संवैधानिक इस्तीफा या मजबूरी का मंथन – उपराष्ट्रपति धनखड़ का कदम और लोकतंत्र की गूंज
संपादकीय
22 जुलाई 2025।
*"संवैधानिक इस्तीफा या मजबूरी का मंथन – उपराष्ट्रपति धनखड़ का कदम और लोकतंत्र की गूंज"*
देश की दूसरी सर्वोच्च संवैधानिक कुर्सी — उपराष्ट्रपति पद — से इस्तीफा देना कोई साधारण घटना नहीं होती। और जब यह इस्तीफा राजस्थान के झुंझुनूं जैसे जनमानस से जुड़े क्षेत्र के बेटे और भारत के प्रतिष्ठित नेता जगदीप धनखड़ द्वारा दिया जाए, तो यह सिर्फ एक राजनीतिक घटनाक्रम नहीं बल्कि जनचेतना का झटका बन जाता है।
धनखड़ साहब ने अपने इस्तीफे में स्वास्थ्य कारणों का हवाला दिया है, लेकिन क्या यह केवल इतना भर है? यह वही देश है जहां आम आदमी डॉक्टर की सलाह के बावजूद सिगरेट नहीं छोड़ता, वहां एक सक्षम, सक्रिय और राजनीतिक रूप से सजग उपराष्ट्रपति अपना पद त्याग देता है — वह भी तब, जब देश चुनावी घमासान के मुहाने पर खड़ा है! स्वास्थ्य कारण बताकर दिया गया यह त्यागपत्र सवालों का बवंडर खड़ा करता है। क्या यह वास्तव में शारीरिक स्वास्थ्य है, या फिर राजनीतिक स्वास्थ्य से जुड़ी कोई गहरी बेचैनी? क्या उन्हें सत्ता के गलियारों में कुछ ऐसा दिखा जो अब अनदेखा नहीं किया जा सकता था? सवाल तो अनेक उत्पन्न होते हैं आने को सवालों के बीच यदि मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
देश की दूसरी सबसे बड़ी संवैधानिक कुर्सी — भारत के उपराष्ट्रपति पद — से दिया गया जगदीप धनखड़ का इस्तीफा, सिर्फ एक औपचारिक घोषणा नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के वर्तमान परिदृश्य पर एक गंभीर प्रश्नचिन्ह है। यह इस्तीफा किसी दीवार पर उभरे दरार की तरह नहीं है, बल्कि नींव में गूंज रही एक गहरी आवाज़ है — जिसे हम अनसुना नहीं कर सकते।
जब एक व्यक्ति ऊंचे संवैधानिक दायित्व के शिखर पर बैठा हो, और अचानक “स्वास्थ्य कारण” का हवाला देकर अपने पद से हट जाए, तो यह कारण सीधा नहीं, संदिग्ध प्रतीत होता है। मैं यह बात पुनः दोहराना चाहूंगा कि एक सामान्य व्यक्ति डॉक्टर की सलाह पर बीड़ी सिगरेट तक नहीं छोड़ता, और यहां एक अनुभवी, स्वस्थ, सक्रिय व सजग उपराष्ट्रपति पूरे संविधान का उत्तरदायित्व छोड़ देता है — वो भी एक संवेदनशील चुनावी मौसम में?
यह क्या वाकई स्वास्थ्य कारण है या फिर राजनीतिक दबाव और संवैधानिक हाशिए पर पहुंचा दिए जाने की पीड़ा?
सबसे गंभीर सवाल यह है कि क्या यह त्यागपत्र उनकी स्वेच्छा से था, या किसी अदृश्य राजनीतिक दबाव के तहत दिलवाया गया? भारतीय राजनीति में यह कोई नई बात नहीं है कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को ‘नैतिकता’, ‘दबाव’, ‘अनुशासन’ या ‘दलगत भलाई’ के नाम पर बाहरी शक्तियों के आगे झुकना पड़ता है।
इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है जहां चुप्पी, मजबूरी और इस्तीफे, लोकतंत्र के मौन रुदन बनकर रह गए। आज यह स्पष्ट प्रश्न बनकर खड़ा है कि कहीं भारत की लोकतांत्रिक आत्मा फिर से किसी ‘छाया तंत्र’ के अधीन तो नहीं हो रही। यह इस्तीफा एक यह गूंज भी छोड़ना है कि आज संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता पर खतरा मंडराया हुआ है ?
जगदीप धनखड़ जैसे व्यक्ति, जो किसान पुत्र होते हुए सर्वोच्च न्यायिक, राजनीतिक और सामाजिक स्तरों तक पहुंचे, उनका इस्तीफा इसलिए भी पीड़ा देता है क्योंकि वे उन चंद व्यक्तित्वों में से एक थे जिन्होंने संवैधानिक गरिमा को व्यक्तिगत सीमाओं से ऊपर रखा।
लेकिन अगर ऐसे व्यक्ति को भी संस्थागत शक्ति और विचारधारा की सीमा रेखाएं खींचने लगे, तो आम जनता को यह सोचने पर मजबूर होना ही पड़ेगा कि क्या हमारा लोकतंत्र आंतरिक रूप से घायल तो नहीं हो रहा?
क्या यह इस्तीफा, किसी संभावित ‘विस्थापन’ का संकेत है? या आने वाले चुनावी समीकरणों का एक अनकहा हिस्सा?
यह कोई सामान्य राजनीतिक घटनाक्रम नहीं, संवैधानिक मर्यादा की हलचल है। जब उच्च पदस्थ व्यक्ति स्वयं को व्यवस्था में असहज पाते हैं, तब आम नागरिकों के अधिकार, सुरक्षा और उम्मीदें कितनी सुरक्षित हैं — यह हमें खुद से पूछना चाहिए।
ध्यान रहे, लोकतंत्र तब खतरे में आता है जब स्वतंत्र संस्थाएं चुप हो जाएं, और सवाल पूछने वाले इस्तीफा देने पर मजबूर हो जाएं।
धनखड़ साहब का इस्तीफा एक दस्तावेज नहीं, बल्कि एक लोकतांत्रिक दस्तक है। यह हमारे संविधान, संस्थाओं और उनके संरक्षण की सांकेतिक चेतावनी है। आज आवश्यक है कि देश का जागरूक नागरिक वर्ग इस पूरे घटनाक्रम को सिर्फ "स्वास्थ्य कारण" की चादर में लपेटकर न देखे, बल्कि वास्तविक कारणों की तह तक जाने की कोशिश करे।
संवैधानिक पद पर बैठा हुआ व्यक्ति भी अगर स्वतंत्र नहीं, तो नागरिक किस भरोसे जिएं?
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