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Showing posts from January, 2026

यूजीसी कानून में बदलाव : शिक्षा सुधार या भ्रम का विरोध?

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संपादकीय@हरेश पंवार 30 जनवरी 2026 *यूजीसी कानून में बदलाव : शिक्षा सुधार या भ्रम का विरोध?* देश में शिक्षा केवल डिग्री हासिल करने का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और समरसता की नींव है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए कानूनों में समय-समय पर बदलाव किए जाते रहे हैं। हाल ही में यूजीसी कानून में हुए संशोधनों को लेकर देश के कुछ हिस्सों में विरोध प्रदर्शन देखने को मिल रहे हैं। यह विरोध कई सवाल खड़े करता है—क्या यह कानून वास्तव में किसी वर्ग के खिलाफ है या फिर शिक्षा व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और न्यायपूर्ण बनाने की कोशिश? यह मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। *कानून का उद्देश्य क्या है?* यूजीसी से जुड़े कानूनों का मूल उद्देश्य विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखना, प्रशासनिक अनियमितताओं पर रोक लगाना और यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी छात्र के साथ जाति, वर्ग या सामाजिक पहचान के आधार पर भेदभाव न हो। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार देता है, अनुच्छेद ...

छात्रवृत्ति की थाली, बंदरबांट का प्रसाद और लुटता भविष्य

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संपादकीय@हरेश पंवार 28 जनवरी 2026 *छात्रवृत्ति की थाली, बंदरबांट का प्रसाद और लुटता भविष्य* छात्रवृत्ति आजकल किसी गरीब छात्र के खाते में नहीं, बल्कि सिस्टम के पेट में जाती है। यह वजीफा नहीं रहा, यह विकास का विटामिन बन चुका है—उनके लिए, जिनका विकास छात्र नहीं बल्कि छात्र के नाम पर पल रहा है। हालत यह है कि छात्रवृत्ति शब्द सुनते ही सबसे पहले कॉलेज संचालक की मुस्कान चौड़ी होती है, बिचौलिए की आंखें चमकती हैं और कुछ अधिकारियों की फाइलें अपने आप खुलने लगती हैं। छात्र? वह बेचारा तो केवल काग़ज़ों में मौजूद रहता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। आज छात्रवृत्ति एक ऐसी गाय बन चुकी है, जिसे गरीब बच्चा पालता है, लेकिन दूध रसूखदार निकाल ले जाते हैं। अनुसूचित जाति–जनजाति के नाम पर आने वाला यह पैसा समाज को ऊपर उठाने के लिए था, मगर वह नीचे बैठे गिरोहों की तिजोरी भरने का ज़रिया बन गया है। यह कोई छोटी-मोटी गड़बड़ी नहीं, बल्कि संगठित काला कारोबार है, जो खुलेआम शिक्षा व्यवस्था की नाक के नीचे फल-फूल रहा है। परदा ज़रा उठाइए। गरीब परिवार का बच्चा—पहली पीढ़ी का विद्यार्थी—जब कॉलेज का स...

77वाँ गणतंत्र दिवस : संविधान की अटल आस्था और लोकतंत्र की मजबूत आधारशिला

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संपादकीय@हरेश पंवार 26 जनवरी 2026 *77वाँ गणतंत्र दिवस : संविधान की अटल आस्था और लोकतंत्र की मजबूत आधारशिला* भारत आज 77वाँ गणतंत्र दिवस बड़े उत्साह, गौरव और आत्मविश्वास के साथ मना रहा है। यह अवसर केवल झंडा फहराने, परेड देखने या औपचारिक शुभकामनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि आत्ममंथन का भी है—कि आज़ादी के बाद हमने क्या खाया, क्या पाया और क्या खोया। इन सवालों के बीच एक सत्य निर्विवाद रूप से सामने आता है कि यदि भारत आज भी एक सशक्त, संप्रभु और लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में विश्व पटल पर खड़ा है, तो उसका सबसे बड़ा आधार भारत का संविधान है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। स्वतंत्रता के बाद जब देश ने गणतंत्र का मार्ग चुना, तब परिस्थितियां आसान नहीं थीं। गरीबी, अशिक्षा, सामाजिक असमानता, जाति-धर्म के विभाजन और बाहरी-भीतरी षड्यंत्र—सब एक साथ चुनौती बनकर खड़े थे। ऐसे विषम हालात में भारत के संविधान ने लोकतंत्र की मजबूत नींव रखी। स्वतंत्रता, समानता, बंधुता और सामाजिक न्याय—ये केवल शब्द नहीं, बल्कि उस संवैधानिक दर्शन के स्तंभ हैं, जिसने विविधताओं से भरे भारत को एकता के सूत्र में बाँ...

राष्ट्रीय उत्सवों का फीका पड़ता रंग : औपचारिकताओं की भेंट चढ़ती सांस्कृतिक चेतना

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संपादकीय@हरेश पंवार,25जनवरी 2026 *राष्ट्रीय उत्सवों का फीका पड़ता रंग : औपचारिकताओं की भेंट चढ़ती सांस्कृतिक* चेतना कभी राष्ट्रीय उत्सव केवल तिथि नहीं होते थे, वे पूरे समाज की चेतना के उत्सव हुआ करते थे। स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस या अन्य राष्ट्रीय पर्व आने से पहले ही स्कूलों, मोहल्लों और गांवों में हलचल शुरू हो जाती थी। स्कूलों के मैदानों में पीटी परेड की गूंज, बच्चों के कदमों की ताल, ढोल-नगाड़ों की थाप और देशभक्ति गीतों की मधुर धुन वातावरण को राष्ट्रप्रेम से भर देती थी। बच्चे परेड, जिमनास्टिक, नाटक, गीत, वादन और भाषण के लिए पूरे मन से तैयारी करते थे। किसी की आवाज में दम होता, तो उसे मंच मिलता; कोई चूक जाता, तो वह अगली बार और बेहतर करने का संकल्प लेकर लौटता था। यही प्रक्रिया बच्चों के आत्मविश्वास, अनुशासन और संस्कारों की नींव रखती थी। जहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। आज वही राष्ट्रीय उत्सव औपचारिकताओं तक सिमटते जा रहे हैं। तैयारी की जगह दिखावा, अभ्यास की जगह जल्दबाजी और संस्कार की जगह स्क्रीन ने ले ली है। सांस्कृतिक कार्यक्रमों के नाम पर अब रंग-बिरंगे कपड़े पह...

छठी की रात और संस्कारों की लिखावट

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संपादकीय@Haresh Panwar 24 jan.2026 छठी की रात और संस्कारों की लिखावट भारतीय समाज में संतान का जन्म केवल परिवार का निजी उत्सव नहीं रहा, बल्कि सामूहिक सांस्कृतिक उत्तरदायित्व का विषय रहा है। विशेषकर नवजात शिशु के जन्म के छठे दिन मनाई जाने वाली छठी परंपरा लोक-आस्था, प्रतीक और संस्कारों का अद्भुत समन्वय रही है। यह परंपरा इस विश्वास पर आधारित रही कि उसी रात कोई अदृश्य दैवीय शक्ति—जिसे कहीं बेमाता, कहीं विधाता या संस्कार-लेखनी देवी कहा गया—शिशु के जीवन का लेखा-जोखा लिखने आती है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। इसी विश्वास के कारण छठी को साधारण उत्सव नहीं, बल्कि अत्यंत पवित्र और संयमित रात्रि माना गया। कच्चे घरों के दरवाजों और पक्के मकानों की रंग-रोगन वाली दीवारों पर गोबर के लेप से परंपरागत आकृतियाँ उकेरी जाती थीं। उन आकृतियों के ऊपर रंग-बिरंगे कपड़ों की कतरनें सजाई जातीं, बीच-बीच में शीशे के छोटे-छोटे टुकड़े चिपकाए जाते, समुद्र या नदियों से निकली कौड़ियाँ (कोढ़ी) लगाई जातीं और बुहारी (बबुह) की सींकें प्रतीक रूप में टांगी जाती थीं। यह सब केवल सजावट नहीं था, बल्कि बुरी श...

कथनी–करनी का फासला और विवाह समारोहों में बढ़ता नशे का चलन

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संपादकीय@Haresh Panwar 23Jan.2026 कथनी–करनी का फासला और विवाह समारोहों में बढ़ता नशे का चलन भारतीय समाज की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि वह परंपराओं, मूल्यों और सामाजिक मर्यादाओं को पीढ़ी दर पीढ़ी सहेजता आया है। विवाह जैसे संस्कार को तो हमारे यहां केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों और दो संस्कृतियों का पवित्र मिलन माना गया है। लेकिन विडंबना यह है कि समय के साथ इस पवित्र संस्कार के स्वरूप में ऐसे तत्व घुसते चले गए हैं, जो न केवल इसके मूल भाव को विकृत कर रहे हैं, बल्कि समाज की कथनी और करनी के बीच गहराते अंतर को भी उजागर कर रहे हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगी कि बोलता है। आज लगभग हर व्यक्ति अपने निजी जीवन में मांस-मदिरा का सेवन करता है या उसे सामान्य मानता है। किंतु जब बात अपनी बेटी के विवाह की आती है, तो वही व्यक्ति यह अपेक्षा करता है कि होने वाला दामाद “खाता-पीता” न हो, अर्थात शराब, नशा और मादक पदार्थों से दूर रहने वाला हो। रिश्ते तय करते समय लड़के की आदतों की बाकायदा जांच-पड़ताल की जाती है—कहीं वह शराबी तो नहीं, कबाबी तो नहीं, किसी गलत संगत में तो नहीं। यह सा...

चमत्कार से आविष्कार तक : भारत के विकास की असली परीक्षा

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संपादकीय@हरेश पंवार-21 जनवरी 2026 *चमत्कार से आविष्कार तक : भारत के विकास की असली परीक्षा* भारत की पहचान सदियों से ज्ञान, दर्शन, विज्ञान और आध्यात्मिक चेतना के केंद्र के रूप में रही है। नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालयों ने दुनिया को तर्क, गणित, खगोलशास्त्र और चिकित्सा की दिशा दिखाई। आर्यभट्ट, चरक, सुश्रुत जैसे महान मनीषियों ने उस दौर में विज्ञान को आधार बनाकर मानव जीवन को बेहतर बनाने का प्रयास किया, जब दुनिया का बड़ा हिस्सा अंधकार में था। यह भारत की बौद्धिक विरासत की शक्ति थी। लेकिन विडंबना यह है कि आज, वैज्ञानिक उपलब्धियों के शिखर पर खड़े होने के बावजूद, हमारा समाज फिर से चमत्कारों और अंधविश्वासों की ओर आकर्षित होता दिखाई दे रहा है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। एक ओर भारत का इसरो चंद्रयान जैसे मिशनों के माध्यम से अंतरिक्ष में इतिहास रच रहा है, वहीं दूसरी ओर देश के गांवों, कस्बों और यहां तक कि शहरों में भी चमत्कारिक बाबाओं, तांत्रिकों और कथित दिव्य शक्तियों के नाम पर भीड़ उमड़ रही है। विज्ञान प्रयोगशालाओं में तर्क, परीक्षण और परिश्रम से आगे बढ़ता है, जबक...

कथनी–करनी का फासला और विवाह समारोहों में बढ़ता नशे का चलन

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संपादकीय@हरेश पंवार -22 जनवरी2026  *कथनी–करनी का फासला और विवाह समारोहों में बढ़ता नशे का चलन*  भारतीय समाज की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि वह परंपराओं, मूल्यों और सामाजिक मर्यादाओं को पीढ़ी दर पीढ़ी सहेजता आया है। विवाह जैसे संस्कार को तो हमारे यहां केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों और दो संस्कृतियों का पवित्र मिलन माना गया है। लेकिन विडंबना यह है कि समय के साथ इस पवित्र संस्कार के स्वरूप में ऐसे तत्व घुसते चले गए हैं, जो न केवल इसके मूल भाव को विकृत कर रहे हैं, बल्कि समाज की कथनी और करनी के बीच गहराते अंतर को भी उजागर कर रहे हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगी कि बोलता है। आज लगभग हर व्यक्ति अपने निजी जीवन में मांस-मदिरा का सेवन करता है या उसे सामान्य मानता है। किंतु जब बात अपनी बेटी के विवाह की आती है, तो वही व्यक्ति यह अपेक्षा करता है कि होने वाला दामाद “खाता-पीता” न हो, अर्थात शराब, नशा और मादक पदार्थों से दूर रहने वाला हो। रिश्ते तय करते समय लड़के की आदतों की बाकायदा जांच-पड़ताल की जाती है—कहीं वह शराबी तो नहीं, कबाबी तो नहीं, किसी गलत संगत में त...

गौ सेवा या गौ के नाम पर कारोबार? — आस्था, अनुदान और आवारा सच

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संपादकीय@हरेश पंवार 19/01/2026  *गौ सेवा या गौ के नाम पर कारोबार? — आस्था, अनुदान और आवारा सच*  गाय भारतीय संस्कृति, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और आस्था का केंद्र रही है। उसे माता कहकर पूजने की परंपरा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी का भी प्रतीक रही है। लेकिन आज यह प्रश्न पूरे समाज के सामने खड़ा है कि क्या वास्तव में हम गौ सेवा कर रहे हैं, या गौ के नाम पर एक संगठित गोरखधंधा फल-फूल रहा है? सड़कों पर कचरा खाती, पॉलिथीन निगलती, दुर्घटनाओं का शिकार होती गायें और दूसरी ओर गौशालाओं में हवन-यज्ञ, गौ कथा, सरकारी अनुदान और चंदे का उत्सव — यह विरोधाभास हमारी संवेदनाओं पर सीधा प्रहार करता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। वर्तमान समय में “गौ रक्षक”, “गौ सेवा समिति”, “गौ उपचार केंद्र” जैसे नामों से अनेक संगठन खड़े हो गए हैं। गांव-गांव में वास्तविक गौशालाओं की जगह अब प्रतीकात्मक “गौ उपचार केंद्र” खुलने का चलन बढ़ा है। दो-चार जख्मी या वृद्ध गायों को सामने बांधकर सहानुभूति जुटाई जाती है, फोटो खिंचते हैं, वीडियो बनते हैं और फिर चंदे व सरकारी अनुदान का र...

बुरे वक्त की कसौटी पर रिश्तों की पहचान

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संपादकीय@हरेश पंवार 20 जनवरी2026  *बुरे वक्त की कसौटी पर रिश्तों की पहचान*  जीवन के सफ़र में सुख-दुःख का आना-जाना स्वाभाविक है। जब समय अनुकूल होता है, सफलता कदम चूम रही होती है, तब हमारे चारों ओर लोगों की भीड़ जमा हो जाती है। हर कोई मित्र, शुभचिंतक और हितैषी बनने की होड़ में दिखाई देता है। मुस्कान, तारीफ और अपनत्व के शब्द इतने सहज बहने लगते हैं कि व्यक्ति को लगने लगता है—शायद यही जीवन का स्थायी सच है। लेकिन यह भ्रम अधिक समय तक टिकता नहीं। जैसे ही जीवन में कोई आर्थिक, मानसिक या शारीरिक संकट आता है, वैसे ही वही भीड़ छंटने लगती है। तब पता चलता है कि अच्छे वक्त की चमक में रिश्तों की असलियत छिपी हुई थी। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। प्रायः देखा गया है कि ज़रूरत के समय लोगों के पास बहानों की कोई कमी नहीं होती। “अभी मेरी हालत ठीक नहीं है”, “मैं खुद परेशान हूं”, “थोड़ा समय दो” जैसे वाक्य रिश्तों के असली चेहरे को उजागर कर देते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि इस समय व्यक्ति को मदद न मिलने का उतना दुख नहीं होता, जितना उन लोगों की बेरुखी से होता है जिन्हें वह अपना सम...

स्वास्थ्य के सौदागर : मिलावट का ज़हर और मौन व्यवस्था

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संपादकीय@Haresh panwar 18.01.2026   *स्वास्थ्य के सौदागर : मिलावट का ज़हर और मौन व्यवस्था*  आज का भारत प्रगति, तकनीक और बाजार की चकाचौंध में आगे बढ़ता दिखाई देता है, लेकिन इसी चमक-दमक के पीछे एक भयावह सच्चाई छिपी है—मिलावट का वह ज़हर, जो चुपचाप देश की युवा संपदा को निगल रहा है। मुनाफे की अंधी दौड़ में कुछ लोग केवल उत्पाद नहीं बेच रहे, बल्कि आमजन का स्वास्थ्य, विश्वास और भविष्य दांव पर लगा रहे हैं। यह केवल आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक पतन का स्पष्ट प्रमाण है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। आज बाजार में शुद्धता केवल पैकेट पर लिखे शब्दों तक सिमट कर रह गई है। दूध, घी, मावा, पनीर, दही और मिठाइयाँ—जो कभी पोषण और सात्विकता का प्रतीक थीं—आज मिलावटखोरी के सबसे बड़े शिकार हैं। दूध में पानी मिलाना तो पुरानी बात हो गई, अब केमिकल से “दूध जैसा” पदार्थ तैयार कर अवैध फैक्ट्रियों में खुलेआम बेचा जा रहा है। यह केवल धोखा नहीं, बल्कि धीमा ज़हर है, जिसका असर वर्षों बाद बीमारियों के रूप में सामने आता है। विडंबना यह है कि जिन इलाकों में पशुधन नाममात्र का है,...

प्रतिभा सम्मान के बहाने तबादला सांठगांठ ?

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संपादकीय 10 अक्टूबर 2025 "प्रतिभा सम्मान के  बहाने तबादला सांठगांठ ?" समाज की असली ताकत उसके कंधों पर पसीना बहाने वाले मजदूरों, खेतों में अनाज उपजाने वाले किसानों और दस्तकारों से मापी जाती है – लेकिन अफसोस! हमारे समाज के ठेकेदारों ने इसे सरकारी नौकरी वालों की चमचमाती पोस्टिंग और मंच पर पढ़े जाने वाले भाषणों से जोड़ दिया है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलताहै। झुंझुनूं में होने जा रहा "प्रतिभा सम्मान समारोह" दरअसल समाज की प्रतिभाओं का नहीं, बल्कि तबादला रोकने वालों का सम्मान ज्यादा नजर आता है। दीपावली की छुट्टियों में यह तथाकथित "महाकुंभ" असल में समाज के कुछ मौसमी नेताओं और मोटिवेशन गुरुओं का सेल्फ़ी महोत्सव है, जहाँ गरीब तबका केवल तालियां बजाने और भीड़ पूरी करने के लिए बुलाया जाता है। सोचने वाली बात है कि जब खेतड़ी  के मेघवाल समाज के 10 प्रिंसिपल्स को एक झटके में दूर-दराज जिलों में धकेल दिया गया, तब यही तथाकथित संगठन चुप क्यों थे? जब कमेरा वर्ग का बच्चा फीस और किताबों के लिए जूझता है, तब ये नेता कहाँ गायब रहते हैं? सवाल यह उत्पन्न होता है...

मजबूत जड़ें, अडिग परिवार : जीवन की हर चुनौती का आधार

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संपादकीय@ 17 January 2026 मजबूत जड़ें, अडिग परिवार : जीवन की हर चुनौती का आधार परिवार समाज की सबसे छोटी लेकिन सबसे सशक्त इकाई है। जिस प्रकार किसी वृक्ष की मजबूती उसकी ऊँचाई या फैलाव से नहीं, बल्कि उसकी जड़ों की गहराई और मजबूती से आंकी जाती है, उसी प्रकार किसी परिवार की वास्तविक शक्ति उसकी बाहरी संपन्नता में नहीं, बल्कि उसके मूल्यों, संस्कारों और आपसी समझ में निहित होती है। जिन परिवारों की जड़ें मजबूत होती हैं, वे समय के हर तूफान में चट्टान की तरह खड़े रहते हैं और न केवल स्वयं को बचाते हैं, बल्कि अपने सदस्यों को भी सुरक्षा, संबल और दिशा प्रदान करते हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगी कि बोलता है। आज के भौतिकवादी युग में सफलता को अक्सर धन, पद और सुविधाओं से जोड़ा जाता है। लोग यह मान लेते हैं कि बड़ा घर, महंगी गाड़ियाँ और बैंक बैलेंस ही जीवन की स्थिरता की गारंटी हैं। लेकिन इतिहास और वर्तमान दोनों ही इसके साक्षी हैं कि भौतिक संपत्तियाँ क्षणभंगुर होती हैं। आर्थिक संकट, बीमारी, सामाजिक अस्थिरता या व्यक्तिगत असफलता के समय वही परिवार टिक पाते हैं, जिनकी नींव आपसी प्रेम, विश्वास और त...

जीवन की ओस और अहंकार का बोझ

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संपादकीय@16 January 2026  जीवन की ओस और अहंकार का बोझ संतों, महापुरुषों और दार्शनिकों ने मानव जीवन की तुलना अक्सर ओस की बूंद, पानी के बुलबुले या क्षणिक परछाईं से की है। यह तुलना केवल काव्यात्मक नहीं, बल्कि जीवन का गहरा सत्य उजागर करती है। ओस की एक बूंद सुबह की पहली किरण के साथ ही मिट जाती है, पानी का बुलबुला पल भर में फूट जाता है। ठीक वैसे ही मनुष्य का जीवन भी अनिश्चित, क्षणभंगुर और अस्थायी है। हम नहीं जानते कि अगला क्षण हमारे लिए क्या लेकर आएगा। जन्म और मृत्यु के बीच का यह सफर इतना छोटा है कि अक्सर हम इसे समझने से पहले ही समय हमारे हाथों से फिसल जाता है। मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। इस विराट ब्रह्मांड और प्रकृति के अनंत विस्तार में मनुष्य का अस्तित्व वास्तव में एक छोटे से कण के समान है। पृथ्वी, आकाश, सूर्य, चंद्रमा और आकाशगंगाओं के बीच हमारा जीवन एक क्षणिक उपस्थिति मात्र है। फिर भी मनुष्य स्वयं को केंद्र में रखकर सोचता है, जैसे सब कुछ उसी के लिए बना हो। यही सोच धीरे-धीरे अहंकार का रूप ले लेती है। पद, प्रतिष्ठा, धन, ज्ञान और शक्ति मनुष्य को यह भ्रम दे देते हैं ...

समाज—हमारी पहचान, संस्कार और निरंतर परिवर्तन की यात्रा

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संपादकीय@हरेश पंवार,5 जनवरी 2026  *समाज—हमारी पहचान, संस्कार और निरंतर परिवर्तन की यात्रा*  समाज हमारे जीवन का वह आधार है, जिस पर व्यक्ति का अस्तित्व, पहचान और विकास टिका होता है। मनुष्य अकेले जीवित रह सकता है, लेकिन सार्थक जीवन समाज के बिना संभव नहीं। जन्म से लेकर मृत्यु तक मनुष्य समाज के नियमों, परंपराओं, मूल्यों और संबंधों से जुड़ा रहता है। परिवार, पड़ोस, विद्यालय, मित्र, कार्यस्थल और राष्ट्र—ये सभी समाज के ही विविध रूप हैं, जो व्यक्ति को सुरक्षा, सहयोग और दिशा प्रदान करते हैं। समाज न केवल हमारी जरूरतें पूरी करता है, बल्कि हमारे व्यक्तित्व को भी गढ़ता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। समाज हमें नैतिकता और संस्कार सिखाता है। प्रेम, भाईचारा, सहयोग, सहिष्णुता, त्याग और करुणा जैसे मूल्य समाज से ही विकसित होते हैं। जब हम दुख में होते हैं तो समाज हमें सहारा देता है, और जब खुशी होती है तो वही समाज उसे साझा कर आनंद को कई गुना बढ़ा देता है। समाज के बिना मनुष्य भावनात्मक रूप से अधूरा है। एकाकी जीवन भले ही स्वतंत्रता दे, लेकिन सामाजिक जीवन ही संतुलन और संवेदनश...

शिक्षा पर ताला, नीतियों की चाबी और बच्चों का भविष्य

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 संपादकीय 14 जनवरी 2026  *शिक्षा पर ताला, नीतियों की चाबी और बच्चों का भविष्य*  आज की शिक्षा व्यवस्था को देखकर यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं कि ताले अब स्कूलों के दरवाजों पर नहीं, बल्कि नीतियों में लगने लगे हैं। कागजों में सुधार, फाइलों में आदेश और जमीन पर अराजकता—यही आज की सरकारी शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी पहचान बन चुकी है। शिक्षा के मंदिरों में पढ़ाई से अधिक प्रयोग हो रहे हैं और प्रयोगशाला बना दिया गया है उन बच्चों के भविष्य को, जिनका कोई कसूर नहीं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगी कि बोलता है। इन दिनों स्कूलों में प्रैक्टिकल परीक्षाएं चल रही हैं। कई विषयों का सिलेबस अभी अधूरा है, लेकिन तभी अचानक तबादलों की सूची जारी कर दी जाती है। जिन शिक्षकों ने पूरे साल बच्चों को पढ़ाया, जिनसे छात्र भावनात्मक और शैक्षणिक रूप से जुड़े, उन्हें आनन-फानन में स्कूल से विदा कर दिया जाता है। सवाल यह है कि जिन विषय अध्यापकों का पाठ्यक्रम अधूरा है, उन बच्चों का क्या होगा? क्या तबादला नीति बच्चों के भविष्य से ज्यादा जरूरी हो गई है? यही कारण है कि कई स्थानों पर बच्चों का गुस्सा सड़...

ऑफलाइन मां चाहिए, ऑनलाइन नहीं

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संपादकीय@ हरेश पंवार, 11 जनवरी 2026  *“ऑफलाइन मां चाहिए, ऑनलाइन नहीं”*    *— तकनीक के दौर में खोता बचपन और मां का बदलता स्वरूप*  आज का समय तकनीक का समय है। मोबाइल, इंटरनेट, ऑनलाइन शिक्षा, डिजिटल भुगतान और सोशल मीडिया ने जीवन को सुविधाजनक तो बनाया है, लेकिन इसी सुविधा की चकाचौंध में हम अनजाने ही सबसे कीमती चीज़ को खोते जा रहे हैं—बचपन और माँ की ममता का जीवंत स्पर्श। “ऑफलाइन माँ चाहिए, ऑनलाइन नहीं” जैसा विचार केवल एक बच्चे का निबंध नहीं, बल्कि हमारे समय का आईना है, जो समाज को कठोर सच दिखा रहा है। सर्दी की छुट्टियों में एक शिक्षक ने बच्चों को मां पर निबंध लिखने का कार्य दिया। अधिकांश बच्चों ने माँ के त्याग, प्रेम और संघर्ष को शब्दों में सजाया, लेकिन एक बच्चा—जो शांत, एकांतप्रिय और सृजनशील था—उसने जो लिखा, उसने पूरे तंत्र को झकझोर दिया। उसके निबंध का शीर्षक था— “मुझे ऑफलाइन मां चाहिए, ऑनलाइन नहीं।” यह शीर्षक अपने आप में एक प्रश्न नहीं, बल्कि आरोप है—हम सब पर। उस बच्चे ने लिखा कि उसे पढ़ी-लिखी, मोबाइल में उलझी, हर सवाल का जवाब गूगल से खोजने वाली माँ नहीं चाहिए...

लड़ाई पद की नहीं, अहंकार की है — और कीमत समाज का भविष्य चुका रहा है

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संपादकीय@9 जनवरी 2026  *लड़ाई पद की नहीं, अहंकार की है — और कीमत समाज का भविष्य चुका रहा है*  डॉ. अंबेडकर मेमोरियल वेलफेयर सोसाइटी के हालिया चुनाव के बाद जो वातावरण बना है, वह केवल एक संस्था के भीतर सत्ता-संघर्ष का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरे समाज के आत्ममंथन का विषय बन चुका है। यह लड़ाई किसी अध्यक्ष पद, सचिव पद या पैनल की नहीं है; यह लड़ाई उस छुपे हुए अहंकार की है, जो वर्दी उतरने के बाद भी मन से नहीं उतरता और जो अपने प्रभाव, रुतबे और सत्ता-लालसा के लिए समाज को मोहरे की तरह इस्तेमाल करता है। मैं यहां बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।  सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि इस पूरी लड़ाई में असली नुकसान युवाओं का हो रहा है। सांड-सांड लड़ रहे हैं और खेत नौजवान रौंदे जा रहे हैं। सोशल मीडिया पर भड़काऊ भाषण, गाली-गलौज, धमकियां, हुड़दंग और फिर कार्यालय का ताला तोड़ना—यह सब किस लोकतांत्रिक मूल्य का प्रतिनिधित्व करता है? क्या यही बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर का सपना था? बाबा साहब ने कहा था— “शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो।” लेकिन आज का दृश्य देखकर लगता है मानो इस ...

जीवन की यात्रा और घर की परीक्षा : क्यों बाहर सहनशील, भीतर असहिष्णु हो जाते हैं हम

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संपादकीय  *जीवन की यात्रा और घर की परीक्षा : क्यों बाहर सहनशील, भीतर असहिष्णु हो जाते हैं हम*  जीवन को अक्सर एक यात्रा कहा जाता है, और यह उपमा केवल काव्यात्मक नहीं, बल्कि व्यवहारिक सत्य भी है। हम रोज़ किसी न किसी रूप में यात्रा करते हैं—कभी बस में, कभी ट्रेन में, कभी हवाई जहाज में और कभी जीवन की अनदेखी पगडंडियों पर। आश्चर्य की बात यह है कि जब हम सार्वजनिक परिवहन में सफर कर रहे होते हैं, तब हमारे भीतर सहनशीलता, धैर्य और समायोजन (एडजस्टमेंट) का अद्भुत गुण स्वतः जागृत हो जाता है। तंग सीट, देर से चलती ट्रेन, शोर मचाता सह-यात्री या सामान रखने की असुविधा—इन सबके बावजूद हम प्रायः मुस्कुराकर या चुप रहकर यात्रा पूरी कर लेते हैं। लेकिन विडंबना यह है कि वही व्यक्ति जब अपने घर की दहलीज पर कदम रखता है, तो उसके व्यवहार में एक अजीब सा परिवर्तन आ जाता है। जो इंसान सफर में हर असुविधा को सहजता से स्वीकार कर लेता है, वही घर में छोटी-छोटी बातों पर झुंझला उठता है। कभी खाने में नमक कम होने पर, कभी बच्चों की शरारत पर, तो कभी जीवनसाथी की किसी बात पर उसका धैर्य जवाब दे जाता है। यहीं से परि...

कक्षा से परे ज्ञान की यात्रा: उपस्थिति नहीं, समझ को बनाइए शिक्षा की कसौट

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संपादकीय@5 जनवरी 2026 *कक्षा से परे ज्ञान की यात्रा: उपस्थिति नहीं, समझ को बनाइए शिक्षा की कसौट*  शिक्षा यदि केवल घंटी बजने पर कक्षा में बैठ जाने का नाम होती, तो ज्ञान का विस्तार चार दीवारों से आगे कभी जा ही नहीं सकता था। विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों की कल्पना इसलिए नहीं की गई थी कि वे युवाओं को अनुशासन की पंक्तियों में खड़ा कर दें, बल्कि इसलिए कि वे उन्हें सोचने, प्रश्न करने और समाज को नए दृष्टिकोण देने योग्य नागरिक बना सकें। फिर भी विडंबना यह है कि आज उच्च शिक्षा का बड़ा हिस्सा “अनिवार्य उपस्थिति” जैसे नियमों में उलझकर अपने मूल उद्देश्य से भटकता नजर आता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। कई शैक्षणिक संस्थानों में यह मान लिया गया है कि यदि छात्र कक्षा में मौजूद है, तो वह सीख भी रहा है; और यदि वह अनुपस्थित है, तो वह शिक्षा से विमुख है। यह धारणा जितनी सरल दिखती है, उतनी ही भ्रामक भी है। सीखना एक मानसिक और बौद्धिक प्रक्रिया है, जिसका सीधा संबंध केवल शारीरिक उपस्थिति से नहीं होता। कोई छात्र कक्षा में बैठकर भी निष्क्रिय रह सकता है, और कोई पुस्तकालय, प्रयोगशाला...

वस्तु नहीं, दृष्टि तय करती है दिशा

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संपादकीय@7जनवरी 2026   *वस्तु नहीं, दृष्टि तय करती है दिशा*  “अच्छाई और बुराई वस्तु में नहीं, कर्म में होती है—कोई बांस से तीर बनाता है तो कोई उसी से बांसुरी।” यह पंक्ति केवल एक सुंदर कथन नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के नैतिक दर्शन का सार है। यह हमें बताती है कि किसी भी वस्तु, संसाधन या शक्ति का मूल्य उसके अस्तित्व में नहीं, बल्कि उसके उपयोग की नीयत और उद्देश्य में छिपा होता है। यही विचार आज के समाज, राजनीति, शिक्षा, तकनीक और संस्कृति—सभी क्षेत्रों में गहरे आत्ममंथन की मांग करता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।। इतिहास साक्षी है कि एक ही वस्तु ने मानवता को बचाया भी है और नष्ट भी किया है। आग से भोजन पकाया गया, जीवन सरल हुआ; उसी आग से युद्ध जले, सभ्यताएं राख हुईं।  परमाणु ऊर्जा से बिजली बनी, चिकित्सा में क्रांति आई; उसी ऊर्जा से हिरोशिमा-नागासाकी तबाह हुए। स्पष्ट है—वस्तु निर्दोष होती है, दोषी होता है उसका उपयोगकर्ता।  आज के समय में यह कथन और भी प्रासंगिक हो जाता है। तकनीक को ही देखिए। मोबाइल फोन, इंटरनेट, सोशल मीडिया—ये सभी साधन ज्ञान, संवाद ...