आलस्य – शैतान का घर, कर्म ही जीवन का आधार
संपादकीय
26 सितंबर 2025
*“आलस्य – शैतान का घर, कर्म ही जीवन का आधार”*
कहावत है – “खाली दिमाग शैतान का घर होता है।” यह केवल एक कहावत नहीं, बल्कि जीवन का कठोर सत्य है। आलस्य इंसान को धीरे-धीरे भीतर से खोखला कर देता है। जिस क्षण हम निष्क्रिय होते हैं, उसी क्षण बुरे विचार हमारे मन पर दस्तक देने लगते हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
आज समाज में सबसे बड़ी समस्या यही है कि लोग अवसर और समय की कद्र नहीं कर रहे। जिनके पास काम होते हुए भी वे काम टालते रहते हैं, बहाने ढूंढते रहते हैं – वे न केवल अपनी क्षमताओं को मारते हैं बल्कि अपने भविष्य के रास्ते भी बंद कर लेते हैं। यही आलस्य हमें गप्पेबाजी, शिकायतों और नकारात्मकता की दलदल में धकेल देता है।
दूसरी ओर, कर्मयोगी व्यक्ति का उदाहरण देखिए। जिसके पास काम नहीं होता, वह भी खुद को व्यस्त रखने के लिए कोई न कोई रचनात्मक कार्य खोज लेता है। यही सक्रियता उसे आगे बढ़ाती है और दूसरों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनाती है।
आज का छात्र हो या युवा, कामकाजी हो या गृहिणी – हर किसी को यह समझना होगा कि समय बर्बाद करने का मतलब है जीवन बर्बाद करना। इतिहास गवाह है कि जो लोग आलस्य के शिकार हुए, वे कभी महानता की राह तक नहीं छू पाए; वहीं जिन्होंने कर्म को अपना धर्म माना, वही समाज और दुनिया को दिशा देने वाले बने।
व्यंग्य यह है कि आज का युवा घंटों सोशल मीडिया पर “स्क्रॉल” करने में तो व्यस्त है, लेकिन अपने जीवन के वास्तविक लक्ष्यों पर ध्यान देने में “टालमटोल” का शिकार हो जाता है। अगर यही समय पढ़ाई, हुनर और सकारात्मक कार्यों में लगाया जाए, तो वही युवा अपने और समाज के लिए क्रांति ला सकता है।
समाज को चाहिए कि बच्चों से लेकर युवाओं तक को समय प्रबंधन और सक्रिय जीवनशैली की शिक्षा दी जाए। हमें चाहिए कि आलस्य से बचकर अपने दिमाग को शैतान की जगह एक कार्यशाला बनाएं – जहाँ हर दिन नए विचार, नए सपने और नए प्रयास जन्म लें।
कर्म ही जीवन का आधार है। याद रखिए –
“आलस्य से पतन होता है, और कर्म से उत्थान।”
समाज का उत्थान तभी संभव है जब हर व्यक्ति अपने समय और क्षमताओं का सही उपयोग करे। यही जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
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