गरिमा की राजनीति: जब नेतृत्व रीढ़ की हड्डी बन जाए"*

*"गरिमा की राजनीति: जब नेतृत्व रीढ़ की हड्डी बन जाए"* 
18 मई2025

इतिहास कुछ ऐसे क्षणों को संजोकर रखता है, जो न केवल समय की धारा को मोड़ते हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को यह सिखाते हैं कि सच्चा नेतृत्व क्या होता है। नवंबर 1971 का वह शीतकालीन दौर भी ऐसा ही था, जब भारत की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के सामने जिस अदम्य साहस, आत्मसम्मान और राष्ट्रवादी चेतना का प्रदर्शन किया, उसने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत की प्रतिष्ठा को नई ऊंचाई दी। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

अमेरिकी दबाव और धमकी के सामने बिना घबराए इंदिरा गांधी का यह कहना कि "भारत अमेरिका को मित्र मानता है, मालिक नहीं" — केवल एक राजनीतिक उत्तर नहीं था, बल्कि यह स्वतंत्र भारत की आत्मा की गूंज थी। यह उस युग की एक महिला नेता की गरिमापूर्ण दृढ़ता थी, जिसने पूरी दुनिया को यह बताया कि भारत अब किसी के दबाव में झुकने वाला देश नहीं है।
इस घटना के बाद जब इंदिरा गांधी ने अपने राजनीतिक विरोधी अटल बिहारी वाजपेयी को भारत का पक्ष संयुक्त राष्ट्र में रखने के लिए चुना, तो यह और भी बड़ा संदेश था — कि राष्ट्रहित में व्यक्तिगत या दलगत भेदभाव गौण हो जाते हैं। वाजपेयी जी की प्रतिक्रिया — "बगीचा सिर्फ गुलाब से नहीं महकता…" — भारत के लोकतंत्र की परिपक्वता और भारतीय राजनीति की मूल चेतना को दर्शाती है।
आज जब हम विभाजनकारी राजनीति, व्यक्तिगत स्वार्थों और दलगत संकीर्णताओं से घिरे हुए हैं, तब 1971 की यह घटना इतिहास की तरह नहीं, बल्कि एक जीवंत उदाहरण के रूप में हमारे सामने खड़ी होती है। यह हमें याद दिलाती है कि सच्चा नेतृत्व वह होता है, जो संकट की घड़ी में राष्ट्र की गरिमा को सर्वोपरि रखता है, और विपक्षी स्वर को भी राष्ट्रमंच पर आमंत्रित करता है।
भारत ने यह हमेशा सिद्ध किया है कि भले ही वह एक विकासशील राष्ट्र रहा हो, उसकी रीढ़ कभी झुकी नहीं। इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं की परिपक्वता, दृष्टिकोण और राष्ट्रप्रेम आज की राजनीति के लिए प्रेरणास्रोत हैं।
 जब नेतृत्व गरिमा से संचालित हो और जब राष्ट्रीय हित सबसे ऊपर रखा जाए, तब इतिहास स्वयं नेतृत्व को नायक बना देता है — नायक, जो कुर्सी से नहीं, चरित्र से महान बनता है।

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