बधाई नहीं, सहभागिता चाहिए: जाति के गौरव से आगे बढ़िए, ज़रूरतमंद की मदद कीजिए

संपादकीय 
21-06-2025
*बधाई नहीं, सहभागिता चाहिए:  जाति के गौरव से आगे बढ़िए, ज़रूरतमंद की मदद कीजिए* 


अपनी जाति के सफल लोगों को ढूंढ कर बधाई देने वाले लोग, अपनी जाति के करीब लोगों को ढूंढ कर सहायता क्यों नहीं करते? हमारा समाज एक विचित्र दोराहे पर खड़ा है। एक तरफ हम अपने समाज की किसी महान शख्सियत—डॉक्टर, अफसर, नेता या उद्योगपति—की उपलब्धि पर गर्व महसूस करते हैं, उन्हें सोशल मीडिया पर ढूंढ-ढूंढ कर बधाइयाँ देते हैं, और पूरे समाज का गौरव घोषित कर देते हैं। वहीं दूसरी ओर, हमारी गली-मोहल्ले में रहने वाला गरीब, असहाय, बेरोजगार या बीमार व्यक्ति—जो हमारी ही जाति का, समाज का, या पड़ोस का है—उसे हम नज़रअंदाज़ कर जाते हैं, जैसे वह समाज का हिस्सा ही न हो।

यह कैसी विडंबना है कि हम जातीय पहचान पर आधारित "सफलता की पूजा" करते हैं लेकिन "जरूरतमंद की सेवा" से कतराते हैं? यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

जातिवादी गौरव बनाम सामाजिक ज़िम्मेदारी यह एक कोतुहल सवाल है। हमारे समाज में आज भी जातिवादी मानसिकता इतनी गहराई से बैठी हुई है कि कोई जब IAS, RAS, NEET या IIT पास करता है और अगर वह हमारी जाति का है, तो अचानक वह पूरे समाज का आदर्श बन जाता है। सोशल मीडिया ग्रुप, समाचार पत्रों, बधाई समारोहों में उसके फोटो छाए रहते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या ऐसे "प्रतीक-पुरुषों" के पूल बांधना ही समाज सेवा है?

क्या हम उस पड़ोसी को जानते हैं जो फीस न दे पाने के कारण पढ़ाई छोड़ रहा है? उस विधवा मां को देखते हैं जिसके बच्चे को भरपेट खाना नहीं मिलता? उस युवती को जानते हैं जो पुलिस या शिक्षक की तैयारी करना चाहती है लेकिन उसे कोचिंग या मोबाइल तक नहीं मिल रहा?

संवेदनशीलता का क्षरण हो रहा है। यह अंधभक्ति नहीं तो क्या है कि हम बस उन्हीं को पूछते हैं जो ऊंचे पद पर पहुंच चुके हैं, लेकिन समाज के बाकी गरीब, वंचित, और ज़रूरतमंदों को अनदेखा कर देते हैं? क्या यह सामाजिक बेईमानी नहीं है कि हम "अपनी जाति के हीरे" को गहनों की तरह सजाते हैं लेकिन उसी जाति के "मिट्टी में दबे हुए" लोगों को उठाने का प्रयास नहीं करते?

वर्तमान में देखा जाए तो भावनात्मक जुड़ाव नहीं, प्रदर्शन प्रधान समाज बनता जा रहा है।
सच्चा समाज वही होता है जो दर्द को बांटे, जो कमजोर को ताकत दे, जो गरीब की आवाज़ बने। लेकिन हम सिर्फ फोटोग्राफ, समारोह और संदेशों तक सीमित हो गए हैं। यह "सेल्फी समाज" बनता जा रहा है जहां संवेदना की जगह प्रदर्शन और प्रचार ने ले ली है।

देश का भविष्य उन गरीब बच्चों से तय होगा जो आज भूखे पेट पढ़ाई कर रहे हैं। समाज का उत्थान उन परिवारों से होगा जिनके पास शौचालय, बिजली, इंटरनेट या चिकित्सा तक की सुविधा नहीं है। अगर आपको अपनी जाति पर गर्व है, तो उसे शिक्षा, स्वास्थ्य, स्किल और रोजगार से मजबूत बनाइए

समाज तभी आगे बढ़ेगा जब हर सक्षम व्यक्ति किसी एक गरीब बच्चे की पढ़ाई का खर्च उठाए। जब कोई व्यापारी किसी बेरोजगार को रोजगार दे। जब एक शिक्षक समय निकालकर गांव के बच्चों को पढ़ाए। जब हम किसी गरीब की मदद गुप्त रूप से, बिना प्रचार के करें।

बड़े नामों की पूजा छोड़िए, छोटे जीवनों को सहारा दीजिए।
यदि समाज में बदलाव चाहिए, तो केवल बधाई देने से काम नहीं चलेगा—साझेदारी, सहभागिता और सेवा ही सच्चा समाज निर्माण करेंगी।
 "जहाँ बधाई खत्म हो और सहयोग शुरू, वहीं से समाज का पुनर्जागरण होगा।
“न पूजो मूर्तियाँ काँच की,
ना बांटो बस जयजयकार,
किसी भूखे को रोटी दे दो,
वो असली है त्यौहार।”

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