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Showing posts from August, 2025

सरकारी नौकरी : विवाह मंडप का नया देवता

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संपादकीय 31 अगस्त 2025 “सरकारी नौकरी : विवाह मंडप का नया देवता” आजकल शादी-ब्याह का पहला सवाल होता है—“बेटा सरकारी सर्विस में है या नहीं?” बाकी योग्यता, संस्कार, मेहनत, हुनर—सबकी औकात धरी रह जाती है। मानो विवाह का मंडप अब सरकारी नौकरी का दरबार बन चुका है और वर-वधू तो बस मूर्तियाँ हैं, जिन्हें बोली लगाने वाले समाज के ठेकेदार नीलाम करते फिरते हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। लड़का पढ़ाई में तेज है, लेकिन घर की जिम्मेदारियों के कारण प्रतियोगी परीक्षाओं में टिक नहीं पा रहा, पार्ट-टाइम नौकरी करता है, मेहनत से घर चला रहा है—यह अब विवाह बाजार की योग्यता नहीं रही। वहीं लड़की घर बैठे स्कॉलरशिप से डिग्री पर डिग्री बटोर ले तो परिवार का मानो सीना चौड़ा हो जाता है। चाहे कॉलेज का गेट देखा हो या नहीं, डिग्री चमक रही है तो सपनों के दूल्हे कम से कम प्रोफेसर से नीचे नहीं सोचे जाते। समाज की यह विडंबना है कि प्राइवेट जॉब, छोटा-मोटा धंधा, उद्यमिता या हस्तकला से जीवन चला रहे युवक रिश्तों के बाजार में ‘अयोग्य’ ठहराए जाते हैं। उधर, जो लड़का सरकारी नौकरी में घुस गया, उसके लिए दलालों क...

एसआई भर्ती रद्द — सिस्टम, साक्ष्य और राजनीतिक तमाशा

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संपादकीय  30 अगस्त 2025 *एसआई भर्ती रद्द — सिस्टम, साक्ष्य और राजनीतिक तमाशा*  राजस्थान हाईकोर्ट ने 2021 की विवादित सब-इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा को रद्द कर दिया — और उस फैसले ने राज्य की सियासत, आयोग और भर्ती मशीनरी को ऐसे उजागर कर दिया मानो पर्दे के पीछे से चल रही कई सालों पुरानी ड्रामा-सीरीज़ अचानक लाइव आ गई हो। अदालत ने रद्द करने की बाज़ीगरी इसलिए खेली क्योंकि पेपर लीक और अनियमितताओं का जाल इतना गहरा था कि “धर्मसंकट” के बिना भर्ती की वैधता बताना असंभव था। जहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। पेपर-लीक की जंजीर किसने जोड़कर रखी थी, यह खोजने की गुंजाइश SOG की लंबी छानबीन में खुली — दर्जनों गिरफ्तारियाँ, घनघोर नेटवर्क और पूछताछ-कहानियाँ मिलीं जिनमें ‘इमाम’ की तरह काम करने वाले एजेंट, स्कूलों के माध्यम से पेपर्स की रूटिंग और पूछताछ में ज्वलंत सबूत सामने आए। यानी जो लोग सरकारी नौकरियों को ‘गिफ्ट-कॉर्ड’ समझ बैठे थे, वे अब अपनी-अपनी ईमेल नहीं मिटा पाएँगे।  और जब बात संस्थागत जवाबदेही की आती है, तो RPSC की करामाती छवि भी उजागर हो उठी — कुछ वरिष्ठ सदस्य और भर्ती...

पंचायत राज चुनाव – लोकतंत्र का पर्व या सरकार का टालमटोल खेल?

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संपादकीय 27 अगस्त 2025  *पंचायत राज चुनाव – लोकतंत्र का पर्व या सरकार का टालमटोल खेल?*  राजस्थान में पंचायत राज चुनाव हमेशा लोकतंत्र की नब्ज़ माने जाते हैं। लेकिन इस बार पंचायतों का हाल ऐसा है जैसे लोकतंत्र का हृदय धड़क रहा हो और सरकार उसे ‘ऑक्सीजन सिलेंडर’ पर जीने को मजबूर कर रही हो। पंचायत राज अधिनियम 1994 के तहत तय समय पर चुनाव होना लोकतंत्र की आत्मा है, परंतु चुनाव आयोग और सरकार के बीच “कानूनी गुथियों” और “राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी” ने इस आत्मा को कागज़ी बना दिया है। या मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है  दरअसल, कई ग्राम पंचायतों का कार्यकाल पूरा हो चुका है, और वहाँ प्रशासक बैठा दिए गए हैं। यानी गांव की सरकार अब ‘मुखिया’ नहीं चला रहा, बल्कि सरकारी कुर्सी पर बैठा एक प्रशासक चला रहा है। ग्राम स्वराज का सपना इस प्रशासनिक ठेकेदारी में कैसा पूरा होगा? क्या गांव की जनता ने इसलिए वोट दिया था कि समय आने पर उनकी चुनी हुई सरकार ‘सस्पेंड’ कर दी जाए और प्रशासक ही लोकशाही का ठेका ले ले? हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने साफ कहा था कि छह महीने में चुनाव कराए जाएं। पर सरकार क...

"एक ही टावर पर टंगी नेटवर्क कंपनियां – झूठे दावे और लटके हुए सपने"

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संपादकीय  26 अगस्त 2025   *"एक ही टावर पर टंगी नेटवर्क कंपनियां – झूठे दावे और लटके हुए सपने"* गांव का दृश्य बड़ा दिलचस्प है। एक टावर खड़ा है – पतला, दुबला-पतला, जैसे किसी किसान का अधपका बाजरे का पौधा, और उस पर टंगे हुए हैं नेटवर्क कंपनियों के झंडे। जियो, एयरटेल, वीआई, बीएसएनएल… सब भाईचारे की मिसाल पेश करते हुए एक ही टावर पर लटक गए हैं। फर्क बस इतना है कि जनता के सिग्नल टंगे रह जाते हैं, और कंपनियों के मुनाफे उड़ान भर जाते हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। मोबाइल कंपनियां अपने विज्ञापनों में शेर की तरह दहाड़ती हैं—"सबसे तेज़ नेटवर्क", "सबसे दमदार कवरेज"—लेकिन गांव में हालात ऐसे हैं कि कॉल करने के लिए आदमी को कभी छत पर चढ़ना पड़ता है, तो कभी नीम के पेड़ पर। और अगर बारिश हो जाए तो नेटवर्क सिग्नल इतना कमजोर पड़ जाता है जैसे भैंस के दूध से मक्खन निकालने के बाद बची हुई लस्सी। गांव वाले बेचारे कन्फ्यूज़न में जी रहे हैं। सोचते हैं – "कौन सी सिम लें?" जवाब बड़ा मजेदार है – "किसी भी कंपनी की ले लो, सबका हाल एक जैसा है।"...

सत्ता बनाम चुनाव आयोग : लोकतंत्र की चौसर पर गोटियां बिखरीं

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संपादकीय 23 अगस्त 2025  *सत्ता बनाम चुनाव आयोग : लोकतंत्र की चौसर पर गोटियां बिखरीं*  राजस्थान की राजनीति इन दिनों एक दिलचस्प खेल का मैदान बनी हुई है—खिलाड़ी वही, नियम वही, लेकिन अंपायर बेबस! सत्तारूढ़ सरकार ने "वन स्टेट, वन इलेक्शन" का राग छेड़कर मानो लोकतंत्र की धुन ही बिगाड़ दी हो। बहुत सी पंचायत राज संस्थाओं का कार्यकाल जनवरी में ही समाप्त हो चुका था, शेष का अभी होने  जा रहा है। नगर निकायों का भी हाल बुरा है, लेकिन चुनाव करवाने के बजाय सत्ता पक्ष प्रशासक तंत्र के सहारे शासन का मज़ा ले रहा है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। जनता पूछ रही है—“गांव की नई सरकार कब बनेगी?” और सरकार जवाब दे रही है—“अभी परिसीमन की दरकार है।” मज़े की बात यह है कि परिसीमन को जनता सुधार मानने से ज्यादा सत्ता का ‘वोटबैंक इंजीनियरिंग’ समझ रही है। जगह-जगह विरोध हो रहा है, लेकिन सरकार को अपने हठधर्मिता के चश्मे से आगे कुछ दिख नहीं रहा। हाईकोर्ट ने फटकार लगाई तो चुनाव आयोग ने भी दो टूक कहा कि संवैधानिक संशोधन बिना वन स्टेट, वन इलेक्शन महज़ जुमला है। लेकिन आयोग की ये दो टूक बात...

*उपराष्ट्रपति का मध्यवर्ती निर्वाचन – संविधान, राजनीति और राष्ट्रीय दायित्व

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संपादकीय 22 अगस्त 2025  *उपराष्ट्रपति का मध्यवर्ती निर्वाचन – संविधान, राजनीति और राष्ट्रीय दायित्व*  भारत का लोकतंत्र विश्व का सबसे बड़ा और सबसे जटिल लोकतांत्रिक ढांचा है। यहाँ प्रत्येक संवैधानिक पद की चुनावी प्रक्रिया संविधान में स्पष्ट रूप से निर्धारित की गई है। इसी क्रम में, उपराष्ट्रपति पद की विशेष अहमियत है, क्योंकि यह पद न केवल राज्यसभा के सभापति  का दायित्व निभाता है, बल्कि राष्ट्रपति की अनुपस्थिति अथवा असमर्थता की स्थिति में उनकी जिम्मेदारियों को भी निभाने की संवैधानिक भूमिका रखता है। हाल ही में उपराष्ट्रपति के इस्तीफे के बाद मध्यवर्ती निर्वाचन की चर्चा फिर से तेज हो गई है, जो हमें इस विषय पर संवैधानिक दृष्टि से गंभीर विमर्श करने का अवसर प्रदान करती है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।  *संवैधानिक प्रावधान और अनुच्छेद*  1. अनुच्छेद 63 – भारत में एक उपराष्ट्रपति होगा। 2. अनुच्छेद 66 – उपराष्ट्रपति का निर्वाचन संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित और मनोनीत सदस्यों द्वारा किया जाएगा। 3. अनुच्छेद 67 – उपराष्ट्रपति का कार्यकाल पाँच वर्ष का ...

उपराष्ट्रपति चुनाव : सत्ता की चौसर और राजनीति का नया रोमांच

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संपादकीय- 19 अगस्त 2025 *उपराष्ट्रपति चुनाव : सत्ता की चौसर और राजनीति का नया रोमांच*  भारतीय लोकतंत्र में उपराष्ट्रपति चुनाव सामान्यतः एक सहज प्रक्रिया मानी जाती रही है। लेकिन इस बार का परिदृश्य कुछ अलग रंग लेकर सामने आया है। पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के अप्रत्याशित इस्तीफे के बाद अचानक उपजे राजनीतिक शून्य ने सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को नए समीकरण गढ़ने को विवश कर दिया है। वर्तमान राजनीतिक चर्चा पर विश्लेषण करते हुए यदि मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन ने दक्षिण भारत से आने वाले, ओबीसी समुदाय के कद्दावर नेता सी.पी. राधाकृष्णन को उम्मीदवार बनाकर कई निशाने साधने का प्रयास किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसदीय दल की बैठक में जिस सौम्य और दिल को छू लेने वाले अंदाज में उनका परिचय कराया, उसमें यह संदेश छिपा था कि पार्टी इस चुनाव को केवल संवैधानिक औपचारिकता न मानकर राजनीतिक रणनीति की कसौटी पर कस रही है। गृह मंत्री अमित शाह का सहयोगी दलों के बीच सक्रियता भी यही संकेत देती है कि भाजपा उपराष्ट्रपति चुनाव को अपनी भविष्य की दक्षिण ...

बढ़ता अपराध और समाज की चुप्पी एवं रिश्तों का क्षरण

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संपादकीय  18 अगस्त 2025  *“बढ़ता अपराध और समाज की चुप्पी एवं रिश्तों का क्षरण”*  आज का समाज जिस भयावह दौर से गुजर रहा है, उसमें केवल अपराध ही नहीं बढ़ रहे, बल्कि नैतिकता और संवेदनाओं का ह्रास भी हो रहा है। लोहारू क्षेत्र की लेडी टीचर के साथ हुई दरिंदगी और उसकी निर्मम हत्या ने न केवल हरियाणा बल्कि पूरे देश के दिल को झकझोर दिया है। एक ओर सिंघाना क्षेत्र में पुत्र द्वारा पिता की हत्या जैसी वीभत्स घटना सामने आती है, तो दूसरी ओर खैरथल तिजारा का मामला जहां पत्नी ने प्रेमी के साथ मिलकर पति की हत्या कर दी और शव को नीले ड्रम में छिपा दिया—अपराध से बचने के लिए सोशल मीडिया पर पति परमेश्वर के समान दर्जा देने रील बनाकर शक जाहिर नहीं होने ड्रामा दिखाना यह सब दर्शाता है कि समाज के भीतर कहीं न कहीं दरार गहरी होती जा रही है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। विडंबना यह है कि यह अपराध केवल व्यक्तिगत नहीं रह गए, बल्कि समाज की सामूहिक चेतना पर चोट करने लगे हैं। रिश्तों में विश्वास की डोर टूट रही है और निजी लालसाएं समाज को कलंकित कर रही हैं। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि अपर...

"भोजन की थाली में हमारी सभ्यता का आईना"

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संपादकीय 17 अगस्त 2025   *"भोजन की थाली में हमारी सभ्यता का आईना"*  हम कहते हैं कि भारत संस्कृति और संस्कारों की भूमि है, लेकिन जब बात भोजन के प्रति आदर और अनुशासन की आती है तो हमारी थाली हमारी पोल खोल देती है। विवाह-शादियों और दावतों में सजाई गई थालियाँ, डिक्स और तस्तरियों पर रखे नाना प्रकार के व्यंजन जितने आकर्षक लगते हैं, उतना ही कचरे के ढेर पर जाकर अपमानित होते हैं। क्या यही हमारी "सभ्यता" और "मानवता" है कि हम दो निवाले खाने की क्षमता रखते हुए पचास चीजें थाली में भरकर आधा फेंक दें? यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। “अरे भाई, आजकल शादी-ब्याह में थाली नहीं, मानो युद्ध का मैदान सजता है। सामने पंक्तिबद्ध सलाद की फौज, मिठाइयों की बटालियन, चाट-पकवानों की तोपें और सब्ज़ियों का टैंक—सब तैनात रहते हैं।  लेकिन ज्योंही ‘महामहिम’ मेहमान पंडाल में प्रवेश करते हैं, युद्ध का नारा गूंजता है – ‘जो दिखे, प्लेट में भर लो, दोबारा लाइन कौन लगाएगा!’ और फिर थाली से ज्यादा बर्बाद भोजन नाली में परेड करता हुआ मिलता है।” कितना विचित्र है, हम खुद को “सभ्य समा...

डब्बाबंद साड़ी आंदोलन – दिखावे के धागों में उलझा समाज

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संपादकीय  16 अगस्त 2025 *"डब्बाबंद साड़ी आंदोलन – दिखावे के धागों में उलझा समाज"*  कभी सोचा है हम किस कदर कपड़े के धागों में उलझ चुके हैं? हमारी सामाजिक रस्में, रिश्तों की मिठास और मान-सम्मान का पैमाना अब इंसानी भावनाओं से ज्यादा डब्बाबंद साड़ियों और पैकिंग सूट के वजन से तौला जाने लगा है। यह सिर्फ कपड़े का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि समाज की एक गहरी विकृति का रंगीन आवरण है — जो बाहर से चमकदार, अंदर से सड़ा हुआ है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। हमारे समाज में एक विचित्र परंपरा ने जन्म लिया है—कपड़ों के नाम पर दिखावा, लेन-देन और अपव्यय का ऐसा जाल जिसमें रिश्ते, मान-सम्मान और भावनाएं भी उलझकर रह गई हैं। यह परंपरा किसी एक वर्ग की नहीं, बल्कि पूरे समाज की आदत बन चुकी है, जिसे लोग मान-सम्मान का प्रतीक मानते हैं, पर वास्तव में यह सामाजिक विकृति है। आज भी शादियों से लेकर संस्कारों तक, बहनों-बेटियों के आने-जाने पर मान-सम्मान के नाम पर कपड़ों का आदान-प्रदान ऐसे होता है, मानो बिना यह रस्म निभाए रिश्ते अधूरे रह जाएंगे। संदूक, अलमारियां और सूटकेस में  इन डब्बाबंद ...

आज़ादी के साए में, लोकतंत्र का आईना

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संपादकीय  14 अगस्त 2025   *"आज़ादी के साए में, लोकतंत्र का आईना* " "आज़ादी हमने पाई थी, पर लगता है इसकी ईएमआई अभी भी भरनी बाकी है…!" 15 अगस्त का दिन हमें उस आज़ादी की तपिश का एहसास दिलाता है, जिसे पाने के लिए हमारे पूर्वजों ने अपने खून और सपनों को दांव पर लगाया था। स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों में जेलें भर दी गईं, फांसी के फंदे झूल गए, और आंदोलनकारियों ने यह उम्मीद की थी कि आज़ाद भारत में जनता की आवाज़ ही असली कानून होगी। पर अफ़सोस, आज वही आवाज़ चुनावी भाषणों में ताली बजाने तक सिमट गई है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। आजादी के 78 साल बाद भी, राजनीति का रंग उतना ही गाढ़ा है जितना कभी अंग्रेज़ी हुकूमत का था—बस अब रंग बदलते नेता के कपड़े और पार्टी के झंडे हैं। पहले विदेशी ‘हुक्म’ चलता था, अब ‘लोकतांत्रिक हुक्म’ चलता है। फर्क सिर्फ इतना है कि तब आदेश अंग्रेज़ी में आते थे, और अब वही आदेश देसी भाषा में लिखकर "जनहित" का ठप्पा लगाकर जारी होते हैं। 15 अगस्त का दिन हमें यह सवाल पूछने पर मजबूर करता है—क्या यह वही आज़ादी है, जिसके लिए भगत सिंह न...

पुस्तकालय – ज्ञान की ज्योति और समाज परिवर्तन का केंद्र”

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संपादकीय- 12 अगस्त 2025  *“पुस्तकालय – ज्ञान की ज्योति और समाज परिवर्तन का केंद्र”* (विश्व पुस्तकालय दिवस विशेष) "कभी ये पुस्तकालय गांव व शहरों का दिल हुआ करता था… जहां पन्नों की सरसराहट में सपने जन्म लेते थे। लेकिन आज वही किताबें, धूल और जाले ओढ़े, मानो अपने पाठकों का इंतज़ार कर रही हों।" राष्ट्रीय पुस्तकालय दिवस, सिर्फ एक तारीख नहीं बल्कि ज्ञान के उस अनंत सागर का स्मरण है, जिसमें डूबकर पीढ़ियां अपने भविष्य की दिशा तय करती रही हैं। लेकिन आज की सच्चाई यह है कि हमारे कई सरकारी और ग्रामीण पुस्तकालय अपनी जीवंतता खो चुके हैं। अलमारियों में बंद किताबें पीली पड़ रही हैं, पन्नों की महक में अब बासीपन घुल गया है और वहां बैठने वाले पाठकों की जगह अब सन्नाटा है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। 21वीं सदी में जहां ई-बुक, ऑडियो बुक और डिजिटल प्लेटफॉर्म का बोलबाला है, वहीं पारंपरिक पुस्तकालय अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह विडंबना है कि शिक्षा और करियर की दौड़ में युवा पीढ़ी को "ज्ञान के मंदिर" की चौखट तक आने का समय नहीं मिल रहा। यदि हम चाहते हैं क...

जाट और जांटी – जड़ों पर वार, भविष्य पर प्रहार

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संपादकीय-@ *दैनिक भीम प्रज्ञा*  #एडवोकेट हरेश पंवार # 10 अगस्त 2025  *जाट और जांटी – जड़ों पर वार, भविष्य पर प्रहार*  खेतों से खेजड़ी(जांटी) और राजनीति से जाट — दोनों पर पूरे देश में चल रहा है योजनाबद्ध ‘उजाड़ो अभियान’, जो पर्यावरण और सामाजिक ताकत दोनों को खत्म कर रहा है। राजस्थान की धरती पर जांटी (खेजड़ी) और जाट — दो नाम सदियों से अस्तित्व, संघर्ष और सहनशीलता के प्रतीक रहे हैं। फर्क बस इतना है कि जांटी की जड़ें मिट्टी में हैं और जाट की जड़ें समाज के दिल में। आज दोनों को निशाना बनाने के लिए अलग-अलग औज़ार चलाए जा रहे हैं — एक पर कुल्हाड़ी, दूसरे पर कूटनीति। और यह खेल सिर्फ राजस्थान का नहीं, बल्कि हर उस राज्य का है, जहाँ जाट अपनी संख्या, मेहनत और साहस से पहचान रखते हैं। हालांकि किसी समाज के व्यक्तिगत मुद्दे को लेकर नहीं बोलना चाहिए इन दिनों राजनीतिक सुगबुगाहट को सुनकर कई दिन चुप रहा परंतु मन आहत हुआ तो रुका नहीं पाया । इसलिए एक जोखिम भरे ऐसे गंभीर मुद्दे पर यदि मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। पहले बात जांटी की करते हैं। यह पेड़ मरुस्थल का “ऑक्सीजन बैंक” है...

शिक्षा विभाग का रात्रि चौपाल – होली के बाद बड़कुले थापने जैसा ढकोसला

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संपादकीय 8 अगस्त 2025  *रात्रि चौपाल – होली के बाद बड़कुले थापने जैसा ढकोसला*  राजस्थान के शिक्षा विभाग की "रात्रि चौपाल" पहल सुनने में भले नई और रचनात्मक लगे, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि यह महज़ दिखावा बनकर रह गई है। फोटो सेशन और औपचारिक भाषणों में बच्चों की असली शिक्षा कहीं गुम हो गई है। यह वही स्थिति है जैसे होली के बाद बड़कुले थापना — समय निकल चुका है, पर रस्म अदायगी जारी है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। सच यह है कि शिक्षकों की बड़ी जमात की नियत में ही खोट है।  शिक्षक भर्ती परीक्षा क्वालिफाई करने के बाद उनमें से अधिकांश अपने आपको शिथिल कर लेते हैं। न वे नई शिक्षा पद्धतियों से अपडेट होना चाहते हैं, न ही खुद को सुधारने की इच्छा रखते हैं। अपने आपको श्रेष्ठ साबित करने के लिए प्राइवेट स्कूलों से प्रतिस्पर्धा का दिखावा करते हैं, लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के सामूहिक प्रयास से कोसों दूर हैं।  इनका बहाना भी तैयार है — "हमारे पास तो गरीब तबके के बच्चे आते हैं, अभावग्रस्त वर्ग के बच्चे हैं, ये कमजोर हैं"। यह सोच न केवल गलत है, बल्कि शिक्षा ...

"सब कुछ दो... पर शिक्षा मत दो!" — शिक्षा पर राजनीति का ताला

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संपादकीय 8 अगस्त 2025  *सब कुछ दो... पर शिक्षा मत दो!" — शिक्षा पर राजनीति का ताला*  कभी गांव के चौपाल पर नेताजी के स्वागत में फूलों की वर्षा होती थी, अब घोषणाओं की वर्षा होती है। मंदिर बनते हैं, मस्जिद बनते हैं, गुरुद्वारा बनते हैं, पौधे बंटते हैं, राशन की थैलियां बांटी जाती हैं, मगर जब कोई बच्चा कह देता है – "गांव में स्कूल भी खुलवा दो नेताजी..." तो नेताजी का शीशा चढ़ जाता है और साथ ही बंद हो जाती है उस बच्चे की उम्मीद की खिड़की। क्योंकि सत्ता की भाषा में यह सीख दिया गया है – “सब कुछ दो, पर शिक्षा मत दो।” दरअसल, शिक्षा वह आईना है जिसमें सत्ताएं खुद को नंगा देखती हैं। इसलिए उन्हें यह कतई गवारा नहीं कि जनता को यह आईना थमा दिया जाए। नेताजी जानते हैं – जो भूखा है, वह सिर्फ रोटी मांगेगा, पर जो पढ़ा-लिखा है, वह रोटी के साथ जवाबदेही भी मांगेगा। रोजगार भी मांगेगा और यही वह डर है, जिसके कारण शिक्षा आज 'राष्ट्र निर्माण' की प्राथमिकता नहीं, बल्कि 'सत्ता संरक्षण' की सबसे बड़ी बाधा मानी जा रही है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। आज शिक्षा के न...

"ज्ञान से डरने वाले सत्ता के पुजारी"

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संपादकीय   *"ज्ञान से डरने वाले सत्ता के पुजारी"*  6 अगस्त 2025 अब जमाना बदल गया है। पहले लोग कहते थे — “पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब”, अब नेता कहते हैं — “पढ़ोगे-लिखोगे, तो पूछोगे सवाल... और फिर बनोगे बवाल!” इसलिए अब न स्कूल की ज़रूरत है, न शिक्षा की। मंदिर बनाओ, मस्जिद सजाओ, गुरुद्वारे में लंगर लगाओ, वाटिका लगाओ, तालाब खुदवाओ — पर स्कूल? अरे भाई, वो तो सत्ता के लिए सबसे बड़ा खतरा है! यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। एक नेता जी की परिकथा सुनिए — गांव में जब उन्होंने सौ टन चूना और दो सौ बोरियों से ज्यादा सीमेंट खर्च कर मंदिर खड़ा किया, तो गांववाले झूम उठे। किसी ने फूल चढ़ाया, किसी ने मिठाई बांटी। नेता जी मुस्काए और बोले, “मैंने अपना सपना पूरा कर दिया।” लेकिन तभी एक दुबला-पतला बच्चा झोपड़ी से निकल आया — स्कूल के कपड़े फटे थे, हाथ में पुरानी कॉपी थी। वो दौड़ता हुआ नेताजी की गाड़ी के पास आया और मासूमियत से बोला — “नेताजी, एक स्कूल भी बनवा दो...” नेताजी की हंसी ठिठक गई। उन्होंने गाड़ी का शीशा ऊपर किया, बच्चे की उंगलियाँ शीशे में दब गईं। ड्राइवर को इशारा किया...

सच बोलने वाला चला गया: सत्यपाल मलिक और सैद्धांतिक राजनीति की विदाई"

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✒️ संपादकीय  5 अगस्त 2025   *"सच बोलने वाला चला गया: सत्यपाल मलिक और सैद्धांतिक राजनीति की विदाई"*  सत्ता के गलियारों में जहाँ चाटुकारिता, चुप्पी और साजिशें आज सामान्य राजनीति का हिस्सा बन चुकी हैं, वहीं सत्यपाल मलिक जैसी शख्सियत का चले जाना सैद्धांतिक राजनीति के लिए अपूरणीय क्षति है। पूर्व राज्यपाल, पूर्व सांसद और किसान आंदोलन के प्रखर समर्थक के रूप में सत्यपाल मलिक एक ऐसे विरले राजनेता थे, जो पद की नहीं, विचार की राजनीति करते थे। उन्होंने कभी अपनी वाणी को सत्ता के हितों के अनुरूप मोड़ा नहीं, बल्कि बार-बार सच कहने का साहस दिखाया, चाहे उसकी कीमत उन्हें पद गंवाकर ही क्यों न चुकानी पड़ी हो। सत्य की राजनीति करने वाले सत्यपाल मलिक की आश्रुपूर्ति विदाई के समय मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। उनकी मृत्यु की सूचना से देशभर में एक ऐसी शोक लहर है जो केवल व्यक्ति की नहीं, विचार की, साहस की और नैतिक प्रतिबद्धता की विदाई पर व्यथित है। सत्यपाल मलिक का जीवन आज के नेताओं के लिए आइना है, जिसमें देखा जा सकता है कि कैसे सत्ता में रहते हुए भी सत्ता के खिलाफ खड़ा हुआ जा...

सत्ता का खेल: कुर्सी नहीं, 'कुर्सी-कला' की प्रतियोगिता है!

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✒️ संपादकीय  5 अगस्त 2025  *"सत्ता का खेल: कुर्सी नहीं, 'कुर्सी-कला' की प्रतियोगिता है!* देश की राजनीति अब जनसेवा नहीं, जनधोखा नहीं, बल्कि “जनतमाशा” बन चुकी है। ये लोकतंत्र का मंच नहीं रहा, बल्कि एक अखाड़ा है जहाँ नैतिकता की मिट्टी पलीद करने की होड़ मची है। आजकल जो नेता जितना ज़्यादा बोलता है, वो उतना ही कम करता है — और जो चुप रहता है, वो बस 'गठजोड़' और 'घातजोड़' करता है।नेता जनता को उसी तरह याद करते हैं जैसे छात्र परीक्षा से एक दिन पहले किताब को — मजबूरी में, डर के कारण, और जैसे ही नंबर मिल गए, किताब भी बिसरी और जनता भी! अब कोई दल स्पष्ट विचारधारा से नहीं चलता — सब “मतलबवाद” के रथ पर सवार हैं। सुबह तक जो एक-दूसरे के दुश्मन थे, वे शाम होते-होते "राजनीतिक भाई" बन जाते हैं। जैसे राजनीति का धर्म अब सिर्फ अवसरवाद हो गया हो। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। देश की चावंट राजनीति अब सोशल मीडिया से चलती है — कोई वायरल वीडियो बना दे, तो पार्टी टिकट मिल जाता है। और जो ज़मीन पर काम करता है, वो नेता नहीं, “कार्यकर्ता” बना रह जाता है — ता...

"शब्द जो जीवन बदल दे: जब सत्य बोले तो चेतना जागे"

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संपादकीय  3 अगस्त 2025  *"शब्द जो जीवन बदल दे: जब सत्य बोले तो चेतना जागे"*  आज के शोरगुल, बाजारवाद और आत्मविस्मृति के इस दौर में यदि कोई चीज है जो मनुष्य को भीतर से झकझोर सकती है, जो आत्मा को रौशनी दे सकती है, तो वह है – एक सार्थक शब्द। यह कोई उपदेशात्मक कल्पना नहीं। कभी किसी संत ने कहा था, "संसार की सबसे बड़ी क्रांति बंदूक या तलवार से नहीं, एक शब्द से होती है — वह शब्द जो आत्मा को झकझोर दे, जो तम के भीतर से उजाले को जन्म दे।" बुद्ध की धम्मदेशनाओं में वर्णित यह बात केवल किसी धर्म विशेष की नहीं, समूचे मानवीय सभ्यता की आत्मा है। आज जब समाज चारों ओर से अशांति, हिंसा, असहिष्णुता, मानसिक जहर और बौद्धिक सन्नाटे से घिर चुका है, ऐसे समय में हम यह भूल गए हैं कि एक सार्थक शब्द की शक्ति क्या होती है। आज आवश्यकता है ऐसे शब्द की, जो केवल कानों से नहीं, अंतःकरण से सुना जाए। डॉ एमएल परिहार द्वारा संपादित बाबासाहेब डॉ भीमराव अंबेडकर द्वारा लिखित अंतिम पुस्तक बुद्ध और उनका धम्म के अनुसार, "हजारों निरर्थक शब्दों से कहीं श्रेष्ठ वह एक सार्थक शब्द है जो सुनकर व्यक्ति ...

"मीडिया की गटरधारा बनाम समाज की चेतना — जिम्मेदार कौन?"

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संपादकीय  1 अगस्त 2025  *"मीडिया की गटरधारा बनाम समाज की चेतना — जिम्मेदार कौन?"*  "जब शब्द हथियार बनें और कैमरा साजिश का औजार — तब पत्रकारिता की आत्मा पर संकट खड़ा हो जाता है।" आज के दौर में पत्रकारिता एक पवित्र दायित्व से गिरकर बाज़ारी तमाशे में बदल गई है। जहां कलम कभी क्रांति की जननी थी, वहां आज वह सनसनी की गुलाम बन चुकी है। सूचना का स्रोत अब सच का आईना नहीं, बल्कि मनोरंजन का भूतिया पर्दा बन गया है — जिसमें समाज की सच्चाई नहीं, बल्कि वासनात्मक फंतासियो, झूठे रोमांच और विकृत लिटरेचर की अश्लील परछाइयां दिखाई जाती हैं। सवाल केवल यह नहीं कि मीडिया क्या दिखा रहा है, बल्कि यह भी है कि समाज क्या देखना चाहता है। अगर हम अपनी अभिरुचियों में गिरावट नहीं लाएंगे, तो पत्रकारिता में उच्चता की कोई उम्मीद करना सिर्फ़ एक ढकोसला होगा।  यह समय है — चेतना की पुकार उठाने का, सच्चे पत्रकारों को मंच देने का, और मानसिक विषाक्तता फैलाने वाले मीडिया पर खुलकर बहिष्कार करने का। अब आवश्यकता  टीआरपी की नहीं, बल्कि समाज परिवर्तन की पत्रकारिता को फिर से जीवित करने की। पत्रकारिता ...