शादी या प्रदर्शन? जब संस्कारों पर भारी पड़ने लगा दिखावे का बोझ
संपादकीय @हरेश पंवार# 29 अप्रैल 2026 *“शादी या प्रदर्शन? जब संस्कारों पर भारी पड़ने लगा दिखावे का बोझ”* भारतीय समाज में विवाह केवल एक सामाजिक अनुबंध नहीं, बल्कि एक पवित्र संस्कार माना गया है—जहाँ दो व्यक्तियों के साथ-साथ दो परिवारों का मिलन होता है। यह एक ऐसी परंपरा रही है, जिसमें भावनाएँ, जिम्मेदारियाँ और सांस्कृतिक मूल्य एक सूत्र में बंधते हैं। लेकिन वर्तमान समय में यह पवित्र संस्कार धीरे-धीरे एक “इवेंट” में बदलता जा रहा है, जहाँ संस्कारों से ज्यादा दिखावे और प्रदर्शन को महत्व दिया जा रहा है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। आज एक अजीब विडंबना देखने को मिलती है—जहाँ जरूरत होती है, वहाँ कंजूसी और जहाँ दिखावा होता है, वहाँ फिजूलखर्ची। गरीब और मजदूर वर्ग का व्यक्ति, जो अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए संघर्ष करता है, वही शादी-ब्याह, भात, छूछक जैसे आयोजनों में हजारों रुपए उछालकर अपने आपको “खास” दिखाने की कोशिश करता है। यह केवल आर्थिक असंतुलन नहीं, बल्कि मानसिकता का भी संकट है। मुद्रा का यह अपमान केवल पैसे की बर्बादी नहीं, बल्कि श्रम और परिश्रम की अवहेलना भ...