जीवन की ओस और अहंकार का बोझ


संपादकीय@16 January 2026

 जीवन की ओस और अहंकार का बोझ
संतों, महापुरुषों और दार्शनिकों ने मानव जीवन की तुलना अक्सर ओस की बूंद, पानी के बुलबुले या क्षणिक परछाईं से की है। यह तुलना केवल काव्यात्मक नहीं, बल्कि जीवन का गहरा सत्य उजागर करती है। ओस की एक बूंद सुबह की पहली किरण के साथ ही मिट जाती है, पानी का बुलबुला पल भर में फूट जाता है। ठीक वैसे ही मनुष्य का जीवन भी अनिश्चित, क्षणभंगुर और अस्थायी है। हम नहीं जानते कि अगला क्षण हमारे लिए क्या लेकर आएगा। जन्म और मृत्यु के बीच का यह सफर इतना छोटा है कि अक्सर हम इसे समझने से पहले ही समय हमारे हाथों से फिसल जाता है। मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

इस विराट ब्रह्मांड और प्रकृति के अनंत विस्तार में मनुष्य का अस्तित्व वास्तव में एक छोटे से कण के समान है। पृथ्वी, आकाश, सूर्य, चंद्रमा और आकाशगंगाओं के बीच हमारा जीवन एक क्षणिक उपस्थिति मात्र है। फिर भी मनुष्य स्वयं को केंद्र में रखकर सोचता है, जैसे सब कुछ उसी के लिए बना हो। यही सोच धीरे-धीरे अहंकार का रूप ले लेती है। पद, प्रतिष्ठा, धन, ज्ञान और शक्ति मनुष्य को यह भ्रम दे देते हैं कि वह स्थायी है, अजेय है और सबसे श्रेष्ठ है।

विडंबना यह है कि यह अहंकार उसी नश्वर शरीर में पलता है, जो किसी भी क्षण मिट्टी में मिल सकता है। जिस देह पर मनुष्य को इतना गर्व होता है, वही देह समय के साथ जर्जर होती है, बीमार पड़ती है और अंततः समाप्त हो जाती है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि कितने ही शक्तिशाली राजा, साम्राज्य और धनवान लोग आए और चले गए। उनके महलों के खंडहर आज भी यह प्रश्न करते हैं कि आखिर अहंकार किस काम आया?

जीवन की सार्थकता इस बात में नहीं है कि हमने कितना संग्रह किया, कितनी शक्ति अर्जित की या कितने लोगों पर शासन किया। जीवन का वास्तविक मूल्य इस बात में है कि हमने कितनी विनम्रता से, कितने प्रेम और करुणा के साथ जीवन जिया। जब मनुष्य अपनी नश्वरता को स्वीकार करता है, तभी उसके भीतर सच्ची मानवता का जन्म होता है। जो व्यक्ति यह समझ लेता है कि वह केवल पानी की एक बूंद है, वही सागर से लड़ने की व्यर्थ होड़ छोड़ देता है।

आज के समय में अहंकार केवल व्यक्तिगत नहीं, सामाजिक और सामूहिक रूप भी ले चुका है। व्यक्ति अपने पद का अहंकार करता है, समाज अपनी श्रेष्ठता का, जाति अपनी ऊँचाई का और राष्ट्र अपनी ताकत का। यही अहंकार टकराव, हिंसा और विभाजन को जन्म देता है। यदि हम अपनी अस्थिरता और क्षणभंगुरता को याद रखें, तो शायद हम दूसरों को नीचा दिखाने या उनसे आगे निकलने की अंधी दौड़ में शामिल न हों।

संतों ने बार-बार यही संदेश दिया है कि अहंकार त्याग ही आत्मिक शांति का मार्ग है। कबीर ने कहा—
“जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं।”
इस पंक्ति में जीवन का सार छिपा है। जब तक ‘मैं’ का भाव रहता है, तब तक शांति नहीं मिलती। जैसे ही अहंकार का विसर्जन होता है, जीवन सरल, सहज और आनंदमय हो जाता है।

यदि हम यह स्वीकार कर लें कि हमारा जीवन एक उधार की सांस है, तो हमारे व्यवहार में अपने आप बदलाव आ जाएगा। हम अधिक धैर्यवान, अधिक संवेदनशील और अधिक सहिष्णु हो जाएंगे। दूसरों की पीड़ा हमें अपनी लगेगी और दूसरों की खुशी में हम सच्चा आनंद महसूस करेंगे। यही मानवता का आधार है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने बच्चों, समाज और स्वयं को यह सिखाएं कि सफलता का अर्थ अहंकार नहीं, बल्कि विनम्रता है। शक्ति का अर्थ दूसरों को दबाना नहीं, बल्कि कमजोर का सहारा बनना है। ज्ञान का उद्देश्य दूसरों को छोटा साबित करना नहीं, बल्कि अज्ञान के अंधकार को दूर करना है।

यदि मनुष्य यह समझ ले कि वह सागर नहीं, बल्कि सागर में मिलने वाली एक बूंद है, तो उसका जीवन संघर्ष से अधिक समर्पण से भरा होगा। वह प्रतिस्पर्धा से अधिक सहयोग में विश्वास करेगा। अहंकार को त्याग कर ही वह उस आंतरिक शांति को प्राप्त कर सकता है, जो किसी भी सांसारिक उपलब्धि, पद या संपत्ति से कहीं अधिक मूल्यवान है।

अंततः यही कहा जा सकता है कि जीवन की ओस को अहंकार की धूप में सुखाने से अच्छा है, उसे मानवता के सागर में घुलने दिया जाए। यही जीवन की सच्ची उपलब्धि है और यही संपादकीय चिंतन का मूल संदेश भी।

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