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Showing posts from May, 2025

पंचायती राज में भ्रष्टाचार – रेवड़ी तंत्र बनाम जनकल्याण

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संपादकीय:  1 जून2025  *पंचायती राज में भ्रष्टाचार – रेवड़ी तंत्र बनाम जनकल्याण*  भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की जड़ें गांवों में बसे पंचायती राज संस्थानों तक फैली हुई हैं। इन्हें स्थानीय शासन की आत्मा कहा गया था, जहां जनभागीदारी से विकास की कल्पना की गई थी। लेकिन आज स्थिति यह है कि यह प्रणाली अनेक स्थानों पर भ्रष्टाचार का अड्डा बन गई है – एक ऐसी रेवड़ी व्यवस्था, जहां अधिकार वंचितों से छीनकर अपात्रों में बांटे जा रहे हैं और योजनाओं के नाम पर लूट की दुकान चल रही है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। केंद्र और राज्य सरकारें गांवों के विकास के लिए अनेक योजनाएं लाती हैं – जैसे प्रधानमंत्री आवास योजना, मनरेगा, स्वच्छ भारत अभियान या जल जीवन मिशन। कागज़ों में यह योजनाएं समाज के सबसे निचले तबके तक राहत पहुंचाने का दावा करती हैं। लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि फर्जीवाड़े, कमीशनखोरी और अपात्र लाभार्थियों की सूची बनाकर इन योजनाओं को “कमाई का जरिया” बना दिया गया है। आजकल देश में योजनाओं के नाम पर बंदरबांट की राजनीति हो रही है। पंचायतें जनहित के बजाय गुटबाजी, सिफारिश...

जीवन: समय, संघर्ष और संकल्प की यात्रा

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संपादकीय  31 मई 2025  *"जीवन: समय, संघर्ष और संकल्प की यात्रा"*  "जीवन एक यात्रा है जो ख़ुशी, दर्द और सीख से भरी होती है — लेकिन कुछ दिन ऐसे होते हैं जो हमारे दिल और दिमाग पर स्थायी छाप छोड़ जाते हैं।" मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। हम सब जीवन की एक ऐसी रेलगाड़ी में सवार हैं, जिसकी दिशा तय है — लेकिन उसकी गति और पड़ाव, हमारे निर्णयों, अनुभवों और विचारों से बनते हैं। कभी यह यात्रा फूलों से सजी लगती है, कभी कांटों से चुभती। कभी हम जीतते हैं, कभी हारते हैं, लेकिन हर एक मोड़ हमें कुछ न कुछ सिखाता जरूर है। आज के तेज़ रफ्तार और प्रतिस्पर्धा से भरे युग में, जीवन एक सतत संघर्ष बन चुका है। यहाँ जीतने वाला ही सराहा जाता है — "उगते सूरज को ही सलाम" की मानसिकता समाज में गहराई तक पैठ चुकी है। लोग सफलता के पीछे भाग रहे हैं, और उस दौड़ में बहुत कुछ खोते जा रहे हैं — रिश्ते, संवेदनाएं, समय और कभी-कभी स्वयं को भी। स्वार्थ और संवेदनहीनता के इस युग में, यह आश्चर्य की बात नहीं कि भावनाओं की कीमत कम हो गई है। आज का मनुष्य अधिकतर "मैं" और "मेरा...

शिक्षा का दीप: ज्ञान से जीवन तक की यात्रा

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संपादकीय  29 मई 2025  *"शिक्षा का दीप: ज्ञान से जीवन तक की यात्रा"*  शिक्षा किसी भी समाज की रीढ़ होती है। यह केवल डिग्री या परीक्षा उत्तीर्ण करने की प्रक्रिया भर नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला सिखाने वाली शक्ति है। जिस प्रकार दीपक अंधकार में प्रकाश फैलाता है, उसी प्रकार शिक्षा जीवन की अज्ञानता, भ्रम और कुंठाओं का नाश करती है। बौद्ध ग्रंथ महापरिनिर्वाण सुत्त में तथागत बुद्ध ने कहा था – "अप्पो दीपो भव", अर्थात् अपने दीपक स्वयं बनो। यह वाक्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना उस समय था। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली और परीक्षा परिणामों पर चिंता व्यक्त करें तो वर्तमान समय में शिक्षा का स्वरूप कई बदलावों के दौर से गुजर रहा है। हाल ही में बोर्ड परीक्षाओं में आए कुछ चौंकाने वाले परिणामों ने शिक्षा की गुणवत्ता और मूल्यांकन पद्धति को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। आज कई छात्र 95% से ऊपर अंक प्राप्त कर रहे हैं, फिर भी उनमें आत्मविश्वास, संप्रेषण क्षमता, नैतिक मूल्यों और व्यावहारिक ज्ञान की कमी स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। शिक...

सच्ची खूबसूरती: आईने में नहीं, अंतःकरण में बसती है

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संपादकीय 28मई 2025  *"सच्ची खूबसूरती: आईने में नहीं, अंतःकरण में बसती है"*  इस तेज़ी से भागती दुनिया में जहाँ सौंदर्य का अर्थ अधिकतर चमकते चेहरे, दमकती त्वचा और सजे-संवरे शरीर से लगाया जाता है, वहीं कुछ लोग आज भी यह मानते हैं कि खूबसूरती की परिभाषा इससे कहीं गहरी, कहीं सच्ची और कहीं स्थायी होती है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। आज के दौर में सोशल मीडिया, फैशन इंडस्ट्री और ग्लैमर की चकाचौंध ने सुंदरता को बाज़ारू बना दिया है। चेहरे की रेखाओं, त्वचा के रंग और शरीर की बनावट को खूबसूरती का पैमाना बना दिया गया है। लेकिन क्या कभी हमने सोचा है कि जिस शरीर को आज सुंदर मान कर सर-आँखों पर बिठाया जाता है, वही शरीर मृत्यु के बाद घर में भी नहीं रखा जाता? उसे अग्नि को सौंप दिया जाता है। क्यों? क्योंकि सच्चाई यही है कि असली सुंदरता उस शरीर में नहीं होती, बल्कि उस शरीर में बसी आत्मा, उसके संस्कार, उसकी सोच, उसका व्यवहार और उसके कर्म ही किसी इंसान को सुंदर बनाते हैं। जिस तरह एक वृक्ष की सुंदरता उसके पत्तों और फूलों से होती है, परंतु उसकी असली मजबूती उसकी जड़ों में होती...

चांदी की गाय- "गोदान या दिखावा : धर्म के नाम पर लूटा जा रहा गाय का निवाला"

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संपादकीय 27 मई 2025  *"गोदान या दिखावा : धर्म के नाम पर लूटा जा रहा गाय का निवाला"*  भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म की जड़ें इतनी गहरी हैं कि वे जन्म से मृत्यु तक जीवन के हर पड़ाव पर धर्म से जुड़ी किसी न किसी परंपरा में लिपटी मिलती हैं। इन परंपराओं का उद्देश्य आत्मा की शांति, समाज की सद्भावना और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता रहा है। लेकिन जब धर्म व्यापार बन जाए, परंपरा प्रदर्शन बन जाए और आस्था अवसरवादियों का औजार बन जाए, तब केवल परंपराएं ही नहीं, संवेदनाएं भी घायल होती हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। ऐसी ही एक संवेदनशील परंपरा है — गोदान। मृत्यु के बाद ब्रह्मपुरी या पिंडदान से पहले गोदान की परंपरा को धार्मिक शास्त्रों में महत्वपूर्ण माना गया है। इसका उद्देश्य मृतक आत्मा को मोक्ष दिलाने के साथ-साथ गाय जैसे पूजनीय प्राणी के कल्याण में योगदान देना रहा है। लेकिन आज यह परंपरा अपने मूल भाव से भटक गई है। पंडितजन गोदान के नाम पर चांदी की गाय, बाल्टी, रस्सी, पानी का पात्र, चारा आदि दान स्वरूप मांगते हैं। लेकिन यह पूरा आयोजन एक दिखावे की रस्म बनकर रह गया है। न...

कौशलयुक्त युवा ही आत्मनिर्भर भारत की रीढ़

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संपादकीय  24 मई 2025  *कौशलयुक्त युवा ही आत्मनिर्भर भारत की रीढ़*  भारत विश्व की सबसे युवा आबादी वाला देश है। यह जनसांख्यिकीय लाभांश  देश की सबसे बड़ी ताकत है, परंतु यह तब तक लाभ नहीं दे सकता जब तक युवा वर्ग में आवश्यक व्यावसायिक और तकनीकी कौशल विकसित न हो। आज का यथार्थ यह है कि लाखों युवा उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, लेकिन उनमें से अधिकांश को रोजगार के लायक कौशल नहीं मिल पाता, जिससे देश में शिक्षित बेरोजगारी तेजी से बढ़ रही है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। आज भारत "डिजिटल इंडिया", "मेक इन इंडिया", और "आत्मनिर्भर भारत" जैसी योजनाओं के जरिए वैश्विक आर्थिक मंच पर नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ रहा है। लेकिन अगर देश के युवा कुशल नहीं होंगे, तो ये योजनाएं केवल कागज़ों तक ही सीमित रह जाएंगी। कौशल विकास क्यों आवश्यक है? 1. शिक्षा और रोजगार के बीच की खाई: शिक्षा प्रणाली में आज भी थ्योरी आधारित पाठ्यक्रम अधिक हैं, जबकि उद्योगों को व्यावहारिक और तकनीकी रूप से दक्ष कर्मियों की आवश्यकता है। बीएसी पास छात्र को डेटा ऐनालिटिक्स या साइबर सिक्योर...

प्यासे परिंदों की पुकार: इंसानियत की असली परीक्षा

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संपादकीय  दिनांक 22 मई 2025  *"प्यासे परिंदों की पुकार: इंसानियत की असली परीक्षा"*  गर्मी का मौसम अपने चरम पर है। आसमान से आग बरस रही है और तपती दोपहरों में हर जीव व्याकुल है। हम इंसानों के लिए तो जगह-जगह नल, कूलर, एसी और प्याऊ की व्यवस्था होती है, लेकिन वे नन्हे परिंदे, जो पूरे आसमान को अपना घर समझते हैं, उन्हें जल की एक बूंद के लिए संघर्ष करना पड़ता है। यह एक ऐसा संकट है, जिसे हम चाहें तो बहुत सहजता से हल कर सकते हैं। जहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। आज समय आ गया है जब हमें अपनी मानवीय संवेदनाओं का परिचय देना होगा। पक्षी भी हमारी प्रकृति का हिस्सा हैं, जो हमारी छतों, आंगनों और पेड़ों पर बसेरे बनाते हैं। लेकिन भीषण गर्मी के कारण जब उन्हें पीने का पानी तक नहीं मिलता, तो वे बेहोश होकर गिर जाते हैं। यह एक मूक त्रासदी है, जिसे हम प्रायः अनदेखा कर देते हैं। ऐसे में हम सभी की जिम्मेदारी बनती है कि हम अपनी छतों, बालकनियों और आंगनों में पानी और दाने की व्यवस्था करें। मिट्टी के बर्तन में रखा गया एक कटोरा पानी किसी परिंदे की जान बचा सकता है। एक मुट्ठी दाना कि...

*संविधान की सर्वोच्चता: लोकतंत्र की त्रिस्तरीय आधारशिला का आत्ममंथन*

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संपादकीय दिनांक 21-05-2025   *संविधान की सर्वोच्चता: लोकतंत्र की त्रिस्तरीय आधारशिला का आत्ममंथन*  भारतीय लोकतंत्र की नींव तीन प्रमुख स्तंभों—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—पर टिकी है। ये तीनों अपनी-अपनी सीमाओं में रहकर राष्ट्र के संचालन में योगदान देते हैं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश बी.आर. गवई ने मुंबई में यह अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि “यदि कोई सर्वोच्च है, तो वह है संविधान।” यह वक्तव्य केवल औपचारिक या प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि उस गंभीरता का संकेत है जो वर्तमान समय में लोकतंत्र की संस्थाओं के बीच संतुलन को लेकर आवश्यक हो चला है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। प्रधान न्यायाधीश की यह टिप्पणी इसलिए भी प्रासंगिक है क्योंकि आज के परिप्रेक्ष्य में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच टकराव, विवाद और परस्पर अविश्वास की घटनाएं बढ़ रही हैं। इन संस्थाओं में मतभेद होना अस्वाभाविक नहीं, लेकिन जब यह मतभेद सार्वजनिक बहस, राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और प्रशासनिक असंतुलन का कारण बनने लगे, तो यह लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए खतरे का ...

मर्यादा की सीमा लांघते मंत्री और मौन होती राजनीति"

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संपादकीय  19मई2025  *"मर्यादा की सीमा लांघते मंत्री और मौन होती राजनीति"*  लोकतंत्र की बुनियाद भाषा और आचरण की मर्यादाओं पर टिकी होती है, लेकिन आज भारतीय राजनीति में यह बुनियाद बार-बार हिलती दिखाई दे रही है। मंत्रियों और नेताओं की बदजुबानी अब एक अपवाद नहीं, बल्कि चलन बनती जा रही है। मध्य प्रदेश के मंत्री विजय शाह का ताज़ा मामला इसका ताज़ा उदाहरण है, जिसमें उन्होंने भारतीय सेना की एक महिला अधिकारी कर्नल सोफिया कुरैशी को लेकर जिस स्तर की भाषा का प्रयोग किया, उसे “गटर की भाषा” कहने से भी संकोच होता है। ऐसे वक्तव्य न केवल व्यक्तिगत मर्यादा का उल्लंघन हैं, बल्कि देश की संप्रभुता और राष्ट्रीय संस्थाओं के प्रति अवमानना की श्रेणी में भी आते हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।  यह घटना तब और गंभीर हो जाती है जब हम देखते हैं कि सेना जैसी संस्था, जो धर्म, जाति, भाषा और लिंग से ऊपर केवल ‘भारतीयता’ की भावना से कार्य करती है, उसके अधिकारी निशाने पर लिए जाते हैं — कभी मजहब के नाम पर, कभी राजनीतिक एजेंडे के तहत। क्या यह हमारी तथाकथित राष्ट्रवादी राजनीति का अस...

गरिमा की राजनीति: जब नेतृत्व रीढ़ की हड्डी बन जाए"*

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*"गरिमा की राजनीति: जब नेतृत्व रीढ़ की हड्डी बन जाए"*  18 मई2025 इतिहास कुछ ऐसे क्षणों को संजोकर रखता है, जो न केवल समय की धारा को मोड़ते हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को यह सिखाते हैं कि सच्चा नेतृत्व क्या होता है। नवंबर 1971 का वह शीतकालीन दौर भी ऐसा ही था, जब भारत की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के सामने जिस अदम्य साहस, आत्मसम्मान और राष्ट्रवादी चेतना का प्रदर्शन किया, उसने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत की प्रतिष्ठा को नई ऊंचाई दी। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। अमेरिकी दबाव और धमकी के सामने बिना घबराए इंदिरा गांधी का यह कहना कि "भारत अमेरिका को मित्र मानता है, मालिक नहीं" — केवल एक राजनीतिक उत्तर नहीं था, बल्कि यह स्वतंत्र भारत की आत्मा की गूंज थी। यह उस युग की एक महिला नेता की गरिमापूर्ण दृढ़ता थी, जिसने पूरी दुनिया को यह बताया कि भारत अब किसी के दबाव में झुकने वाला देश नहीं है। इस घटना के बाद जब इंदिरा गांधी ने अपने राजनीतिक विरोधी अटल बिहारी वाजपेयी को भारत का पक्ष संयुक्त राष्ट्र में रखने के...