"एक ही टावर पर टंगी नेटवर्क कंपनियां – झूठे दावे और लटके हुए सपने"
संपादकीय
26 अगस्त 2025
*"एक ही टावर पर टंगी नेटवर्क कंपनियां – झूठे दावे और लटके हुए सपने"*
गांव का दृश्य बड़ा दिलचस्प है। एक टावर खड़ा है – पतला, दुबला-पतला, जैसे किसी किसान का अधपका बाजरे का पौधा, और उस पर टंगे हुए हैं नेटवर्क कंपनियों के झंडे। जियो, एयरटेल, वीआई, बीएसएनएल… सब भाईचारे की मिसाल पेश करते हुए एक ही टावर पर लटक गए हैं। फर्क बस इतना है कि जनता के सिग्नल टंगे रह जाते हैं, और कंपनियों के मुनाफे उड़ान भर जाते हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
मोबाइल कंपनियां अपने विज्ञापनों में शेर की तरह दहाड़ती हैं—"सबसे तेज़ नेटवर्क", "सबसे दमदार कवरेज"—लेकिन गांव में हालात ऐसे हैं कि कॉल करने के लिए आदमी को कभी छत पर चढ़ना पड़ता है, तो कभी नीम के पेड़ पर। और अगर बारिश हो जाए तो नेटवर्क सिग्नल इतना कमजोर पड़ जाता है जैसे भैंस के दूध से मक्खन निकालने के बाद बची हुई लस्सी।
गांव वाले बेचारे कन्फ्यूज़न में जी रहे हैं। सोचते हैं – "कौन सी सिम लें?" जवाब बड़ा मजेदार है – "किसी भी कंपनी की ले लो, सबका हाल एक जैसा है।"
यानी चुनाव का मजा ऐसा, जैसे पंचायत चुनाव में सारे उम्मीदवार एक ही खानदान के निकल जाएं।
असली समस्या यह है कि अब कंपनियों ने जनता की मजबूरी को अपना धंधा बना लिया है। एक जमाना था जब गांव-गांव टावर खड़े होते थे, लेकिन अब सब कंपनियां मिलकर एक ही टावर पर ‘जगह घेर कर’ बैठ गई हैं। और जनता? जनता तो वही मुर्गी है जो अंडा भी देती है और काटे जाने पर चुप भी रहती है।
आज हाल यह है कि गरीब आदमी बच्चों को दूध पिलाना छोड़कर मोबाइल का रिचार्ज कराने में लगा हुआ है। बच्चे कुपोषण से कमजोर होते जा रहे हैं, लेकिन बाप के कान में व्हाट्सएप की पिंग और फेसबुक की डिंग बजनी जरूरी है। मानसिक नशे की यह लत इतनी गहरी है कि आदमी बिना नेटवर्क के रहना पसंद नहीं करता—लेकिन नेटवर्क मिल भी जाए तो कॉल बीच रास्ते में अटक जाता है, जैसे गांव की टूटी सड़क पर ट्रैक्टर और अब तो कंपनियों ने नई चालाकी निकाल ली है—हर घर में पर्सनल नेटवर्क मॉडेम। नाम सुनते ही लगता है कि कोई बड़ी क्रांति हो रही है। असलियत में यह जनता से और वसूली का नया तरीका है। पहले एक टावर से सबको चूसते थे, अब हर घर में मिनी-टावर लगाकर नया निचोड़ शुरू हो गया है।
टावर वही पुराना, बस कंपनियों के नाम अलग-अलग। जनता परेशान, लेकिन कंपनियां एक-दूसरे से टक्कर लेने का नाटक करके असल में एक ही पेड़ की डाल पर बैठे तोते हैं। ग्राहक दिन-रात पोर्ट करवाते हैं, पर हालात वही "ढाक के तीन पात"।
मोबाइल अब "शौक" नहीं, मजबूरी है। गरीब किसान भी दूध की थैली छोड़कर मोबाइल का रिचार्ज करवाने पर मजबूर है। बच्चों को पौष्टिक आहार भले न मिले, लेकिन घर में अनलिमिटेड डेटा जरूर होना चाहिए। यही है कंपनियों की असली जीत और जनता की असली हार।
कंपनियों की नई चाल-अब उन्होंने "हर घर मॉडेम" का नया व्यापार शुरू कर दिया है। यानी पहले नेटवर्क बंद करो, फिर कहो "लो, घर-घर नेटवर्क का इलाज"। वसूली की दुकानें खोलकर जनता से पैसे उगाहने का यह नया तरीका सचमुच गजब है।
यह पूरा तमाशा जनता की मजबूरी पर टिका है। सोशल मीडिया की लत ने लोगों को इतना बेबस कर दिया है कि आधा पेट रह जाएंगे पर मोबाइल बिना नेट के नहीं चलेगा। कंपनियां जानती हैं – "आदत से लाचार जनता कभी विद्रोह नहीं करेगी, बस रिचार्ज कराती रहेगी।"
असल सवाल: गांवों में जब सरकार और कंपनियां मिलकर करोड़ों का डिजिटल इंडिया का ढोल पीट रही हैं, तो फिर नेटवर्क क्यों गायब है? जब हर टावर पर सारे मॉडेम लटक रहे हैं, तो सिग्नल आखिर कहां गायब हो जाते हैं? और सबसे बड़ा सवाल – क्या मोबाइल कंपनियां जनता की सेवा कर रही हैं या जनता की जेब काट रही हैं?
आज जरूरत है कि इन कंपनियों को आईना दिखाया जाए। नेटवर्क का झूठा प्रचार बंद हो और ग्रामीण भारत को सही मायने में डिजिटल इंडिया की ताकत मिले। वरना यह कंपनियां सिर्फ "डेटा चूसो, जनता को बेवकूफ बनाओ" वाली दुकानदार साबित होंगी।
वास्तविक स्थिति यह है कि नेटवर्क कंपनियां अब ‘सेवा’ नहीं, बल्कि ‘सेवकाई’ कर रही हैं। जनता का पैसा चूसने में इन्हें महारत हासिल है। और सरकार? सरकार के कानों में भी शायद वही नेटवर्क की समस्या है—जनता की आवाज वहां तक पहुंच ही नहीं पाती।
गांव में आज ग्राम स्वराज की जगह नेटवर्क राज कायम हो गया है। फर्क इतना है कि इस राज में जनता सिर्फ रिचार्ज करवाने के लिए स्वतंत्र है, नेटवर्क मिलेगा या नहीं, यह कंपनी की मर्जी।
अब वक्त आ गया है कि चुनाव आयोग की तरह कोई नेटवर्क आयोग भी बने, जो कंपनियों से पूछे—“जनता का पैसा तो ठीक से खा रहे हो, लेकिन नेटवर्क का दूध क्यों फाड़ रहे हो?”
वरना यह टावर पर टंगी कंपनियां यूं ही जनता की जेब टांगती रहेंगी और हम सब नेटवर्क के नाम पर धोखा खाने वाली प्रजा बने रहेंगे।
एक ही टावर पर टंगी ये कंपनियां, असल में जनता की मजबूरी पर टंगी हैं। नेटवर्क नहीं, धोखे की तरंगें चल रही हैं। अब समय आ गया है कि उपभोक्ता आवाज उठाएं और सरकार इन कंपनियों की असली पोल खोलने का साहस दिखाए। वरना डिजिटल इंडिया बस विज्ञापन में ही "फुल नेटवर्क" रहेगा, गांव की गली में मोबाइल फिर नीम के पेड़ पर ही टंगा मिलेगा।
Comments
Post a Comment