विज्ञान: अज्ञानता के अंधकार में प्रगति की मशाल
संपादकीय@ Haresh Panwar 10-02-2026
*विज्ञान: अज्ञानता के अंधकार में प्रगति की मशाल*
विज्ञान केवल प्रयोगशालाओं की चारदीवारी में सिमटा कोई विषय नहीं, बल्कि यह मानव सभ्यता की चेतना, दृष्टि और भविष्य निर्माण की सबसे सशक्त शक्ति है। विज्ञान वह मशाल है, जो अज्ञानता, अंधविश्वास और रूढ़ियों के अंधेरे को चीरकर समाज को तर्क, विवेक और प्रगति के पथ पर अग्रसर करती है। जिस समाज ने विज्ञान को अपनाया, उसने न केवल प्रकृति को समझा, बल्कि अपने जीवन को अधिक सुरक्षित, स्वस्थ और सम्मानजनक बनाया। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
आज के युग में विज्ञान को केवल बीते आविष्कारों की सूची के रूप में देखना एक बड़ी भूल होगी। विज्ञान अतीत की उपलब्धियों पर ठहर जाने का नाम नहीं, बल्कि वर्तमान ज्ञान के आधार पर भविष्य की योजनाएँ गढ़ने की सतत प्रक्रिया है। यह हमें यह सिखाता है कि समस्याओं से डरना नहीं, बल्कि उनके समाधान खोजने की आदत विकसित करनी चाहिए। विज्ञान प्रश्न करना सिखाता है, संदेह करना सिखाता है और प्रमाण के आधार पर सत्य तक पहुँचने का साहस देता है।
समाज में फैले अंधविश्वास, पाखंड और अवैज्ञानिक सोच के विरुद्ध विज्ञान सबसे प्रभावी औज़ार है। जब विज्ञान की दृष्टि कमजोर होती है, तब अफ़वाहें सच बन जाती हैं और अंधविश्वास नीति निर्धारण तक पहुँच जाता है। इसके विपरीत, वैज्ञानिक सोच समाज को विवेकशील बनाती है, जहाँ निर्णय भावनाओं या डर के आधार पर नहीं, बल्कि तथ्यों और तर्कों के आधार पर लिए जाते हैं। यही कारण है कि वैज्ञानिक चेतना किसी भी लोकतांत्रिक और प्रगतिशील समाज की आत्मा मानी जाती है।
विज्ञान ने चिकित्सा के क्षेत्र में मानव जीवन की औसत आयु बढ़ाई है, असाध्य मानी जाने वाली बीमारियों को चुनौती दी है और महामारी जैसे संकटों से लड़ने की क्षमता दी है। संचार के क्षेत्र में विज्ञान ने पूरी दुनिया को एक गाँव में बदल दिया है। अंतरिक्ष विज्ञान ने मानव की सीमाओं को पृथ्वी से बाहर तक विस्तारित किया है, वहीं कृषि विज्ञान ने भोजन सुरक्षा को मज़बूती दी है। ये सभी उपलब्धियाँ यह प्रमाण हैं कि विज्ञान केवल सुविधा नहीं, बल्कि अस्तित्व की शर्त बन चुका है।
यदि विज्ञान की खोज को ‘बीज’ माना जाए, तो उससे विकसित होने वाला समाज एक विशाल और सशक्त ‘वृक्ष’ है। यह वृक्ष तभी फलता-फूलता है, जब शिक्षा प्रणाली वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा दे, सरकारें शोध और नवाचार को प्राथमिकता दें और समाज तर्कशीलता को सम्मान दे। दुर्भाग्यवश, कई बार विज्ञान को भी संकीर्ण राजनीति और अज्ञानता की भेंट चढ़ा दिया जाता है, जो किसी भी राष्ट्र के लिए घातक संकेत है।
एक विकसित राष्ट्र वही होता है, जो विज्ञान को केवल तकनीकी उन्नति तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उसे सामाजिक सोच का हिस्सा बनाता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अर्थ है—समता, मानव गरिमा और तथ्यपरक निर्णय। यही दृष्टि सामाजिक न्याय, पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास की नींव भी रखती है। जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक चुनौतियों का समाधान भी विज्ञान और वैज्ञानिक सहयोग के बिना संभव नहीं है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि विज्ञान को डर या भ्रम का विषय नहीं, बल्कि जन-सरोकार से जोड़ा जाए। बच्चों में रटंत ज्ञान नहीं, बल्कि जिज्ञासा और प्रयोग की प्रवृत्ति विकसित की जाए। विज्ञान तभी समाज को दिशा देगा, जब उसे आम जन की भाषा और जीवन से जोड़ा जाएगा।
अंततः, विज्ञान कोई विलासिता नहीं, बल्कि भविष्य की अनिवार्यता है। बिना विज्ञान के न सुरक्षित समाज की कल्पना की जा सकती है, न स्वस्थ नागरिकों की और न ही आत्मनिर्भर राष्ट्र की। विज्ञान वह मशाल है, जिसे थामकर ही मानवता अज्ञान के अंधकार से निकलकर प्रगति, समृद्धि और न्याय के उजाले तक पहुँच सकती है।
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