Posts

Showing posts from September, 2025

क्रोध : मुफ्त का वाई-फाई या दिमाग का वायरस?

Image
संपादकीय 29 सितंबर 2025  *“क्रोध : मुफ्त का वाई-फाई या दिमाग का वायरस?”*  “क्रोध वह आग है जिसमें सबसे पहले आप खुद जलते हैं और राख बाकी लोगों पर उड़ाकर दावा करते हैं – देखो मैंने उन्हें सबक सिखा दिया!” हमारे देश में दो चीज़ें मुफ्त हैं – सलाह और क्रोध। सलाह हम हर किसी को बांटते हैं, और क्रोध हम हर किसी पर बरसाते हैं। आप गौर कीजिए, हमारी सुबह की शुरुआत ही क्रोध से होती है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।  हमारे दिन की शुरुआत सुबह होती है तो क्रोध रचना शुरू हो जाता है जैसे दूधवाला देर से आए तो क्रोध, बस वाला आगे निकल जाए तो क्रोध, टीवी पर न्यूज एंकर ज्यादा चिल्ला दे तो क्रोध और अगर घरवाले याद दिला दें कि मोबाइल चार्ज कर लो, तो क्रोध का स्तर तो जैसे संसद का शीतकालीन सत्र बन जाता है – गरमा-गरमी ही गरमा-गरमी! लेकिन क्या आपने देखा है? महान लोग क्रोध को मुफ्त वाई-फाई की तरह इस्तेमाल नहीं करते। उनके पास उसका पासवर्ड होता है – संयम। हम जैसे सामान्य लोग बिना पासवर्ड के वाई-फाई पकड़ लेते हैं और फिर वायरस (यानी झगड़े) पूरे सिस्टम में फैल जाते हैं।गांधीजी या सरदा...

शिक्षक सम्मेलन : चाय-समोसे में शिक्षा का भविष्य?

Image
संपादकीय 28 सितंबर 2025  *“शिक्षक सम्मेलन : चाय-समोसे में शिक्षा का भविष्य?”*  राजस्थान में इन दिनों जगह-जगह शिक्षक संगठनों के सम्मेलन हो रहे हैं। मंच सजे हैं, पोस्टर लगे हैं, और भीड़ जुटाई जा रही है—लेकिन सवाल यह है कि इन सम्मेलनों में आखिर हो क्या रहा है? शिक्षा की गुणवत्ता पर चर्चा या फिर नेताओं की चाटुकारिता और तबादलों की राजनीति? अनेकों सवालों की उलझन में यदि यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। दुःखद यह है कि जिन मंचों को नई शिक्षा नीति, पाठ्यक्रम सुधार, शिक्षक-छात्र संवाद, और तकनीकी बदलावों पर गंभीर बहस का केन्द्र होना चाहिए, वे मंच अब सत्ता और संगठन की ताकत दिखाने के अखाड़े बन गए हैं। शिक्षक नेता अपने-अपने गुटों के साथ ‘किसका तबादला बचाना है’ और ‘किसको किक लगानी है’ जैसी फुसफुसाहटों में व्यस्त हैं। शिक्षा सुधार, नई नीति, या गरीब तबके के बच्चों को मुख्यधारा में लाने के प्रयास जैसे मुद्दों पर शायद ही कोई बात हो रही हो। यह भी कड़वी सच्चाई है कि अधिकांश सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर गिरता जा रहा है। मंत्रिमंडल और विभागीय अधिकारी आंकड़ों की बाज़ीगरी से...

गौशालाओं के नाम पर अनुदान की मलाई और सड़कों पर भूखी ‘गौ माता

Image
संपादकीय 27 सितंबर 2025  *"गौशालाओं के नाम पर अनुदान की मलाई और सड़कों पर भूखी ‘गौ माता’"*  गाय — जिसे हमारी संस्कृति में "माता" का दर्जा दिया गया, आज राजनीति और दिखावे की ‘सौतेली संतान’ बन चुकी है। बात कितनी विडंबनापूर्ण है कि दिन में वही गाय मंदिर और गोशालाओं में पूजी जाती है, लेकिन रात को अगर किसी किसान के खेत में घुस जाए, तो उसी की पीठ पर डंडे बरसाए जाते हैं। यह दोहरापन केवल व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे समाज और व्यवस्था का है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। आज हालत यह है कि गाय के नाम पर सरकारें करोड़ों-अरबों के अनुदान जारी करती हैं। कई गोशालाएं साल में 30 लाख से ऊपर की राशि प्राप्त करती हैं। ऊपर से भामाशाहों और श्रद्धालु जनता का दान अलग। लेकिन जरा गांव-शहर की सड़कों पर निकलकर देख लीजिए— वही "गौ माता" कचरे के ढेर में पॉलीथीन चरती मिलेंगी, सब्ज़ी मंडियों और हाईवे पर दुर्घटनाओं की वजह बनती नज़र आएंगी। सवाल उठता है कि आखिर वह पैसा कहां जा रहा है? असलियत यह है कि गोशालाओं का सच ‘दिखावे की कुछ दुधारू गायों’ तक सीमित है, क्योंकि वहीं स...

आलस्य – शैतान का घर, कर्म ही जीवन का आधार

Image
संपादकीय 26 सितंबर 2025  *“आलस्य – शैतान का घर, कर्म ही जीवन का आधार”*  कहावत है – “खाली दिमाग शैतान का घर होता है।” यह केवल एक कहावत नहीं, बल्कि जीवन का कठोर सत्य है। आलस्य इंसान को धीरे-धीरे भीतर से खोखला कर देता है। जिस क्षण हम निष्क्रिय होते हैं, उसी क्षण बुरे विचार हमारे मन पर दस्तक देने लगते हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। आज समाज में सबसे बड़ी समस्या यही है कि लोग अवसर और समय की कद्र नहीं कर रहे। जिनके पास काम होते हुए भी वे काम टालते रहते हैं, बहाने ढूंढते रहते हैं – वे न केवल अपनी क्षमताओं को मारते हैं बल्कि अपने भविष्य के रास्ते भी बंद कर लेते हैं। यही आलस्य हमें गप्पेबाजी, शिकायतों और नकारात्मकता की दलदल में धकेल देता है। दूसरी ओर, कर्मयोगी व्यक्ति का उदाहरण देखिए। जिसके पास काम नहीं होता, वह भी खुद को व्यस्त रखने के लिए कोई न कोई रचनात्मक कार्य खोज लेता है। यही सक्रियता उसे आगे बढ़ाती है और दूसरों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनाती है। आज का छात्र हो या युवा, कामकाजी हो या गृहिणी – हर किसी को यह समझना होगा कि समय बर्बाद करने का मतलब है जीवन ब...

फासले नहीं, सेतु बनाइए — जनरेशन-गैप को पाटने का सही वक्त

Image
संपादकीय- 25 सितंबर 2025 *फासले नहीं, सेतु बनाइए — जनरेशन-गैप को पाटने का सही वक्त*  देश तेज़ी से बदल रहा है — तकनीक, रोज़गार के नए रूप, जीवनशैली के नये नियम। बदलती दुनिया के साथ जब नई पीढ़ी की सोच-रफ़्तार और पुरानी पीढ़ी के अनुभव के बीच खाई गहरी होती जा रही है, तो यह केवल पारिवारिक मामलों तक सीमित नहीं रहता; यह समाज की समरसता, घरेलू संतुलन और राष्ट्रीय जागरूकता पर असर डालता है। आज का “जनरेशन गैप” महज उम्र का अंतर नहीं, विचारों, मूल्यों, सामाजिक दृष्टिकोण और जीवन-शैली का फासला है — और यह फासला भरना हम सबका काम है। जहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। फर्क पहचानिए और उसकी जड़ों की तलाश कीजिए। नई पीढ़ी की जीवनशैली तेज़, मोबाइल-प्रधान और अवसरवादी है। वे वैश्विक प्रवृत्तियों को अपनाती है, करियर-सोच में आगे रहती है और बदलते करियर पैटर्न में स्वतन्त्रता चाहती है। दूसरी ओर बुज़ुर्गों की पहचान अनुभव, परंपरा और सुरक्षा-प्रथाओं से जुड़ी रही है; वे संबंधों और सम्मान के पुराने मानदण्डों पर विश्वास रखते हैं। जब नई पीढ़ी “तुरंत” और “व्यावहारिक” होना चाहती है, तो पुराने मान्य नि...

देवी के पंडालों में भक्ति, गलियों में बेटियों की दुर्दशा

Image
संपादकीय  24 अक्टूबर 2025  *“देवी के पंडालों में भक्ति, गलियों में बेटियों की दुर्दशा”*  देश में नवरात्रि का माहौल है। जगह-जगह दुर्गा मां के भव्य पंडाल सज रहे हैं। भक्तजन देवी को फूल, प्रसाद, चुनरी अर्पित कर रहे हैं। घर-घर में कन्या पूजन की तैयारी है—अबोध बालिकाओं के पैर धोए जाएंगे, उन्हें देवी मानकर भोज कराया जाएगा। लेकिन ज़रा पंडाल से बाहर कदम रखिए, वही कन्याएं गलियों और घरों में असली जिंदगी जी रही हैं, जहां उनके सम्मान की कोई कीमत नहीं। मैं यहां बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। यह अजीब विडंबना नहीं तो और क्या है कि देवी मां को ‘महिषासुर मर्दिनी’ के रूप में पूजने वाला समाज, अपनी ही गलियों के राक्षसों से बेटियों को बचा नहीं पा रहा? हर साल ढोल-नगाड़ों पर देवी के जयकारे गूंजते हैं, लेकिन उसी बीच अखबारों के पहले पन्ने पर ‘अबोध बच्ची से दुष्कर्म’ जैसी खबरें भी गूंजती रहती हैं। और समाज? वह मौन साध लेता है। हम कन्याओं को थाली में हलवा-पूरी परोसकर देवी मान लेते हैं, लेकिन जब वही बच्चियां शिक्षा मांगती हैं तो स्कूलों में दो महीने तक किताबें तक नहीं मिलतीं। जब वही यु...

आस्था का अर्थ: दुर्गा पूजा से नारी सम्मान तक

Image
संपादकीय 23 सितंबर 2025   *“आस्था का अर्थ: दुर्गा पूजा से नारी सम्मान तक”*  नवरात्रि का पर्व पूरे देश में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। जगह-जगह देवी दुर्गा की प्रतिमाएं सजी हैं, भजन-कीर्तन गूंज रहे हैं और भक्तजन मां की आराधना में लीन हैं। दुर्गा अष्टमी और नवमी पर तो विशेष रूप से कन्या पूजन का आयोजन होता है—जहां अबोध बालिकाओं के चरण पखारे जाते हैं, उन्हें देवी स्वरूपा मानकर भोजन कराया जाता है। यह परंपरा हमारी सनातन संस्कृति की महान धरोहर है, जो हमें सिखाती है कि नारी शक्ति ही सृष्टि की आधारशिला है। यह मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।  लेकिन, इस आस्था और श्रद्धा के उत्सव के समानांतर एक कड़वी सच्चाई भी हमें झकझोरती है। वही समाज जहां देवी के चरण पूजे जाते हैं, वहीं दूसरी ओर अबोध बालिकाओं के साथ बलात्कार की अमानवीय घटनाएं सामने आती हैं। रिश्तों की आड़ में छिपे भेड़ियों द्वारा मासूम बेटियों की इज्ज़त लूट लेना, यह दिखाता है कि अपराध की जड़ें घर के भीतर तक फैली हुई हैं। प्रश्न यह उठता है कि क्या हमारी भक्ति केवल मंदिरों तक सीमित रह गई है? क्या दे...

किताब मांगना गुनाह कब से हो गया?

Image
✍🏻 संपादकीय 21 September 2025  *"किताब मांगना गुनाह कब से हो गया?"*  राजस्थान की शिक्षा व्यवस्था पर यह एक करारा तमाचा है कि दो महीने बीत जाने के बाद भी गरीब मासूम बच्चों को निशुल्क पाठ्य पुस्तकें नहीं मिल पाई हैं। शिक्षा का अधिकार केवल कागजों में ही रह गया है और मैदान में बच्चों की आंखों में उम्मीदें धुंधली होती जा रही हैं। और जब एक शिक्षक – नोलाराम जाखड़ – ने इस अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद की, तो सरकार ने बच्चों को किताबें नहीं, बल्कि शिक्षक को दंड का फरमान सुना दिया। सवाल उठता है: क्या गरीब बच्चों के लिए किताब मांगना सचमुच गुनाह है? यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।  राजस्थान की सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर अगर किसी ने सटीक व्यंग लिखना हो तो हालिया घटनाक्रम से बेहतर उदाहरण शायद ही मिले। कल्पना कीजिए—कक्षा में बैठे मासूम बच्चे, जिनकी आंखों में सपनों का संसार है, लेकिन हाथों में किताबें नहीं। सवाल उठाने वाला शिक्षक नायक बन सकता था, लेकिन यहां तो उसे खलनायक बना दिया गया। सीकर जिले के नोलाराम जाखड़ ने बच्चों के हक की आवाज उठाई—“सरकार जी! दो महीने बीत गए, क...

युवा की चीखें दबाना, राष्ट्र का भविष्य कुचलने जैसा

Image
संपादकीय 22 September 2025  *“युवा की चीखें दबाना, राष्ट्र का भविष्य कुचलने जैसा”*  आज देश का युवा अजीब और विचित्र स्थिति में जी रहा है। एक ओर कांवड़ लाने वाले युवाओं का स्वागत फूल-मालाओं और इत्र वर्षा से होता है, तो दूसरी ओर रोजगार मांगने वाले और परीक्षा देने वाले युवाओं पर पुलिस की लाठियाँ बरसती हैं। यह कैसा अन्याय है कि जो अपनी मेहनत, अपने सपनों और अपनी योग्यता के दम पर राष्ट्र को मजबूत करना चाहता है, उसे सड़कों पर घसीटा जा रहा है? और देश की युवा संपदा अंधविश्वास की आंधी में दौड़ में डूबने को तैयार है वह स्वागत पा रहा है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। आज युवाओं का दर्द कौन जाने? देश के आकांओ को जुमले वाले भाषणों से ही फुर्सत ही नहीं। भर्तियों के नाम पर वर्षों इंतजार कराया जाता है, परीक्षाएँ होती हैं लेकिन परिणाम आने में सालों लग जाते हैं। कभी भर्ती निरस्त, कभी पेपर लीक, कभी कोर्ट केस — यह सब मिलकर युवा के सपनों को चूर-चूर कर देते हैं। नौकरी मिलने के बाद भी निर्दोषों को फर्जीवाड़े की आड़ में हटाया जा रहा है। कोर्ट-कचहरी में लटकी ज़िंदगियाँ और अधूरे स...

अहंकार का सेल्फी युग: लाइक्स के सिंहासन पर बैठे राजा

Image
संपादकीय  20 September 2025 *अहंकार का सेल्फी युग: लाइक्स के सिंहासन पर बैठे राजा*  कभी अहंकार का ठिकाना महलों, सिंहासन और सोने-चाँदी के खजाने में होता था। राजा-महाराजा ताकत और संपत्ति के नशे में चूर रहते थे। लेकिन समय बदल गया है। अब अहंकार का सिंहासन बदलकर स्मार्टफोन की स्क्रीन पर टिक गया है, और दरबारियों की जगह फॉलोअर्स आ गए हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। आजकल तो लोग एक कप चाय पी लें, तो उसका फोटो डालते हैं – “चाय विद पॉजिटिव वाइब्स”। लाइक्स आते हैं, कमेंट्स आते हैं – और अहंकार पंख लगाकर उड़ जाता है। पहले लोग मंदिर बनवाकर अपना नाम पत्थर पर खुदवाते थे, अब लोग सेल्फी डालकर इंस्टा-फेसबुक पर फीलिंग ब्लेस्ड लिख देते हैं। फर्क बस इतना है कि पहले अहंकार पत्थरों में उकेरा जाता था, अब डिजिटल स्क्रीन पर। ज्ञान का अहंकार भी खूब बिक रहा है। दो लाइनें पढ़कर कोई यूट्यूब पर “मोटिवेशनल स्पीकर” बन जाता है और फिर अपनी ही तारीफ में घंटेभर की वीडियो डाल देता है। जिनकी खुद की जिंदगी का बैलेंस शीट गड़बड़ है, वे दूसरों को “लाइफ बैलेंस” सिखाने में लगे हैं। दान का अहंकार...

हंसते-मुस्कराते चेहरे का आकर्षण और समाज में उसका महत्व

Image
संपादकीय  18 सितंबर 2025   *हंसते-मुस्कराते चेहरे का आकर्षण और समाज में उसका महत्व*  आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जब हर कोई तनाव, चिंता और चुनौतियों से जूझ रहा है, ऐसे समय में एक हंसता-मुस्कराता चेहरा सबसे बड़ी राहत देता है। सच कहा जाए तो प्रसन्नचित व्यक्ति अपने आसपास सकारात्मकता का वातावरण रच देता है। उसकी उपस्थिति में लोग सहज अनुभव करते हैं, मन प्रसन्न होता है और बातचीत करने का मन बार-बार करता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। हंसते हुए व्यक्ति की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि वह दूसरों को भी मुस्कुराना सिखा देता है। जब कोई इंसान संतुष्ट और आत्मविश्वासी दिखाई देता है, तो लोग मान लेते हैं कि उसने जीवन की कठिनाइयों पर विजय पा ली है। इसी कारण उससे जुड़ने और मित्रता करने की स्वाभाविक चाह हर किसी के मन में जन्म लेती है। हालांकि, यह भी सच है कि हर मुस्कुराता चेहरा भीतर से प्रसन्न हो, यह ज़रूरी नहीं। कई बार हंसी बाहरी आवरण भी हो सकती है। लेकिन समाज की दृष्टि से देखा जाए तो जो व्यक्ति प्रसन्नचित रहता है, वह न केवल अपने लिए सुखद वातावरण बनाता है, ...

समय के साथ सीखें, रिश्तों का सफर है जीवन की सच्चाई

Image
संपादकीय 16 सितंबर 2025 *समय के साथ सीखें, रिश्तों का सफर है जीवन की सच्चाई*  जीवन के सफर में हर मोड़ पर रिश्तों का आना और जाना स्वाभाविक प्रक्रिया है। शुरुआत में जब कोई व्यक्ति हमारे जीवन में प्रवेश करता है, तो हम उसे अपनी खुशियों और उम्मीदों का हिस्सा मानते हैं। लेकिन धीरे-धीरे समय के साथ हमें यह समझने का अनुभव होता है कि हर व्यक्ति हमारे लिए हमेशा के लिए नहीं होता। कुछ रिश्ते सिर्फ एक अध्याय की तरह आते हैं – वह पढ़ते हैं, हमें कुछ सिखाते हैं, फिर हमसे दूर चले जाते हैं। यह कोई हमारी गलती नहीं होती, न ही कोई बुरा इरादा होता है, बल्कि जीवन का अपना स्वाभाविक नियम होता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। आज की युवा पीढ़ी रिश्तों की इस सच्चाई से अनभिज्ञ होकर बहुत असहज महसूस करती है। सोशल मीडिया के फसाने में हम यह भूल जाते हैं कि हर ‘लाइक’, ‘कमेंट’, और ‘फॉलो’ का मतलब सच्चा अपनापन नहीं होता। असली रिश्ते, जिनमें सम्मान, समझदारी, और सहारा होता है, धीरे-धीरे भुला दिए जाते हैं। लोग बिना अलविदा कहे चले जाते हैं, रिश्ते टूट जाते हैं, परंतु यही तो जीवन का पाठ है – हर किस...

कर्म ही बनाता है भाग्य – सफलता का असली सूत्र

Image
संपादकीय  15 सितंबर 2025  *कर्म ही बनाता है भाग्य – सफलता का असली सूत्र*  आज का युग तकनीक, तेज़ी और प्रतिस्पर्धा का युग बन चुका है। हर व्यक्ति सफलता की दौड़ में भाग रहा है, लेकिन दुर्भाग्य से बहुत से लोग यह सोचते हैं कि सफलता केवल भाग्य का खेल है। समाज में यह धारणा इतनी पक्की हो गई है कि लोग असफलताओं का जिम्मेदार भाग्य को मान लेते हैं और अपने प्रयासों को कमजोर कर देते हैं। यह एक गहरी भ्रांति है। इतिहास और वर्तमान उदाहरण यही बताते हैं कि कर्मठता, लगन और दृढ़ इच्छाशक्ति ही व्यक्ति को उसकी मंजिल तक पहुंचाती है, न कि केवल किस्मत का आभास। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। कर्म और भाग्य का संतुलन हमेशा आवश्यक रहा है। भाग्य दरवाजा खोलने के लिए एक दिशा दिखाता है, लेकिन उसे खोलने का कार्य हमारा पुरुषार्थ है। अगर हमारे पास चाबी नहीं है तो दरवाजा कभी नहीं खुलेगा। इसके बावजूद आजकल लोग सोशल मीडिया पर ‘भाग्यशाली’ होने के स्टेटस अपडेट कर अपनी किस्मत के साथ अपार दिखावा करते हैं, पर असली मेहनत करने की हिम्मत नहीं जुटाते। समाज में यह सोच धीरे-धीरे फैलती जा रही है कि मे...

श्राद्ध की पूड़ियां और झूठी श्रद्धा का तमाशा”

Image
संपादकीय  14 सितंबर 2025  *“श्राद्ध की पूड़ियां और झूठी श्रद्धा का तमाशा”*  श्राद्ध पक्ष आते ही गांव से लेकर शहर की गलियों में घी की महक और श्रद्धा की ‘घोषणाएं गूंजने लगती हैं। एक ओर थालियों में पूड़ियां सज रही हैं, पंडालों में भोज के निमंत्रण छप रहे हैं, तो दूसरी ओर मन ही मन सवाल उठता है – क्या यही श्राद्ध है? क्या यही हमारे संस्कार हैं? जीवित रहते जिन माता-पिता के लिए दो मीठे बोल, एक गिलास पानी और थोड़ी-सी सेवा भारी पड़ती थी, उनके लिए मृत्यु के बाद दिखावे की यह अपार आस्था किसे धोखा दे रही है? माता-पिता के सामने चेहरे पर शिकन और उनके जाने के बाद शोकसभा में नकली आँसू – यह सिर्फ़ सामाजिक विडंबना नहीं, बल्कि संस्कारों का नैतिक दिवालियापन है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।  श्राद्ध पक्ष आते ही समाज में श्रद्धा का नहीं बल्कि दिखावे का मौसम शुरू हो जाता है। गलियों में घी और पूड़ियों की महक फैलती है, मंडप सजते हैं, थालियाँ सजाई जाती हैं और लोग आमंत्रण पर आमंत्रण बांटते हैं। पंडित बुलाए जाते हैं, बड़े-बड़े बैनर लगते हैं और फोटो खिंचवाकर स...

*प्रकृति का सम्मान, भविष्य की पहचान

Image
संपादकीय  13 सितंबर 2025  *प्रकृति का सम्मान, भविष्य की पहचान*  “प्रकृति से जुड़े बिना मानव जीवन अधूरा है; जो प्रकृति को नष्ट करता है, वह स्वयं के अस्तित्व को खतरे में डालता है।” यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। आज का युग तकनीक और विकास का युग है। हर कोई तेजी से आगे बढ़ने में लगा है, लेकिन इस दौड़ में हम अपनी सबसे अनमोल धरोहर – प्रकृति को भूलते जा रहे हैं। हर दिन बढ़ते औद्योगीकरण, बढ़ती गाड़ियों की संख्या, फैक्ट्री की चिमनियों से निकलता धुंआ, प्लास्टिक कचरे का फैलाव और वनों की अंधाधुंध कटाई ने हमारे पर्यावरण को संकट में डाल दिया है। हम सोचते हैं कि विकास का यही अर्थ है – अधिक से अधिक निर्माण, ज्यादा से ज्यादा लाभ, लेकिन इसका मूल्य हम अपनी अगली पीढ़ी को चुकवाएंगे। प्रकृति हमारी माता है। बिना स्वच्छ जल, ताजी हवा, हरे-भरे जंगल और जीव-जंतुओं के साथ संतुलित जीवन, मानव का अस्तित्व संभव नहीं है। परंतु आज हम प्रकृति से जुड़े हर नियम को दरकिनार कर उसे वश में करने की होड़ में लगे हैं। जल प्रदूषण से नदियाँ विषाक्त हो रही हैं, वनों की कटाई से जंगल सूख रहे हैं और...

सोशल मीडिया: ज्ञान का पुल या सामाजिक विषाणु?

Image
संपादकीय  12 सितंबर 2025   *सोशल मीडिया: ज्ञान का पुल या सामाजिक विषाणु?*  आज का युग डिजिटल क्रांति का युग है। जहाँ एक क्लिक पर दुनिया की हर जानकारी, हर व्यक्ति, हर विचार हाथ में होता है, वहीं इसी उन्नति ने हमें एक ऐसा सामाजिक विषाणु भी थमा दिया है, जिसका नाम है – अनियंत्रित सोशल मीडिया। यह वो माध्यम बन चुका है, जो एक ओर हमें जोड़े रखने का दावा करता है, लेकिन दूसरी ओर यह समाज की नैतिकताएं, संस्कार, और विवेक बर्बाद करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ता। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। आधुनिक यथार्थ यह है कि समाज की जड़ें कमजोर हो रही हैं और लोग केवल फॉलोअर्स, लाइक्स और वायरलिटी की दौड़ में अंधाधुंध भाग रहे हैं। एक समय था जब रिश्तों को मजबूती से निभाया जाता था, जब संवाद की मिठास होती थी, पर आजकल बच्चों का पहला प्रश्न यह बन गया है – “यह वीडियो वायरल कब होगा?” या “मुझे कितने लाइक्स मिलेंगे?” इस आत्मकेंद्रित सोच ने परिवार, रिश्तेदार और सामाजिक सहयोग की परिकल्पना को छिन्न-भिन्न कर दिया है। क्या आप जानते हैं? आजकल युवा पीढ़ी “नहीं जानना, लेकिन सबको बताना” क...

सोशल मीडिया: – बच्चों के भविष्य पर खतरे की घंटी

Image
संपादकीय  10 सितंबर 2025 *सोशल मीडिया: – बच्चों के भविष्य पर खतरे की घंटी*  आज के आधुनिक युग में सोशल मीडिया एक वरदान बनकर हमारे जीवन में समा चुका है। यह हमें दूर बैठे रिश्तेदारों से जोड़ता है, दुनिया भर की जानकारी एक क्लिक पर उपलब्ध कराता है और व्यक्तित्व के अभिव्यक्ति का नया मंच प्रस्तुत करता है। लेकिन इस उजली तस्वीर के पीछे छुपा एक गंभीर काला सच भी है, जो समाज और विशेष रूप से बच्चों के मानसिक विकास पर गहरे असर डाल रहा है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।   जहां एक ओर सोशल मीडिया का उद्देश्य मानवता को जोड़ना था, वहीं आज यह अभद्रता, हिंसा और अश्लीलता का अड्डा बन चुका है। फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हाट्सएप पर दिन-ब-दिन फैलता फेक कंटेंट और हिंसक विचार बच्चों के मानसिक विकास को जहरीला बना रहा है। बच्चों में हिंसक प्रवृत्तियों के बढ़ने का मुख्य कारण उनकी मनमर्जी के अनुसार अनियंत्रित सोशल मीडिया का उपयोग है। गलत संगत, अश्लील वीडियो, हिंसक गेम्स और अपमानजनक कंटेंट बच्चों के भीतर असंयमित क्रोध, संवेदनशीलता में गिरावट, गलत आदतें और मानसिक तनाव प...

पत्रकारिता नहीं ‘प्रोफिट’ की दुकान – अब घुस आए हैं खरपतवार

Image
संपादकीय 10 सितंबर 2025   *पत्रकारिता नहीं ‘प्रोफिट’ की दुकान – अब घुस आए हैं खरपतवार*  पत्रकारिता का जन्म समाज को सच बताने और जनता की आवाज बनकर सत्ता की गलियों में जाकर उसकी नकेल कसने के लिए हुआ था। एक समय था, जब पत्रकारिता को समाज का प्रहरी माना जाता था। भ्रष्टाचार, सामाजिक अन्याय, सरकारी गलत नीतियों की पोल खोलने का पुण्य कार्य यही पत्रकार करते थे। जनता की उम्मीद थी कि उनका माइक समाज के दबे कुचले लोगों की आवाज बनेगा। लेकिन आज का मंजर देखिए, पत्रकारिता का पवित्र मंच अब केवल ‘प्रोफिट सेंटर’ बन गया है। खबर नहीं, हंगामा बिक रहा है। जनहित की खोज नहीं, जनविरोध का बाजार सज रहा है। यह अब सच की खोज नहीं, सियासी रंग में रंगने की होड़ बन गई है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।  आज की पत्रकारिता का स्वरूप जितना चुनौतीपूर्ण है, उससे कहीं अधिक विकृत हो चला है। सच्ची पत्रकारिता समाज की अव्यवस्थाओं को उजागर करने, जनता की आवाज को प्रशासन तक पहुंचाने, भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने और लोकतंत्र की आधारशिला मजबूत करने का पथप्रदर्शक है। लेकिन जिस ढंग से आज तथाकथित पत...

जब परिवार टूटे, तो समाज कैसे संभलेगा? – रिश्तों के झगड़े पर कठोर सोच

Image
संपादकीय 9 सितंबर 2025 *जब परिवार टूटे, तो समाज कैसे संभलेगा? – रिश्तों के झगड़े पर कठोर सोच*  आज के आधुनिक समाज में घर-परिवार के भीतर झगड़े होना एक ऐसा दुर्भाग्य बन चुका है, जिसे न तो गंभीरता से लिया जा रहा है और न ही सही दिशा में समझने की कोशिश की जा रही है। यह एक चुभता हुआ सत्य है कि परिवार कभी केवल प्रेम, समझदारी और सहयोग का पवित्र स्थान रहा करता था, अब वह तनाव, कटुता और आपसी मनमुटाव का अखाड़ा बन चुका है। हर दूसरे घर में आपसी झगड़े आम बात बन गए हैं। यह सोचने वाली बात है कि आखिर क्यों? क्या कारण है कि हम रिश्तों को सौंदर्य की जगह संघर्ष का मैदान बना चुके हैं? यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। आज के बच्चों के सामने घर का यह जहर प्रतिदिन परोसा जा रहा है। जब माता-पिता खुद संवाद करने की बजाय मोबाइल स्क्रीन में उलझे रहते हैं, अपने गुस्से की कहानी फेसबुक और इंस्टाग्राम पर बयां करते हैं, तो उनसे बेहतर क्या उम्मीद की जा सकती है? यही पथ है जहाँ से अगली पीढ़ी भटकती जाती है – अहंकार की गहराइयों में, मतभेद के गर्त में। एक-दूसरे को नीचा दिखाने, बेइज्जती करने और सोशल मीडि...

विवाह बनाम बाजार: रिश्तों की पवित्रता की कुर्बानी

Image
संपादकीय  8 सितंबर 2025  *विवाह बनाम बाजार: रिश्तों की पवित्रता की कुर्बानी*  विवाह, जिसे सदियों से समाज का पवित्र बंधन माना गया है, आज उस पवित्रता को खोता जा रहा है। यह एक ऐसा अनुबंध था, जिसमें दो व्यक्तियों के बीच विश्वास, समझदारी, और एक-दूसरे के साथ जीवन यापन करने की परिकल्पना थी। परंतु आज विवाह किसी सामाजिक समझौते से कहीं अधिक व्यावसायिक समझौते में तब्दील होता जा रहा है। रिश्तों की तलाश अब प्रेम या आत्मीयता के आधार पर नहीं, बल्कि पैसों, पदों और समाज में दिखावे की प्रतियोगिता के रूप में की जाती है। यह मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। कहते हैं कि एक अच्छा रिश्ता बनाना तो एक कला है, लेकिन आज वह कला अधूरा रह गया है। लड़के और लड़कियों के परिवार अब बायोडाटा तैयार करके व्हाट्सएप ग्रुप्स पर झोंक देते हैं। जैसे किसी प्रोडक्ट की तरह उनका मूल्य तय किया जाता है। बेटी को लेकर माँ-बाप की पहली चिंता यह हो गई है कि उसके पास कितना स्कोर है, कितनी फीस वाली नौकरी लगी है, कितने इंस्टाग्राम फॉलोअर्स हैं। बेटे की वैवाहिक मांगों का स्तर भी ‘प्रोफेशनलिज्म’ तक सीमित हो चुका ह...

खुद को पहचानिए – क्योंकि आपका कोई विकल्प नहीं

Image
संपादकीय  7 सितंबर 2025 *“खुद को पहचानिए – क्योंकि आपका कोई विकल्प नहीं”*  जीवन के इस विराट संसार में हम हर चीज़ का विकल्प ढूंढ सकते हैं। नौकरी बदल सकते हैं, साधन बदल सकते हैं, रिश्तों में भी विकल्प खोजे जा सकते हैं। लेकिन एक सत्य ऐसा है जिसे न तो टाला जा सकता है, न ही बदला जा सकता है। वह आपका विकल्प क्योंकि इस दुनिया में आपका कोई विकल्प नहीं है। हर इंसान प्रकृति की एक अनूठी कृति है। जैसे एक ही पेड़ पर हर पत्ता अलग आकृति और रंग का होता है, वैसे ही हर व्यक्ति अपनी मौलिकता में अद्वितीय है। दुर्भाग्य यह है कि हम अपनी इस विशिष्टता को पहचानने में असफल हो जाते हैं। हम दूसरों से तुलना करते हैं, उनकी सफलता से अपने सपनों को छोटा मान लेते हैं और धीरे-धीरे स्वयं को भूलने लगते हैं। परंतु सच यही है कि दूसरे चाहे कितने भी महान क्यों न हों, वे आपके स्थान को कभी नहीं ले सकते। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। संसार में हर चीज़ का विकल्प मौजूद है। नौकरी का, रिश्तों का, साधनों का, यहां तक कि विचारधाराओं का भी। लेकिन इस सृष्टि में एक चीज़ ऐसी है जिसका विकल्प कहीं नहीं है – औ...

गुरु बनें—केवल कर्मचारी नहीं

Image
संपादकीय- 5 सितंबर 2025 *गुरु बनें—केवल कर्मचारी नहीं*  शिक्षक दिवस पर समाज, शिक्षा और शिक्षक का सच शिक्षक दिवस हमें याद दिलाता है कि “गुरु” कोई पद नहीं, एक नैतिक दायित्व है। आज जब शिक्षा का बड़ा हिस्सा मार्केटिंग और “ब्रांड वैल्यू” में सिमटता जा रहा है, जब शिक्षक का चरित्र सोशल-मीडिया की आभासी चमक में खोने लगा है, तब समाज का सबसे बड़ा नुकसान हो रहा है—युवा दिशा खो रहे हैं। डिग्री बढ़ रही है, पर दृष्टि घट रही है; सूचना बहुत है, पर “बुद्धि” कम पड़ रही है। लेकिन यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है समस्या केवल पाठ्यपुस्तक की नहीं, पाठ–जीवन की है। कक्षाओं में अंक की फैक्ट्री चल रही है; रटने का शोर है, समझ का सन्नाटा। गुरु का आदर्श जब प्रदर्शन से बदलकर प्रपंच हो जाए, तो बच्चे रीलों में ज्ञान खोजते हैं और वास्तविक जीवन के सवालों से भागते हैं। 21वीं सदी में भी अंधविश्वास की पोटली ढोना तभी संभव है, जब विज्ञान-मानस और आलोचनात्मक सोच का दीपक शिक्षक ही न जलाए। युवा आज स्क्रीन पर देखकर खुद को ज्ञानी, धार्मिक, दार्शनिक—सब एक साथ मान बैठता है; माता-पिता के सामने, समाज के बीच और...

तनाव के बोझ तले दबता इंसान और बचपन की तलाश*

Image
संपादकीय  3 सितंबर 2025 *तनाव के बोझ तले दबता इंसान और बचपन की तलाश*  हर व्यक्ति आज अपने जीवन को तनाव और स्ट्रेस के ढेर तले ढोह रहा है। भौतिकवादी संसाधनों के पीछे भागते-भागते इंसान ने जीवन का असली आनंद ही खो दिया है। सुख की तलाश में गाड़ी, बंगला, महंगे मोबाइल, शोहरत और शानो-शौकत जुटाई जा रही है, लेकिन इस दिखावे के पीछे छिपा है एक ऐसा खालीपन—जहाँ केवल बेचैनी, भय और कुंठा पल रही है। देखने में व्यक्ति लज़री लाइफ़ का हिस्सा दिखता है, मगर भीतर से खोखला और अशांत है। लेकिन यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। दिनभर पैसा कमाने की भागदौड़, मोबाइल पर आभासी रिश्तों की चकाचौंध और सोशल मीडिया की चमक—यही उसकी असल दिनचर्या बन गई है। घर में भी प्रत्यक्ष संवाद मर रहा है। पत्नी, बच्चे, माता-पिता सब सामने होते हुए भी संवाद मोबाइल स्क्रीन पर सिमट जाता है। हँसना, खेलना, दिल खोलकर बतियाना—यह सब अब "इमोजी" और "स्टेटस" में कैद हो चुका है। और यही सबसे बड़ी त्रासदी है कि जीवन की तीनों अवस्थाएँ अपने मायने खो रही हैं। बचपन—जहाँ निष्कपट हँसी और मासूम खेल थे—वह अब किताबों के बो...