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Showing posts from February, 2026

दूसरों को गिराकर नहीं, उठाकर मिलती है असली ऊँचाई

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संपादकीय@ 25.02.2026  *दूसरों को गिराकर नहीं, उठाकर मिलती है असली ऊँचाई*  समाज में हम अक्सर ऐसे लोगों से रूबरू होते हैं जो दूसरों को छोटा दिखाकर स्वयं को बड़ा साबित करने की कोशिश करते हैं। वे आलोचना, उपहास और तिरस्कार के माध्यम से यह जताने का प्रयास करते हैं कि वे श्रेष्ठ हैं। लेकिन गहराई से देखें तो यह व्यवहार आत्मविश्वास का नहीं, बल्कि अंदरूनी डर और असुरक्षा का संकेत होता है। जो व्यक्ति अपनी काबिलियत को लेकर आश्वस्त नहीं होता, वही दूसरों को नीचा दिखाकर स्वयं को “सुरक्षित” महसूस करना चाहता है। मैं यहां बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। मानव मनोविज्ञान बताता है कि असुरक्षा की भावना व्यक्ति को नकारात्मक प्रतिक्रियाओं की ओर धकेलती है। जब किसी को लगता है कि उसकी तुलना में दूसरा अधिक सक्षम, लोकप्रिय या सफल है, तो वह ईर्ष्या का शिकार हो सकता है। यह ईर्ष्या कई बार स्वस्थ प्रतिस्पर्धा में बदल सकती है, लेकिन जब आत्मसम्मान की कमी होती है, तो यही भावना दूसरों को गिराने के प्रयास में परिवर्तित हो जाती है। व्यक्ति को भ्रम होता है कि यदि सामने वाला कमजोर दिखेगा, तभी वह स्वयं मज...

परिवार को जोड़े रखने वाली ‘आलपीन’ की अनदेखी पीड़ा

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 संपादकीय@23 फरवरी 2026  *परिवार को जोड़े रखने वाली ‘आलपीन’ की अनदेखी पीड़ा*  कागज़ों के एक बिखरे हुए पुलिंदे को यदि व्यवस्थित और सुरक्षित रखना हो, तो एक छोटी-सी आलपीन ही पर्याप्त होती है। वह स्वयं कागज़ों को चुभती है, पर उन्हीं कागज़ों को एक क्रम, एक दिशा और एक पहचान भी देती है। यदि वह पीन हटा दी जाए, तो वही कागज़ बिखर जाते हैं, उनका क्रम टूट जाता है और उनमें लिखी बातों का अर्थ भी बदल सकता है। ठीक इसी प्रकार परिवार में भी एक ऐसा व्यक्ति होता है, जो सबको जोड़े रखने का प्रयास करता है। उसका प्रयास कई बार कठोर, अनुशासनात्मक या ‘चुभने’ वाला प्रतीत होता है, किंतु उसका उद्देश्य केवल परिवार को संगठित और सुरक्षित रखना होता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। आज के बदलते सामाजिक परिवेश में परिवार की परिभाषा और संरचना दोनों तेजी से परिवर्तित हो रही हैं। संयुक्त परिवारों की जगह एकल परिवारों ने ले ली है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता, आत्मनिर्भरता और निजी निर्णयों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है। यह परिवर्तन बुरा नहीं है, परंतु जब स्वतंत्रता वर्चस्व की ल...

भाग्य नहीं, परिश्रम की पूंजी—सफलता का असली सूत्र

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संपादकीय@हरेश पंवार 18/02/2026 *भाग्य नहीं, परिश्रम की पूंजी—सफलता का असली सूत्र* “भाग्य भी उन्हीं का साथ देता है जो पसीना बहाना जानते हैं”—यह केवल प्रेरक वाक्य नहीं, बल्कि जीवन का गहन दर्शन है। समाज में जब भी किसी व्यक्ति को ऊँचाइयों पर पहुंचते देखते हैं, तो अक्सर उसे ‘भाग्यशाली’ कहकर उसकी सफलता को संक्षेप में समझाने की कोशिश करते हैं। किंतु यह दृष्टिकोण अधूरा है। किसी भी उपलब्धि के पीछे अनगिनत संघर्ष, असफलताओं से जूझने का साहस, निरंतर अभ्यास और त्याग छिपा होता है। भाग्य वास्तव में परिश्रम का ही दूसरा नाम है, जो सही समय पर अवसर के रूप में प्रकट होता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे किबोलता है। मनुष्य के जीवन में अवसर अचानक आते हुए प्रतीत हो सकते हैं, परंतु वे वास्तव में उन लोगों को ही दिखाई देते हैं जो तैयार रहते हैं। तैयारी स्वयं में एक कठिन प्रक्रिया है—अनुशासन, धैर्य और निरंतरता का संगम। जो व्यक्ति लक्ष्य निर्धारित कर उसके लिए निरंतर प्रयास करता है, वही अवसर आने पर उसे पहचान और पकड़ पाता है। यही वह क्षण है जब लोग कहते हैं—“भाग्य ने साथ दिया।” दरअसल, यह तैयारी और अवसर क...

दूध या जहर? मिलावट के साए में भारत की थाली और स्वास्थ्य का भविष्य

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संपादकीय0@16फरवरी2026   *दूध या जहर? मिलावट के साए में भारत की थाली और स्वास्थ्य का भविष्य* “दूध नहीं, जहर पी रहा है इंडिया”—यह वाक्य अतिशयोक्ति प्रतीत हो सकता है, लेकिन जब उत्पादन और खपत के आंकड़ों के बीच भारी अंतर दिखाई देता है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। यदि देश में दूध का उत्पादन लगभग 14 करोड़ लीटर प्रतिदिन है और खपत 64 करोड़ लीटर तक बताई जाती है, तो शेष दूध कहाँ से आ रहा है? यह अंतर केवल सांख्यिकीय भ्रम नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर प्रश्न है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। भारत लंबे समय से दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश कहलाता रहा है। गांवों में पशुपालक परिवारों की मेहनत से दूध की धारा बहती है। लेकिन आज आम उपभोक्ता तक जो दूध पहुँचता है, वह सीधे पशुपालक से नहीं आता। बीच में कई परतें हैं—स्थानीय संग्रह केंद्र, फैट डेयरियाँ, प्रोसेसिंग यूनिट, पैकेजिंग प्लांट और थोक वितरक। इसी श्रृंखला में कहीं शुद्धता की जगह मिलावट प्रवेश कर जाती है। मुनाफे की अंधी दौड़ में कुछ तत्व दूध में पानी मिलाने से आगे बढ़कर रासायनिक पद...

ग्राम स्वराज या जाति का रण? पंचायत चुनावों के आईने में गांव की सियासत

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 संपादकीय@ 15 फरवरी 2026 ग्राम स्वराज या जाति का रण? पंचायत चुनावों के आईने में गांव की सियासत राजस्थान में पंचायत राज चुनावों की आहट के साथ ही गांवों की फिज़ा बदलने लगी है। चौपालों पर चर्चा, गलियों में समूह, खेत-खलिहानों के बीच रणनीतियाँ—लोकतंत्र का उत्सव अपने पारंपरिक रूप में दिखाई देता है। लेकिन इस उत्सव के भीतर एक कड़वी सच्चाई भी सिर उठाती है। विकास की योजनाओं और ग्राम स्वराज के सपनों की जगह जाति, धर्म, क्षेत्र और गोत्र की खींचतान हावी होने लगती है। योग्यता और इंसानियत कोने में सिमट जाती है, और वर्चस्व की राजनीति केंद्र में आ बैठती है। यहां मैंबलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। हर चुनाव में यह उम्मीद जगती है कि इस बार गांव का नेतृत्व ऐसे हाथों में जाएगा जो शिक्षा, पारदर्शिता और दूरदृष्टि के साथ पंचायत चलाएंगे। लेकिन वास्तविकता अक्सर अलग तस्वीर पेश करती है। उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि या विकास दृष्टि से ज्यादा चर्चा इस बात की होती है कि वह किस खाप से है, किस बिरादरी का समर्थन उसे मिलेगा, और कौन-सा गुट किसके खिलाफ लामबंद है। खानदान की प्रतिष्ठा, पुरानी रंजिशें और खेत की...

भौतिक दौड़ के बीच इंसानियत की पुकार

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संपादकीय@13फरवरी2026 भौतिक  दौड़ के बीच इंसानियत की पुकार आज का युग अभूतपूर्व प्रगति का युग कहा जाता है। विज्ञान, तकनीक, बाजार और उपभोग—हर क्षेत्र में मानव ने अद्भुत उपलब्धियाँ हासिल की हैं। लेकिन इस चमकदार विकास के बीच एक प्रश्न बार-बार सामने खड़ा होता है—क्या हम सचमुच बेहतर इंसान भी बन पाए हैं? यदि समाज में असहिष्णुता, हिंसा, स्वार्थ और संवेदनहीनता बढ़ रही हो, तो केवल आर्थिक उन्नति को प्रगति कैसे कहा जा सकता है? यही वह बिंदु है जहाँ इंसानियत, दया और करुणा की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। मनुष्य को अन्य प्राणियों से अलग केवल उसकी बुद्धि नहीं बनाती, बल्कि उसका संवेदनशील हृदय बनाता है। सोचने की क्षमता हमें सक्षम बनाती है, परंतु करुणा हमें महान बनाती है। इतिहास गवाह है कि महात्मा बुद्ध से लेकर गुरु रविदास, मदर टेरेसा से लेकर नेल्सन मंडेला तक—जिन्होंने भी मानवता को दिशा दी, उन्होंने शक्ति के बल पर नहीं, बल्कि दया और करुणा के बल पर समाज को बदला। यह प्रमाण है कि वास्तविक परिवर्तन हृदय से शुरू होता है, हथियारों या संपत्ति से नहीं। आज भौतिक संसाधनों की होड़ में मनुष्य स्वय...

इलाज के नाम पर सच और झूठ का खेल — जब तक चेतना नहीं, तब तक व्यवस्था नहीं

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संपादकीय@हरेश पंवार 12 फरवरी 2026  *इलाज के नाम पर सच और झूठ का खेल — जब तक चेतना नहीं, तब तक व्यवस्था नहीं* स्वास्थ्य योजनाएं किसी भी सभ्य समाज की संवेदनशील पहचान होती हैं। इनका उद्देश्य होता है कि अंतिम पंक्ति में खड़ा व्यक्ति भी बिना भय और बोझ के इलाज पा सके। लेकिन आज की कड़वी सच्चाई यह है कि इलाज और वसूली, सेवा और सौदेबाज़ी के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है। निजी अस्पतालों में मेडिकल क्लेम कार्डों के नाम पर जो कुछ चल रहा है, वह केवल व्यवस्था की कमजोरी नहीं, बल्कि एक संगठित नेटवर्क का परिणाम है—जिसमें सच कम और झूठ ज़्यादा है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। यह मान लेना कि कानून को और कठोर बना देने से, या कार्ड की प्रक्रिया को और जटिल कर देने से यह गोरखधंधा रुक जाएगा, अपने आप में एक भ्रम है। कागज़ पर कानून जितने भी सख्त क्यों न हों, ज़मीन पर जब तक नीयत नहीं बदलेगी, तब तक परिणाम नहीं बदलेंगे। आज समस्या केवल अस्पताल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह गांव-गांव फैले उस कमीशनखोरी नेटवर्क तक पहुँच चुकी है, जो कार्डधारकों की तलाश में घूम रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में ...

विज्ञान: अज्ञानता के अंधकार में प्रगति की मशाल

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संपादकीय@ Haresh Panwar 10-02-2026  *विज्ञान: अज्ञानता के अंधकार में प्रगति की मशाल*  विज्ञान केवल प्रयोगशालाओं की चारदीवारी में सिमटा कोई विषय नहीं, बल्कि यह मानव सभ्यता की चेतना, दृष्टि और भविष्य निर्माण की सबसे सशक्त शक्ति है। विज्ञान वह मशाल है, जो अज्ञानता, अंधविश्वास और रूढ़ियों के अंधेरे को चीरकर समाज को तर्क, विवेक और प्रगति के पथ पर अग्रसर करती है। जिस समाज ने विज्ञान को अपनाया, उसने न केवल प्रकृति को समझा, बल्कि अपने जीवन को अधिक सुरक्षित, स्वस्थ और सम्मानजनक बनाया। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। आज के युग में विज्ञान को केवल बीते आविष्कारों की सूची के रूप में देखना एक बड़ी भूल होगी। विज्ञान अतीत की उपलब्धियों पर ठहर जाने का नाम नहीं, बल्कि वर्तमान ज्ञान के आधार पर भविष्य की योजनाएँ गढ़ने की सतत प्रक्रिया है। यह हमें यह सिखाता है कि समस्याओं से डरना नहीं, बल्कि उनके समाधान खोजने की आदत विकसित करनी चाहिए। विज्ञान प्रश्न करना सिखाता है, संदेह करना सिखाता है और प्रमाण के आधार पर सत्य तक पहुँचने का साहस देता है। समाज में फैले अंधविश्वास, पाखंड और ...

इलाज या वसूली? मेडिकल क्लेम कार्डों के नाम पर चल रहा अस्पतालों का अदृश्य कारोबार

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संपादकीय@Haresh panwar 11fab. 2026 *इलाज या वसूली? मेडिकल क्लेम कार्डों के नाम पर चल रहा अस्पतालों का अदृश्य कारोबार* कभी डॉक्टर को ‘धरती का भगवान’ कहा जाता था। यह उपाधि यूँ ही नहीं मिली थी—क्योंकि डॉक्टर का उद्देश्य केवल इलाज नहीं, बल्कि पीड़ा में पड़े इंसान को संबल देना था। लेकिन आज जब अस्पताल के प्रवेश द्वार पर मरीज से पहले उसका मेडिकल क्लेम कार्ड देखा जाता है, तो यह सवाल उठना लाज़िमी है कि क्या इलाज की प्राथमिकता अब स्वास्थ्य है या भुगतान की व्यवस्था? आज देशभर में ईसीएचएस, आरजेएचएस, आयुष्मान और अन्य सरकारी–अर्धसरकारी स्वास्थ्य योजनाएँ आम आदमी के लिए जीवन रेखा बनी हैं। निस्संदेह, इन योजनाओं से लाखों जरूरतमंदों को राहत मिली है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि इन्हीं योजनाओं के नाम पर प्राइवेट अस्पतालों में एक संगठित गोरखधंधा पनपता दिख रहा है—जहाँ बीमारी से ज़्यादा महत्व कार्ड को दिया जा रहा है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। अस्पतालों में कदम रखते ही सबसे पहले सामना होता है तथाकथित काउंसलर से। ये काउंसलर न डॉक्टर होते हैं, न ही चिकित्सा विशेषज्ञ, लेकिन इन्हीं के इशार...

किताबें और समाज: ज्ञान से आगे जीवन का पाठ

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संपादकीय@हरेश पंवार 3फरवरी 2026 *किताबें और समाज: ज्ञान से आगे जीवन का पाठ* किताबें मनुष्य की सबसे पुरानी और विश्वसनीय गुरु रही हैं। वे हमें सभ्यता का इतिहास बताती हैं, विज्ञान की खोजों से परिचित कराती हैं, दर्शन के गूढ़ प्रश्नों से जूझना सिखाती हैं और यह भी समझाती हैं कि “इंसानियत सबसे बड़ा धर्म है।” स्कूल की कक्षाओं से लेकर विश्वविद्यालयों तक, ज्ञान की पहली सीढ़ी किताबों के सहारे ही चढ़ी जाती है। लेकिन जीवन की यात्रा में एक ऐसा मोड़ भी आता है, जहाँ किताबों से सीखा हुआ आदर्श ज्ञान अधूरा सा लगने लगता है और तब समाज स्वयं शिक्षक बनकर सामने खड़ा हो जाता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। किताबें हमें आदर्श दुनिया का चित्र दिखाती हैं—जहाँ सत्य की जीत होती है, न्याय सर्वोपरि होता है और मनुष्यता सर्वोच्च मूल्य होती है। पर समाज की वास्तविकता कई बार इन आदर्शों को कठोर प्रश्नों के घेरे में खड़ा कर देती है। यहाँ इंसानियत की कीमत समय, परिस्थिति और स्वार्थ के हिसाब से तय होती है। लोग अपने लहजे बदलते हैं, चेहरे पर मुखौटे चढ़ाते हैं और व्यवहार में वह सब सिखा जाते हैं, जो किसी...