इस संसार में मनुष्य का जीवन अनेक संबंधों, भावनाओं और परिस्थितियों की उलझनों से बुना होता है। रिश्ते-नाते, मित्रता, परिवार, समाज – ये सब जीवन की यात्रा में हमारे सहचर हैं, परंतु एक ऐसा साथी है जो अदृश्य होते हुए भी सबसे प्रभावशाली है – वह है "समय"। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। आज के दौर में जब जीवन की गति असामान्य रूप से तेज हो चुकी है, यह प्रश्न और अधिक प्रासंगिक हो गया है कि – आखिर इस दुनिया में हमारा "अपना" कौन है? कथन में दिया गया उत्तर – “समय” – एक अत्यंत गूढ़ और सत्य भाव को प्रकट करता है। यह केवल दार्शनिक विचार नहीं, बल्कि जीवन का ठोस अनुभव है। जब समय अच्छा होता है, तो दुनिया में सब कुछ सुंदर लगता है – संबंध प्रगाढ़ होते हैं, मित्रता सजीव होती है, और समाज में प्रतिष्ठा का अनुभव होता है। लेकिन जैसे ही समय बदलता है, विशेषकर...

हवाई सुरक्षा की दरकती परतें

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संपादकीय  18 जून 2025 हवा में लहराता भरोसा या टूटता नियमन?  *हवाई सुरक्षा की दरकती परतें*  हर उड़ान के साथ एक सपना भी ऊंचाई पर पहुंचता है—गंतव्य तक सुरक्षित पहुंचने का, अपने प्रियजनों से मिलने का, जीवन को गति देने का। पर जब वही उड़ान मौत का परवाना बन जाए, तो सवाल उठते हैं—केवल तक़दीर पर नहीं, हमारी व्यवस्था, तकनीकी निगरानी और नियामक ईमानदारी पर भी। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। हाल की घटनाओं ने हमें झकझोर कर रख दिया है। एयर इंडिया के ड्रीमलाइनर विमान का क्रैश और उत्तराखंड के गौरीकुंड में हेलीकॉप्टर हादसे में पायलट समेत 7 लोगों की दर्दनाक मौत, उस व्यवस्थागत विफलता की ओर इशारा करती हैं जिसे बार-बार 'दुर्घटना' कहकर टाल दिया जाता है। केदारनाथ यात्रा के 38 दिनों में 4 हेलीकॉप्टर दुर्घटनाएं और 13 मौतें—क्या यही है "आस्था की उड़ान"? हवाई यात्रा को अब तक 'सबसे सुरक्षित यात्रा साधन' माना जाता था, लेकिन भारतीय संदर्भ में यह धारणा अब गंभीर पुनर्विचार की मांग कर रही है। डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ सिविल एविएशन (DGCA) की जिम्मेदारी केवल लाइसेंस बांटना नहीं,...

सीमावर्ती गांवों में अपराध का बढ़ता मायाजाल

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संपादकीय 17 जून 2025  *"सीमावर्ती गांवों में अपराध का बढ़ता मायाजाल:*   युवा पीढ़ी को नशे और अपराध से बचाने का अब नहीं रहा समय" --- समाज के रहनुमाओं जागो! आज हमारे देश की युवा धरोहर का अपराध की पाठशाला में दाखिला हो रहा है। ये समय जागने का है। अब नहीं जागे तो फिर मत कहना, और खून के आंसू मत रोना।  राजस्थान और हरियाणा की सीमा पर बसे गांव अब विकास की बजाय अपराध की शरणस्थली बनते जा रहे हैं। जहां पहले खेतों की हरियाली, रिश्तों की गर्माहट और गांव की सादगी जीवन का आधार थी, वहां आज ड्रग्स, अवैध हथियार, माफियाओं की हलचल और युवा पीढ़ी का नैतिक पतन नई हकीकत बनता जा रहा है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। इन इलाकों में स्थितियां इतनी गंभीर होती जा रही हैं कि अपराधी बेलगाम घूम रहे हैं और कानून की पकड़ से बचने के लिए रिश्तेदारियों का फायदा उठाकर एक राज्य से दूसरे राज्य में आसानी से निकल जाते हैं। इन सीमावर्ती गांवों में रिश्तेदारियों और स्थानीय जान-पहचान के सहारे गांव के कच्चे रास्तों पर वे अपने लिए सुरक्षित अड्डे बना चुके हैं।   *नशे की गिरफ्त में फंसत...

झाड़ू से जुड़ी गुलामी

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संपादकीय  16 जून 2025  *झाड़ू से जुड़ी गुलामी*   *"सफाई कर्मचारियों की सामाजिक बेड़ियों को तोड़ने का समय"*  भारत की सफाई व्यवस्था को कायम रखने वाले सफाई कर्मचारी लंबे समय से उपेक्षा, असमानता और अपमान की सलीब पर लटकते आ रहे हैं। ये वे लोग हैं जिनकी बदौलत नगरों की सड़कों पर चलना संभव है, अस्पताल संक्रमण से बचते हैं, और सार्वजनिक जीवन साफ-सुथरा दिखाई देता है। लेकिन क्या इनका श्रम उन्हें वह सम्मान और गरिमा दिला पाया, जिसके वे हकदार हैं? यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। आज भी इस पेशे को समाज में जिस नजर से देखा जाता है, वह जातीय और सामाजिक अन्याय का गहरा आईना है। सदियों पहले की सड़ी-गली व्यवस्था के तहत सफाई का कार्य कुछ विशेष जातियों के माथे मढ़ दिया गया, और आधुनिक भारत में भी वे उसी कार्य में फंसे हुए हैं। सवाल यह नहीं है कि सफाई क्यों जरूरी है, सवाल यह है कि यह काम सिर्फ उन्हीं जातियों के लिए क्यों जरूरी बना दिया गया है? सफाई का कार्य आज “पेशा” नहीं, बल्कि जन्म के आधार पर थोपा गया एक सामाजिक दंड बन चुका है। हजारों परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी इस कार्...

हवाई सुरक्षा की गिरती साख और अहमदाबाद हादसे से उपजी चेतावनी

संपादकीय 13 जून 2025  *हवाई सुरक्षा की गिरती साख और अहमदाबाद हादसे से उपजी चेतावनी*  गुजरात के अहमदाबाद में हाल ही में घटित हवाई जहाज हादसे ने देश को एक बार फिर गहरे सोच में डाल दिया है। यह दुर्घटना केवल एक तकनीकी चूक नहीं थी, बल्कि देश की हवाई सुरक्षा प्रणाली की बुनियादी कमियों की ओर गंभीर संकेत है। जहां एक ओर भारत विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती हुई विमानन अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, वहीं दूसरी ओर इस क्षेत्र में सुरक्षा को लेकर लापरवाही की घटनाएं भी लगातार सामने आ रही हैं। अहमदाबाद की यह घटना, जिसमें विमान क्रैश होने की जानकारी सामने आई, यह केवल एक स्थानीय त्रासदी नहीं है, बल्कि यह पूरे राष्ट्रीय विमानन ढांचे के लिए एक कड़ी चेतावनी है कि यदि हमने अभी भी सुरक्षा मानकों, तकनीकी निगरानी और जवाबदेही को लेकर अपनी लचर व्यवस्था पर लगाम नहीं लगाई, तो आने वाले समय में इसका खामियाजा समाज को व्यापक स्तर पर उठाना पड़ेगा। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। हवाई यात्रा आधुनिक जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है, लेकिन यह सुविधा तभी सार्थक है जब इसके पीछे तकनीकी मजबूती, प्रशिक्षित मा...