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Showing posts from November, 2024

जीवन के दो महत्वपूर्ण पहलू : इंसानियत और कर्म

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संपादकीय@एडवोकेट हरेश पंवार   *जीवन के दो महत्वपूर्ण पहलू : इंसानियत और कर्म*  इंसानियत केवल रास्ता दिखाती है, लेकिन मंजिल तक तो कर्म ही पहुंचाता है। यह विचार हमें जीवन के दो महत्वपूर्ण पहलुओं, इंसानियत और कर्म, के बारे में सोचने के लिए प्रेरित करता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। इंसानियत हमें सहानुभूति, करुणा, और दया की भावना सिखाती है। यह हमें दूसरों के प्रति सहानुभूति रखने और उनकी मदद करने के लिए प्रेरित करती है। लेकिन इंसानियत केवल रास्ता दिखाती है, यह हमें मंजिल तक नहीं पहुंचाती। कर्म, दूसरी ओर, हमें मंजिल तक पहुंचाने में मदद करता है। यह हमें अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए प्रेरित करता है और हमें अपने सपनों को पूरा करने के लिए काम करने के लिए प्रोत्साहित करता है।      अत:इंसानियत केवल रास्ता दिखाती है, लेकिन मंजिल तक तो कर्म ही पहुंचाता है। अपनी किस्मत को कभी दोष मत दीजिए। इंसान के रूप में जन्म मिला है, ये किस्मत नहीं तो और क्या है। कहते हैं कि रेत में गिरी हुई चीनी चींटी तो उठा सकती है, परंतु हाथी नहीं । इसलिए छोटे आद...

दुख का कारण सुख भोग

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संपादकीय- * दुख का कारण सुख भोग मनुष्य में असीमित इच्छाओं की उत्पत्ति के साथ ही दुखों का जन्म होता है। यदि हम गहनता से विचार करें तो दुख का कारण सुख भोग से होता है। प्यास लगने पर मनुष्य दुखी हो जाता है और पानी से प्यास मिटाने पर सुख का अनुभव करते हैं। लेकिन मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। जब हम अपनी असीमित इच्छाओं के सुख को ओर बढ़ाना चाहते हैं तो इसमें कमी आती है और मन पुनः दुखी हो जाता है। परंतु जिस समय हम स्वयं को ही दुख का कारण मानने लगते हैं तो दुख भी दूर होने लगता है। उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति को एक बड़ा घर चाहिए था, लेकिन जब उसने वह घर खरीद लिया, तो उसे एहसास हुआ कि उसे अब और भी बड़ा घर चाहिए। इस तरह, उसकी इच्छाएं कभी भी पूरी नहीं हुईं और वह हमेशा दुखी रहा। अतः इंसान के लिए अपनी इच्छाओं को सीमित और मन को संतुष्ट रखकर सत्कर्म करना ही हितकारी है। हमें अपनी इच्छाओं को सीमित रखना चाहिए और मन को संतुष्ट रखना चाहिए। इससे हम दुखों से मुक्त हो सकते हैं और जीवन में सुख और शांति का अनुभव कर सकते हैं। हर पल में प्यार और हर लम्हे में ख़ुशी ही जीवन का असली अर्थ समझ जा...

जीवन में परिवर्तन और पवित्र परिवेश का महत्व

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संपादकीय 24 November 2024  जीवन में परिवर्तन और पवित्र परिवेश का महत्व जीवन में परिवर्तन एक निरंतर प्रक्रिया है। यह परिवर्तन हमारे व्यक्तिगत जीवन में, रिश्तों में, काम में या समाज में हो सकता है। लेकिन यह परिवर्तन हमें कैसे प्रभावित करता है? और क्या हम इस परिवर्तन को अपना सकते हैं? एक प्रसिद्ध कहावत है, "चंदन वृक्ष की संगति से सामान्य वृक्षों में सुगंध आने लग जाती हैं और दूध की संगति से पानी का भाव बढ़ जाता है।" यह कहावत हमें यह समझने में मदद करती है कि हमारा परिवेश, हमारा संग, हमारा समाज हमारे जीवन को कैसे प्रभावित करता है।  पवित्र जीवन के लिए पवित्र विचार और पवित्र परिवेश का होना अति आवश्यक है। हमारे विचार और परिवेश हमारे जीवन को मूल्यवान या निर्मूल्य बना सकते हैं। इसलिए, हमें अपने विचारों और परिवेश का ध्यान रखना चाहिए और उन्हें पवित्र बनाने का प्रयास करना चाहिए। यदि मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। जब तक चरितार्थ ना किया जाए, जब तक कोई काम नहीं आता तब तक केवल कोरा उपदेश जिंदगी का दूसरा नाम परिवर्तन है। अब चाहे वो परिर्वतन आप में हो, आपके रिश्तों में हो, आप...

सम्मान देने वाले बनने की भावना रखें

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संपादकीय 25 नवंबर 2024  *सम्मान देने वाले बनने की भावना रखें*  सदैव हमें यह याद रखना चाहिए कि सम्मान पाने की लालसा रखने वाले नहीं, बल्कि सम्मान देने वाले बनने की भावना रखनी चाहिए। यह भावना हमें सहजता और सहनशीलता की ओर ले जाती है, जो मानव जीवन की सबसे बड़ी सामर्थ्य है। सम्मान प्राप्ति की लालसा रखने वाले लोग अक्सर दूसरों को झुकाने की कोशिश करते हैं, लेकिन सम्मान देने वाले बनने की भावना रखने वाले लोग स्वयं को झुकाने की कोशिश करते हैं। यही सही अर्थ में सामर्थ्य है। मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।        सहजता ही समर्थता है, सहनशीलता ही मानव जीवन की सबसे बड़ी सामर्थ्य है। सामर्थ्य का अर्थ यह नहीं कि आप दूसरों को कितना झुका सकते हो अपितु यह है कि आप स्वयं कितना झुक सकते हो क्योंकि जहाँ समर्थता होती है, वहाँ प्रायः विनम्रता का अभाव ही देखा जाता है। सामर्थ्य आते ही व्यक्ति के भीतर सम्मान प्राप्ति का भाव भी जागृत हो जाता है।      इसलिए सदैव इस बात के लिए प्रयासरत रहें कि हम सम्मान पाने की लालसा रखने वाले नहीं, सम्मान देने वाले बनने क...

मधुर जुबान, मजबूत रिश्ते की आधारशिला

संपादकीय  (सोमानी रिसोर्ट खेड़ी ,बेगुन चित्तौड़गढ़, 22 नवंबर 2024)  *मधुर जुबान, मजबूत रिश्ते की आधारशिला*  कबीर दास जी के शब्दों में "ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोए,ओरन को शीतल करें आपहुं शीतल होय।"     मधुर जुबान के रिश्तों के बारे में बेखुबी से लिखा गया है। एक देसी कहावत है कि यही जुबान घोड़े बैठा दे, और यही जुबान गधे बैठा दे इसलिए जुबान पर लगाम होनी चाहिए। रिश्ता निभाने के लिए पहले जुबान से वास्ता पड़ता है। दिल तक तो कुछ खास लोग पहुंच पाते हैं।  जीवन का यही विधान है कि हमें अपने रिश्तों को निभाने के लिए पहले जुबान से वास्ता पड़ता है। लोगों का वास्ता पहले जुबान से पड़ता है, दिल तक तो कुछ खास लोग ही पहुंच पाते हैं। यह बात  कि हमें अक्सर भूल जाते है और हम अपने रिश्तों में जुबान की जगह दिल को अधिक महत्व देते हैं। लेकिन जुबान की शक्ति को नकारा नहीं जा सकता। जुबान से बोले गए शब्द हमारे रिश्तों को बना सकते हैं या बिगाड़ सकते हैं। अगर हम अपनी जुबान को सही तरीके से उपयोग करें, तो हम अपने रिश्तों को मजबूत बना सकते हैं। इसलिए मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बो...