दसवीं-बारहवीं नहीं, सर्टिफिकेट कोर्स: शिक्षा की सही समझ क्यों जरूरी है?
संपादकीय@हरेश पंवार 19 अप्रैल 2026
*“दसवीं-बारहवीं नहीं, सर्टिफिकेट कोर्स: शिक्षा की सही समझ क्यों जरूरी है?”*
हमारे समाज में कई ऐसी धारणाएँ हैं जो वर्षों से चली आ रही हैं और इतनी सामान्य हो चुकी हैं कि हम उन्हें सत्य मान लेते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में भी एक ऐसी ही आम धारणा है—दसवीं और बारहवीं ‘कक्षाओं’ की परीक्षा। बचपन से लेकर युवावस्था तक हम यही सुनते और बोलते आए हैं कि “मैंने दसवीं पास कर ली”, “मैं बारहवीं में हूं” या “बारहवीं की परीक्षा दे रहा हूं।” लेकिन यदि हम तकनीकी और शैक्षिक दृष्टिकोण से देखें, तो यह पूरी तरह सही नहीं है।
वास्तव में, दसवीं और बारहवीं को ‘कक्षा’ के रूप में नहीं, बल्कि एक सर्टिफिकेट कोर्स के रूप में समझा जाना चाहिए। दसवीं का वास्तविक नाम सेकेंडरी स्कूल सर्टिफिकेट परीक्षा है, जबकि बारहवीं को हायर सेकेंडरी स्कूल सर्टिफिकेट परीक्षा कहा जाता है। यह केवल शब्दों का अंतर नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की मूल संरचना को समझने का विषय है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन परीक्षाओं के प्रमाण पत्र या अंकतालिका में कहीं भी “दसवीं पास” या “बारहवीं पास” जैसा उल्लेख नहीं होता। वहां स्पष्ट रूप से “सेकेंडरी” या “हायर सेकेंडरी” सर्टिफिकेट का उल्लेख होता है। इसका सीधा अर्थ है कि विद्यार्थी एक निर्धारित कोर्स को सफलतापूर्वक पूर्ण करता है और उसे प्रमाणित किया जाता है।
फिर प्रश्न उठता है कि हम इसे ‘कक्षा’ क्यों कहते हैं? इसका उत्तर हमारी बोलचाल की आदतों और सामाजिक समझ में छिपा है। वर्षों से चली आ रही भाषा और परंपरा ने इन सर्टिफिकेट कोर्स को ‘कक्षा’ के रूप में स्थापित कर दिया है। लेकिन जब हम तकनीकी और शैक्षिक रूप से सही शब्दों का उपयोग नहीं करते, तो हम स्वयं शिक्षा की वास्तविक संरचना को समझने से चूक जाते हैं।
इस विषय को समझने के लिए एक रोचक उदाहरण लिया जा सकता है। जब कोई विद्यार्थी स्नातक (ग्रेजुएशन) पूरी करता है, तो वह यह नहीं कहता कि “मैंने 15वीं कक्षा पास कर ली।” वह कहता है कि “मैंने स्नातक उपाधि प्राप्त की।” इसी प्रकार, दसवीं और बारहवीं भी एक प्रकार के सर्टिफिकेट कोर्स हैं, जिन्हें पूरा करने के बाद विद्यार्थी अगले स्तर—डिग्री, डिप्लोमा या अन्य कोर्स—में प्रवेश करता है।
यह समझ केवल शब्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध हमारे शिक्षा के प्रति दृष्टिकोण से है। जब हम दसवीं और बारहवीं को केवल ‘कक्षा’ मानते हैं, तो हम उनके महत्व को सीमित कर देते हैं। लेकिन जब हम इन्हें एक सर्टिफिकेट कोर्स के रूप में देखते हैं, तो हमें यह समझ आता है कि यह शिक्षा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, जो आगे की दिशा तय करता है।
आज के दौर में, जब शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करने का माध्यम बनती जा रही है, तब यह और भी जरूरी हो जाता है कि हम उसकी संरचना और उद्देश्य को सही ढंग से समझें। शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा पास करना नहीं, बल्कि ज्ञान, कौशल और समझ का विकास करना है। यदि हम शब्दों की शुद्धता और उनके अर्थ को समझने लगें, तो हम शिक्षा के प्रति अधिक जागरूक और जिम्मेदार बन सकते हैं।
इसके साथ ही, यह भी जरूरी है कि विद्यालयों और शिक्षकों द्वारा विद्यार्थियों को इस विषय में जागरूक किया जाए। जब छात्र शुरुआत से ही यह समझेंगे कि वे एक सर्टिफिकेट कोर्स कर रहे हैं, तो उनके भीतर एक अलग प्रकार की जिम्मेदारी और गंभीरता आएगी। वे इसे केवल एक ‘कक्षा’ के रूप में नहीं, बल्कि अपने करियर के महत्वपूर्ण चरण के रूप में देखेंगे।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि शिक्षा के क्षेत्र में सही शब्दों का प्रयोग केवल औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह हमारी बौद्धिक स्पष्टता का प्रतीक है। जब हम सही शब्दों का उपयोग करते हैं, तो हम न केवल स्वयं को बेहतर ढंग से व्यक्त करते हैं, बल्कि दूसरों को भी सही जानकारी देते हैं।
अंततः, यह कहना गलत नहीं होगा कि “दसवीं” और “बारहवीं” केवल बोलचाल की सुविधा के लिए उपयोग किए जाने वाले शब्द हैं। वास्तविकता में ये सेकेंडरी और हायर सेकेंडरी सर्टिफिकेट कोर्स हैं, जो एक विद्यार्थी के शैक्षणिक जीवन की महत्वपूर्ण सीढ़ियाँ हैं।
अब समय आ गया है कि हम इस सामान्य लेकिन महत्वपूर्ण भूल को सुधारें। जब भी हम इन परीक्षाओं का उल्लेख करें, तो सही शब्दों का प्रयोग करें—सेकेंडरी और हायर सेकेंडरी सर्टिफिकेट। यह छोटा सा बदलाव न केवल हमारी भाषा को शुद्ध करेगा, बल्कि शिक्षा के प्रति हमारी समझ को भी परिष्कृत करेगा।
क्योंकि सही शब्द ही सही सोच का निर्माण करते हैं—और सही सोच ही एक सशक्त समाज की नींव रखती है।
*भीम प्रज्ञा अलर्ट*
“गलत धारणाएं हमें सीमित करती हैं, जबकि सही समझ हमें आगे बढ़ने की दिशा दिखाती है।”
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