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Showing posts from April, 2026

एक गलती का बोझ: जब उम्रभर की अच्छाइयाँ एक पल में धुंधली हो जाती हैं

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 संपादकीय@ हरेश पंवार #30 अप्रैल 2026 *“एक गलती का बोझ: जब उम्रभर की अच्छाइयाँ एक पल में धुंधली हो जाती हैं”* नं समाज का एक कड़वा सच है—यहाँ इंसान की अच्छाइयों की उम्र अक्सर छोटी होती है, लेकिन उसकी एक गलती ‘अमर’ हो जाती है। वर्षों की मेहनत, ईमानदारी और अच्छे आचरण से बनी छवि एक क्षण की चूक से ध्वस्त हो सकती है। यह केवल एक व्यक्ति की त्रासदी नहीं, बल्कि समाज की सोच का भी आईना है, जो अच्छाई को सामान्य और गलती को असामान्य मानकर उसे स्थायी पहचान बना देता है। मैं यहां बोलूंगा तो फिर कहोगी कि बोलता है। मानव जीवन एक निर्माण प्रक्रिया है। हम अपने व्यवहार, विचार और कर्मों के माध्यम से धीरे-धीरे अपनी पहचान बनाते हैं। यह पहचान एक दिन में नहीं बनती, बल्कि वर्षों की तपस्या, अनुशासन और निरंतर प्रयास का परिणाम होती है। लेकिन विडंबना यह है कि इस लंबे सफर को समाज अक्सर भूल जाता है और केवल एक गलती के आधार पर व्यक्ति को आंक देता है। जैसे एक भव्य महल वर्षों में बनता है, लेकिन एक चिंगारी उसे राख कर सकती है—ठीक वैसा ही हमारे चरित्र के साथ भी होता है। इस स्थिति को समझने के लिए “सफेद चादर” का ...

शादी या प्रदर्शन? जब संस्कारों पर भारी पड़ने लगा दिखावे का बोझ

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 संपादकीय @हरेश पंवार# 29 अप्रैल 2026  *“शादी या प्रदर्शन? जब संस्कारों पर भारी पड़ने लगा दिखावे का बोझ”* भारतीय समाज में विवाह केवल एक सामाजिक अनुबंध नहीं, बल्कि एक पवित्र संस्कार माना गया है—जहाँ दो व्यक्तियों के साथ-साथ दो परिवारों का मिलन होता है। यह एक ऐसी परंपरा रही है, जिसमें भावनाएँ, जिम्मेदारियाँ और सांस्कृतिक मूल्य एक सूत्र में बंधते हैं। लेकिन वर्तमान समय में यह पवित्र संस्कार धीरे-धीरे एक “इवेंट” में बदलता जा रहा है, जहाँ संस्कारों से ज्यादा दिखावे और प्रदर्शन को महत्व दिया जा रहा है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। आज एक अजीब विडंबना देखने को मिलती है—जहाँ जरूरत होती है, वहाँ कंजूसी और जहाँ दिखावा होता है, वहाँ फिजूलखर्ची। गरीब और मजदूर वर्ग का व्यक्ति, जो अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए संघर्ष करता है, वही शादी-ब्याह, भात, छूछक जैसे आयोजनों में हजारों रुपए उछालकर अपने आपको “खास” दिखाने की कोशिश करता है। यह केवल आर्थिक असंतुलन नहीं, बल्कि मानसिकता का भी संकट है। मुद्रा का यह अपमान केवल पैसे की बर्बादी नहीं, बल्कि श्रम और परिश्रम की अवहेलना भ...

“शिक्षा का बाजारीकरण: क्या ‘शेरनी का दूध’ अब अमीरों तक सीमित?"

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 संपादकीय@हरेश पंवार -17 अप्रैल 2026  “शिक्षा का बाजारीकरण: क्या ‘शेरनी का दूध’ अब अमीरों तक सीमित?” किसी भी सभ्य और प्रगतिशील समाज की नींव शिक्षा पर टिकी होती है। यह केवल ज्ञान अर्जन का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन, समानता और आत्मसम्मान का सबसे सशक्त उपकरण है। भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में शिक्षा का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है, क्योंकि यही वह माध्यम है जो सामाजिक विषमताओं को समाप्त कर एक समतामूलक नेता समाज की स्थापना कर सकता है। लेकिन आज जिस प्रकार शिक्षा का तेजी से निजीकरण हो रहा है, उसने इस मूलभूत अधिकार को एक महंगी वस्तु में परिवर्तित कर दिया है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। डॉ. भीमराव अंबे‌‍डकर ने शिक्षा के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा था— “शिक्षा वह शेरनी का दूध है, जो इसे पिएगा वह ।” यह कथन आज भी उतना ही प्रासंगिक है, लेकिन विडंबना यह है कि वर्तमान दौर में यह ‘शेरनी का दूध’ अब हर किसी के लिए सुलभ नहीं रहा। शिक्षा का उद्देश्य जहां पहले ज्ञान का प्रसार और व्यक्तित्व का विकास था, वहीं आज यह धीरे-धीरे एक मुनाफे का व्यवसाय बनता जा रहा...

कागज़ों में उलझा किसान: जब नियम बोझ बन जाएं

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 संपादकीय@हरेश पंवार -25 अप्रैल 2026 *“कागज़ों में उलझा किसान: जब नियम बोझ बन जाएं”* खेत में खड़ा किसान जब बीज बोता है, तो वह केवल अनाज नहीं, बल्कि अपने सपनों को भी धरती में रोपता है। वह मौसम की मार सहता है, दिन-रात मेहनत करता है, तब जाकर उसकी फसल तैयार होती है। लेकिन विडंबना देखिए—जिस किसान ने धरती से अन्न पैदा किया, वही किसान अपनी उपज को बेचने के लिए कागज़ों के जाल में फंस जाता है। सवाल यह है कि किसान की इस दुविधा को आखिर कौन समझे? यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। हाल ही में जारी किए गए नियमों ने इस समस्या को और जटिल बना दिया है। अब किसान को अपनी फसल मंडी में बेचने के लिए जमाबंदी का ऑनलाइन रिकॉर्ड, गिरदावरी रिपोर्ट और कई प्रकार के प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने होंगे। यदि पटवारी और मंडी की रिपोर्ट में जरा सा भी अंतर पाया गया, तो किसान की फसल खरीदने से इंकार किया जा सकता है। यह व्यवस्था कागज़ों में भले ही पारदर्शिता लाने का प्रयास लगे, लेकिन जमीनी हकीकत में यह किसानों के लिए एक नया संकट बनकर सामने आ रही है। सबसे अधिक परेशानी बटाईदार, सीमांत और लघु किसानों को हो रह...

“अहंकार की हवा और जीवन की ठोकरें”

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 संपादकीय@हरेश पंवार 15 अप्रैल 2026  *“अहंकार की हवा और जीवन की ठोकरें”* जीवन के जटिल सत्य कई बार सरल उदाहरणों में छिपे होते हैं। एक साधारण फुटबॉल और बच्चों के खेल से जुड़ी यह छोटी-सी घटना हमें मनुष्य के स्वभाव और उसके संघर्षों का गहरा दर्शन कराती है। जब एक बालक ने संत से पूछा कि “इस फुटबॉल ने ऐसा क्या कर्म किया है, जो इसे बार-बार लातें खानी पड़ती हैं?”, तो संत का उत्तर केवल उस बच्चे के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी था—“यह इसके कर्म नहीं, बल्कि इसके भीतर भरी हवा है, जो इसे ठोकरें खाने पर मजबूर करती है।” यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। यह ‘हवा’ केवल फुटबॉल के भीतर की नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर बसे उस अहंकार का प्रतीक है, जो उसे बार-बार जीवन में गिराता है। अहंकार वह अदृश्य तत्व है, जो व्यक्ति को स्वयं के भ्रम में इतना भर देता है कि वह न तो दूसरों को समझ पाता है और न ही स्वयं को सही दृष्टि से देख पाता है। आज के सामाजिक परिप्रेक्ष्य में यह उदाहरण और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। आधुनिक जीवन में उपलब्धियों, पद, प्रतिष्ठा और ज्ञान के साथ-सा...

सत्य की राह: संघर्ष भरी, लेकिन विजय सुनिश्चित

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 संपादकीय@हरेश पंवार 18 अप्रैल 2026  *“सत्य की राह: संघर्ष भरी, लेकिन विजय सुनिश्चित”* मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म क्या है? यह प्रश्न जितना सरल दिखता है, उतना ही गहन है। यदि इसके मूल में जाएं तो उत्तर स्पष्ट मिलता है—सत्य। सत्य केवल एक नैतिक मूल्य नहीं, बल्कि जीवन की वह आधारशिला है जिस पर व्यक्तित्व, समाज और राष्ट्र की नींव टिकी होती है। सत्य बोलना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है, लेकिन उस सत्य पर हर परिस्थिति में अडिग रहना वास्तव में साहस, धैर्य और चरित्र की सबसे बड़ी परीक्षा है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। आज के दौर में, जब प्रतिस्पर्धा और तात्कालिक सफलता का दबाव लगातार बढ़ रहा है, तब झूठ और छल का मार्ग कई बार अधिक सरल और आकर्षक प्रतीत होता है। लोग सोचते हैं कि थोड़े से असत्य के सहारे वे जल्दी सफलता हासिल कर लेंगे, अपनी समस्याओं से बच निकलेंगे या परिस्थितियों को अपने पक्ष में कर लेंगे। लेकिन यह सफलता केवल क्षणिक होती है। झूठ की नींव पर खड़ा कोई भी भवन स्थायी नहीं होता। जैसे ही समय का झोंका आता है, वह ढह जाता है और पीछे छोड़ जाता है केवल पछतावा और अविश्व...

दसवीं-बारहवीं नहीं, सर्टिफिकेट कोर्स: शिक्षा की सही समझ क्यों जरूरी है?

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 संपादकीय@हरेश पंवार 19 अप्रैल 2026   *“दसवीं-बारहवीं नहीं, सर्टिफिकेट कोर्स: शिक्षा की सही समझ क्यों जरूरी है?”*  हमारे समाज में कई ऐसी धारणाएँ हैं जो वर्षों से चली आ रही हैं और इतनी सामान्य हो चुकी हैं कि हम उन्हें सत्य मान लेते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में भी एक ऐसी ही आम धारणा है—दसवीं और बारहवीं ‘कक्षाओं’ की परीक्षा। बचपन से लेकर युवावस्था तक हम यही सुनते और बोलते आए हैं कि “मैंने दसवीं पास कर ली”, “मैं बारहवीं में हूं” या “बारहवीं की परीक्षा दे रहा हूं।” लेकिन यदि हम तकनीकी और शैक्षिक दृष्टिकोण से देखें, तो यह पूरी तरह सही नहीं है। वास्तव में, दसवीं और बारहवीं को ‘कक्षा’ के रूप में नहीं, बल्कि एक सर्टिफिकेट कोर्स के रूप में समझा जाना चाहिए। दसवीं का वास्तविक नाम सेकेंडरी स्कूल सर्टिफिकेट  परीक्षा है, जबकि बारहवीं को हायर सेकेंडरी स्कूल सर्टिफिकेट  परीक्षा कहा जाता है। यह केवल शब्दों का अंतर नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की मूल संरचना को समझने का विषय है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन परीक्षाओं ...

अतीत की सीख, वर्तमान का कर्म: जीवन की सच्ची दिशा

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 संपादकीय@हरेश पंवार -20 अप्रैल 2026  “अतीत की सीख, वर्तमान का कर्म: जीवन की सच्ची दिशा” एक वृद्ध किसान अपने पुत्र को खेत में बीज बोते हुए समझा रहा था—“बेटा, बीज तो पुराने हैं, लेकिन फसल नई होगी। फर्क इस बात से पड़ता है कि तुम इन्हें आज कैसे बोते हो।” यह साधारण-सा संवाद जीवन के गहरे सत्य को उजागर करता है। हमारा अतीत उन बीजों की तरह है, जो बीत चुका है, लेकिन उसका सही उपयोग वर्तमान में ही संभव है। जीवन की सार्थकता इसी संतुलन में छिपी है—अतीत की सीख और वर्तमान के कर्म के बीच संतुलन। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। आज का मनुष्य एक अजीब द्वंद्व में जी रहा है। वह या तो अतीत की स्मृतियों में खोया रहता है—कभी अपनी सफलताओं पर गर्व करता है, तो कभी अपनी असफलताओं पर पछताता है; या फिर भविष्य की चिंताओं में उलझा रहता है—क्या होगा, कैसे होगा, कब होगा? इस बीच वह सबसे महत्वपूर्ण समय—वर्तमान—को अनदेखा कर देता है। जबकि सच्चाई यह है कि जीवन केवल वर्तमान में ही घटित होता है। अतीत को अक्सर लोग केवल बीता हुआ समय मान लेते हैं, लेकिन वास्तव में यह एक विशाल पाठशाला है। यह हमें अन...

लालच का बढ़ता साया: जब इच्छाएँ समाज को निगलने लगती हैं

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 संपादकीय@हरेश पंवार- 21 अप्रैल 2026  “लालच का बढ़ता साया: जब इच्छाएँ समाज को निगलने लगती हैं” एक प्राचीन कथा है—एक व्यक्ति को वरदान मिला कि वह जो भी छुएगा, वह सोना बन जाएगा। शुरू में वह अत्यंत प्रसन्न हुआ; उसके घर की हर वस्तु सोने में बदलने लगी। लेकिन जब उसने भोजन को छुआ, वह भी सोना बन गया। पानी भी सोना बन गया। अंततः उसकी सबसे प्रिय बेटी भी सोने की मूर्ति में बदल गई। तब उसे समझ आया कि लालच ने उससे सब कुछ छीन लिया है। यह कथा केवल कल्पना नहीं, बल्कि आज के समाज का सजीव प्रतिबिंब है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। जब समाज में लालच बढ़ता है, तो वह केवल एक व्यक्तिगत कमजोरी नहीं रहता, बल्कि एक सामाजिक बीमारी का रूप ले लेता है। लालच व्यक्ति की सोच को संकुचित कर देता है और उसे केवल अपने स्वार्थ तक सीमित कर देता है। वह यह भूल जाता है कि उसके कर्मों का प्रभाव केवल उस तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे समाज पर पड़ता है। महात्मा बुद्ध ने स्पष्ट कहा था—“मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु उसका लोभ और मोह है।” यह कथन आज के समय में और भी अधिक प्रासंगिक हो गया है। लालच व्यक्ति के विवे...

“रंग बदलते पत्ते और रिश्तों की सच्चाई: जड़ों से जुड़े रहने का संदेश”

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 संपादकीय@हरेश पंवार -22 अप्रैल 2026 *“रंग बदलते पत्ते और रिश्तों की सच्चाई: जड़ों से जुड़े रहने का संदेश”* एक दिन एक बालक ने अपने दादा से पूछा—“दादा जी, ये पेड़ अपने ही पत्तों को क्यों गिरा देता है? क्या उसे उनसे प्यार नहीं होता?” दादा जी मुस्कुराए और बोले—“बेटा, यह त्याग नहीं, समझदारी है। जो पत्ते अपनी ताजगी और हरापन खो चुके हैं, उन्हें पकड़कर रखने से पेड़ कमजोर हो जाएगा। उन्हें जाने देना ही उसकी ताकत है, ताकि नई कोपलें जन्म ले सकें।” यह छोटी-सी बात जीवन का बहुत बड़ा सत्य अपने भीतर समेटे हुए है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। प्रकृति हमें हर पल सिखाती है, बस हम उसे समझने की कोशिश कम करते हैं। जब किसी वृक्ष का पत्ता हरा-भरा होता है, तो वह टहनी से मजबूती से जुड़ा रहता है। लेकिन जैसे ही वह अपना रंग खो देता है—पीला या भूरा पड़ जाता है—वह धीरे-धीरे गिरने लगता है। यह संकेत होता है कि अब उसका उस वृक्ष से संबंध समाप्त हो चुका है। ठीक इसी तरह, जब किसी इंसान का व्यवहार, उसकी निष्ठा और उसका स्वभाव बदलने लगे, तो यह समझ लेना चाहिए कि वह मन से पहले ही उस रिश्ते से दूर ह...

“शिक्षक की वाणी और राष्ट्र का भविष्य: शब्दों की जिम्मेदारी का प्रश्न"

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 संपादकीय@हरेश पंवार 23 अप्रैल 2026  *“शिक्षक की वाणी और राष्ट्र का भविष्य: शब्दों की जिम्मेदारी का प्रश्न”* एक प्रसिद्ध कथन है—“कलम की धार तलवार से भी तेज होती है।” यदि इस कथन को और गहराई से समझें, तो पाएंगे कि शब्दों की शक्ति केवल लेखनी तक सीमित नहीं, बल्कि वाणी में भी उतनी ही प्रभावशाली होती है। और जब यह वाणी किसी शिक्षक के मुख से निकलती है, तो उसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। क्योंकि शिक्षक केवल ज्ञान देने वाला नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य का निर्माता होता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है ‌ यह सत्य है कि राष्ट्र का निर्माण उसके नागरिकों से होता है और नागरिकों का निर्माण शिक्षक करता है। इस दृष्टि से शिक्षक केवल एक पेशा नहीं, बल्कि एक अत्यंत जिम्मेदार भूमिका है। एक इंजीनियर यदि गलती करता है, तो उसकी गलती किसी इमारत के ढहने के साथ समाप्त हो जाती है। एक डॉक्टर की गलती एक व्यक्ति के जीवन तक सीमित रहती है। एक वकील की त्रुटि न्यायालय की फाइलों में दब जाती है। लेकिन एक शिक्षक की गलती कभी समाप्त नहीं होती—वह सीधे लोगों के मन और विचारों में प्रवेश कर जाती ह...

दिखावे की चमक में खोता सच: आधुनिक समाज का मौन संकट

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 संपादकीय@हरेश पंवार -24-04-2026 *“दिखावे की चमक में खोता सच: आधुनिक समाज का मौन संकट”* एक छोटे से गांव का एक युवा शहर में नौकरी करने लगा। पहली तनख्वाह मिली तो उसने घर पैसे भेजने की बजाय एक महंगा मोबाइल खरीद लिया। दूसरी तनख्वाह पर ब्रांडेड कपड़े, तीसरी पर बाइक की ईएमआई शुरू कर दी। गांव में उसके माता-पिता अब भी साधारण जीवन जी रहे थे, लेकिन सोशल मीडिया पर वह युवा ‘सफलता’ का प्रतीक बन चुका था। कुछ महीनों बाद वही युवा कर्ज के बोझ और मानसिक तनाव में टूटने लगा। यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि आज के आधुनिक समाज की सच्चाई है—जहाँ ‘दिखना’ ही ‘होना’ बन गया है। यहां पर बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। आज का समाज एक अजीब प्रतिस्पर्धा में उलझ गया है—यह प्रतिस्पर्धा प्रतिभा या परिश्रम की नहीं, बल्कि दिखावे की है। लोग अपनी वास्तविक पहचान को स्वीकार करने के बजाय, दूसरों की नजरों में ‘सफल’ और ‘खुश’ दिखने की होड़ में लगे हुए हैं। इस होड़ में वे अपनी असली खुशी, मानसिक शांति और आर्थिक स्थिरता तक को दांव पर लगा देते हैं। दिखावा अब केवल एक आदत नहीं रहा, बल्कि एक मानसिक दबाव बन चुका ...

पेंशन का हक या संवेदना का संकट? — बुजुर्गों के सम्मान पर खड़ा बड़ा सवाल

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 संपादकीय@हरेश पंवार:16-04-2026 *“पेंशन का हक या संवेदना का संकट? — बुजुर्गों के सम्मान पर खड़ा बड़ा सवाल”* राजस्थान सहित देश के विभिन्न राज्यों में संचालित सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजनाएं, बुजुर्गों के सम्मानजनक जीवन की एक महत्वपूर्ण आधारशिला मानी जाती हैं। इन योजनाओं का मूल उद्देश्य यही है कि जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुके वृद्धजनों को आर्थिक संबल मिल सके, जिससे वे आत्मसम्मान के साथ अपना जीवन व्यतीत कर सकें। लेकिन क्या वास्तव में यह उद्देश्य पूर्ण हो पा रहा है? या फिर नियमों की जटिलता और सामाजिक संवेदनहीनता के कारण कई बुजुर्ग इस अधिकार से वंचित हो रहे हैं? यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। आज यह एक कड़वा सत्य बन चुका है कि सामाजिक सुरक्षा पेंशन की पात्रता तय करने में “परिवार में सरकारी नौकरी” जैसी शर्तें, उन बुजुर्गों के लिए अभिशाप बनती जा रही हैं, जिनकी संतानें भले ही नौकरी में हों, लेकिन वे अपने माता-पिता के साथ नहीं रहतीं, न ही उनके जीवन की जिम्मेदारी निभाती हैं। यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि एक ओर सरकार बुजुर्गों के लिए पेंशन की गारंटी देती है, वहीं द...

पे बैक टू सोसाइटी” की पुकार — क्या हम बाबा साहब की अपेक्षाओं पर खरे उतर रहे हैं?

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 दैनिक भीम प्रज्ञा संपादकीय@ हरेश पंवार #14-04-2026 *“पे बैक टू सोसाइटी” की पुकार — क्या हम बाबा साहब की अपेक्षाओं पर खरे उतर रहे हैं?* भारतीय लोकतंत्र की नींव में यदि किसी एक व्यक्तित्व की दृष्टि, संघर्ष और दूरदर्शिता सबसे अधिक गहराई से समाहित है, तो वह हैं डॉ. भीमराव अंबेडकर। उन्होंने केवल संविधान का निर्माण नहीं किया, बल्कि एक ऐसे राष्ट्र की कल्पना की, जहां विविधताओं के बीच एकता हो, और समाज का अंतिम व्यक्ति भी सम्मान और अधिकार के साथ जीवन जी सके। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। बाबा साहब का संपूर्ण जीवन इसी लक्ष्य को समर्पित रहा—समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के सिद्धांतों पर आधारित एक सशक्त भारत का निर्माण। उन्होंने समाज के उस वर्ग को आवाज दी, जो सदियों से वंचित, शोषित और उपेक्षित रहा। लेकिन आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या हम उनके उस मिशन को आगे बढ़ा पा रहे हैं? बाबा साहब को विशेष रूप से समाज के पढ़े-लिखे वर्ग से बहुत उम्मीदें थीं। उनका मानना था कि शिक्षा केवल व्यक्तिगत उन्नति का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का सबसे प्रभावी हथियार है। वे चाहते थे...

दिखावे से नहीं, विचारों से जिएं — यही सच्ची श्रद्धांजलि है बाबा साहब को

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संपादकीय@हरेश पंवार 13-04-2026 *दिखावे से नहीं, विचारों से जिएं — यही सच्ची श्रद्धांजलि है बाबा साहब को* आज जब हम अंबेडकर जयंती के अवसर पर उत्सव, रैली और आयोजनों की चमक-दमक देखते हैं, तो एक गहरा प्रश्न मन में उठता है—क्या हम सच में बाबा साहब को मानते हैं, या केवल उन्हें मनाने का दिखावा करते हैं? यह विडंबना ही है कि जिन डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अपने पूरे जीवन को समाज के अंतिम व्यक्ति के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया, उनके अनुयायी आज उनके विचारों से भटकते हुए नजर आते हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगी कि बोलता है। बाबा साहब का स्पष्ट संदेश था—“शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो।” लेकिन आज का युवा इन तीन मूल मंत्रों को अपनाने के बजाय, केवल एक दिन के उत्सव में खोकर रह गया है। डीजे की तेज धुन, रंगों का प्रदर्शन, और दिखावटी जुलूस—क्या यही अंबेडकरवाद है? क्या यही वह क्रांति है, जिसका सपना बाबा साहब ने देखा था? सच यह है कि यह सब बाबा साहब के विचारों के बिल्कुल विपरीत दिशा में जा रहा है। उन्होंने कभी भी समाज में अहंकार, द्वेष और दिखावे को बढ़ावा नहीं दिया। बल्कि उनका पूरा जीवन विनम्रत...

कागज़ का किसान बनाम मिट्टी का सच: 20–25 दिन की खेती का भ्रम

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 संपादकीय@हरेश पंवार 12 अप्रैल 2026 *“कागज़ का किसान बनाम मिट्टी का सच: 20–25 दिन की खेती का भ्रम”* राजनीति में बयान अक्सर सुर्खियाँ बनते हैं, लेकिन कभी-कभी वे समाज की सबसे गहरी सच्चाइयों को भी अनजाने में उजागर कर देते हैं। राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का यह कथन कि “किसान साल भर में केवल 20–25 दिन ही खेत में काम करता है”, ऐसा ही एक बयान है—जो चर्चा से ज्यादा चिंतन की मांग करता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। किसी किसान सभा में सफेद कुर्ते पजामे पहनकर रंगीन मॉडल हल कंधे पर रख देने से क्या कोई किसान  हो सकता है। भाषण में किसान का बेटा कह देने से क्या खेती का कार्य हो सकता है। खेती का काम करने वाले किसान के पास में घड़ी उसका आसमान होता है। और काम करने के समय का निर्धारण प्रकृति की हालत करते हैं। किसान परिश्रम से नाहता है जहां पानी नहीं पसीना होता है। और मिट्टी के बिछौने पर सोता  है तब जाकर हमारी थाली में अनाज का निवाला डलता है। किसान के परिश्रम के समय का निर्धारण हेलीकॉप्टर में उड़ान भरते हुए या फिर एयर कंडीशन रूम में बैठकर तय करें। क्या यह...

कांटे नहीं, फूल बोइए: मानवता का असली मार्ग

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 संपादकीय@हरेश पंवार# 10-04-2026 *“कांटे नहीं, फूल बोइए: मानवता का असली मार्ग”* मनुष्य का जीवन केवल अपने लिए जीने का नाम नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा अवसर है जिसमें हम दूसरों के जीवन को भी सुंदर बना सकते हैं। आज के प्रतिस्पर्धी और तनावपूर्ण युग में जहां लोग अपनी सफलता के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं, वहां यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या वास्तव में किसी के जीवन में कांटे बोकर हम अपने लिए खुशियों के फूलों की कल्पना कर सकते हैं? इसका उत्तर स्पष्ट है—नहीं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। सच्ची खुशी और स्थायी सफलता का मार्ग दूसरों की भलाई से होकर गुजरता है। यदि हम अपने जीवन में सुख, शांति और संतोष चाहते हैं, तो हमें दूसरों के जीवन में भी वही भावनाएं उत्पन्न करनी होंगी। यह प्रकृति का अटल नियम है कि जैसा हम बोते हैं, वैसा ही काटते हैं। यदि हम दूसरों के लिए द्वेष, ईर्ष्या और नफरत के बीज बोएंगे, तो बदले में हमें भी वही मिलेगा। इसके विपरीत, यदि हम प्रेम, सहयोग और सहानुभूति के बीज बोते हैं, तो जीवन में खुशियों के फूल अवश्य खिलेंगे। आज समाज में बढ़ती कट...

विवेक और विश्वास: संकट में जीवन का सबसे बड़ा सहारा

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संपादकीय@हरेश पंवार #09-04-2026 *“विवेक और विश्वास: संकट में जीवन का सबसे बड़ा सहारा”* एक बार की बात है—एक अनुभवी नाविक तूफानी समुद्र में अपनी छोटी सी नाव लेकर आगे बढ़ रहा था। लहरें उफान पर थीं, आकाश में काले बादल छाए थे और हर पल ऐसा लग रहा था कि नाव डूब जाएगी। उसके साथ बैठे नवयुवक ने घबराकर पूछा—“अब क्या होगा?” नाविक मुस्कुराया और बोला—“जब तक मेरा हाथ पतवार पर और मेरा मन स्थिर है, तब तक तूफान मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता।” यही जीवन का सबसे बड़ा सत्य है—बाहरी तूफान हमें तब तक नहीं डुबा सकते, जब तक भीतर का संतुलन कायम है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे तो बोलता है। जीवन की राह में प्रतिकूल परिस्थितियाँ आना कोई असामान्य घटना नहीं है। हर व्यक्ति के जीवन में ऐसे क्षण आते हैं जब सब कुछ बिखरता हुआ प्रतीत होता है—योजनाएँ असफल हो जाती हैं, संबंध कमजोर पड़ जाते हैं, और मन में निराशा घर कर लेती है। ऐसे समय में सबसे बड़ी चुनौती परिस्थितियाँ नहीं होतीं, बल्कि स्वयं को संभालना होता है। यहीं पर विवेक और आत्मविश्वास की असली परीक्षा शुरू होती है। विवेक का अर्थ केवल ज्ञान होना नहीं है, बल्कि सह...

गरीबी का कारोबार: जब अमीरी ने ओढ़ लिया अभाव का कंबल

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 संपादकीय@हरेश पंवार 08-04-2026 कभी कहा जाता था कि इस देश की सबसे बड़ी चुनौती गरीबी है, लेकिन अब लगता है कि असली चुनौती गरीबी नहीं, बल्कि गरीब बनने की होड़ है। हालात ऐसे हो गए हैं कि जिसे देखो वही अपने आपको “आर्थिक रूप से कमजोर” सिद्ध करने की जुगत में लगा है। विडंबना देखिए—जिस गरीबी से लोग कभी भागते थे, आज उसी को खरीदने के लिए जेब ढीली कर रहे हैं। 5 से 15 हजार रुपये खर्च कर “बीपीएल” बनने का यह नया ट्रेंड केवल एक प्रशासनिक गड़बड़ी नहीं, बल्कि सामाजिक मानसिकता के गहरे पतन का आईना है। अब गरीबी कोई मजबूरी नहीं रही, बल्कि एक सुनहरा अवसर बन चुकी है—सरकारी योजनाओं का टिकट, सस्ती सुविधाओं का पासपोर्ट और बिना मेहनत के लाभ उठाने का लाइसेंस। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। यह दृश्य किसी व्यंग्य रचना का हिस्सा लगता, अगर यह हकीकत न होता। जिन लोगों के पास पक्के मकान हैं, गाड़ियां हैं, स्थायी आय के स्रोत हैं, वे भी खुद को गरीब साबित करने के लिए पूरी ऊर्जा लगा रहे हैं। मानो “गरीब” होना आज का सबसे बड़ा सामाजिक सम्मान बन गया हो। असली गरीब, जो दिन-रात संघर्ष करता है, वह आज भी स...

व्यक्ति का असली मूल्य—कर्म, चरित्र और सामाजिक योगदान

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संपादकीय@हरेश पंवार:06-041-2026  *व्यक्ति का असली मूल्य—कर्म, चरित्र और सामाजिक योगदान* समाज में अक्सर यह प्रवृत्ति देखी जाती है कि किसी व्यक्ति का मूल्यांकन उसके पद, प्रतिष्ठा, धन-संपत्ति या उसके परिवारिक पृष्ठभूमि के आधार पर किया जाता है। यह एक गहरी सामाजिक भूल है, जो न केवल व्यक्ति की वास्तविक पहचान को धुंधला करती है, बल्कि समाज में असमानता और अहंकार को भी बढ़ावा देती है। सच्चाई यह है कि किसी भी व्यक्ति का वास्तविक मूल्य उसके बाहरी आवरण में नहीं, बल्कि उसके कर्मों, व्यवहार और समाज के प्रति उसके योगदान में निहित होता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। हर व्यक्ति अपने आप में एक विशिष्ट पहचान लेकर जन्म लेता है। उसकी क्षमताएं, उसका दृष्टिकोण और उसका जीवन जीने का तरीका उसे दूसरों से अलग बनाता है। लेकिन जब समाज उसे केवल उसके पद या आर्थिक स्थिति के आधार पर आंकता है, तब उसकी असली प्रतिभा और मानवीय गुणों की उपेक्षा हो जाती है। यही कारण है कि कई बार बड़े पदों पर बैठे लोग भी समाज में सम्मान खो देते हैं, जबकि साधारण जीवन जीने वाले लोग अपने उत्कृष्ट कर्मों के कारण जनम...