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Showing posts from March, 2026

मेरे पिता—संस्कार, संघर्ष और सत्य का जीवंत विद्यालय

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 संपादकीय@ हरेश पंवार 23.03.2026 *“मेरे पिता—संस्कार, संघर्ष और सत्य का जीवंत विद्यालय”* मनुष्य के जीवन में कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जो केवल संबंध नहीं बल्कि संपूर्ण जीवन-दर्शन बन जाते हैं। मेरे लिए मेरे पिता ऐसे ही एक आदर्श, एक प्रेरणा और एक जीवंत पाठशाला थे। वे भले ही औपचारिक रूप से अधिक पढ़े-लिखे नहीं थे, लेकिन जीवन के गूढ़तम ज्ञान, सामाजिक समझ और व्यवहारिक विज्ञान में उनकी पकड़ अद्भुत थी। उन्होंने कभी बड़ी-बड़ी किताबों का हवाला नहीं दिया, बल्कि अपने अनुभवों और सरल शब्दों में जो शिक्षा दी, वही मेरे जीवन की सबसे बड़ी पूंजी बन गई। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। मेरे पिता कहा करते थे—“पढ़ाई ऐसी चीज है जो कभी बंटती नहीं, जितनी बांटो उतनी बढ़ती है।” यह एक साधारण वाक्य नहीं, बल्कि जीवन का वह मूलमंत्र है जिसने मुझे शिक्षा के प्रति समर्पित किया। उन्होंने हमें यह नहीं सिखाया कि केवल डिग्रियां हासिल करनी हैं, बल्कि यह सिखाया कि ज्ञान को आत्मसात करना है और उसे समाज के हित में उपयोग करना है। वे परिश्रम के उपासक थे। उनका मानना था—“मेहनत इतनी खामोशी से करो कि सफलता खुद...

घर की शांति का असली आधार: प्रेम, संवाद और आंतरिक पवित्रता

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 संपादकीय@Haresh panwar 31.03.2026  *“घर की शांति का असली आधार: प्रेम, संवाद और आंतरिक पवित्रता”*  परिवार केवल चार दीवारों का नाम नहीं है, बल्कि यह भावनाओं, विश्वास और आपसी संबंधों का एक जीवंत संसार होता है। जब इस संसार में प्रेम, सहयोग और एकता का वास होता है, तब वह घर स्वर्ग के समान प्रतीत होता है। लेकिन जैसे ही इस रिश्तों की बुनियाद में ईर्ष्या, जलन और द्वेष का जहर घुलने लगता है, वही घर धीरे-धीरे भीतर से खोखला होने लगता है। यह एक ऐसा आंतरिक क्षरण है, जो बाहर से दिखाई नहीं देता, लेकिन इसके परिणाम अत्यंत विनाशकारी होते हैं। यहां पर बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। आज के समय में यह देखा जा रहा है कि परिवारों के टूटने के पीछे सबसे बड़ा कारण बाहरी परिस्थितियां नहीं, बल्कि घर के भीतर पनप रही नकारात्मक भावनाएं हैं। जब अपने ही अपने से प्रतिस्पर्धा करने लगते हैं, जब भाई-भाई से, बहन-बहन से या सास-बहू से ईर्ष्या करने लगते हैं, तब रिश्तों की मिठास कड़वाहट में बदल जाती है। ऐसे माहौल में चाहे कितनी भी पूजा-पाठ, हवन या धार्मिक अनुष्ठान करवा लिए जाएँ, वास्तविक शांति प्राप्...

वादों से नहीं, प्रयासों से बनती है सफलता की असली पहचान

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 संपादकीय@ 25-03-2026 *वादों से नहीं, प्रयासों से बनती है सफलता की असली पहचान* आज के दौर में वादों की कोई कमी नहीं है। हर व्यक्ति अपने जीवन में, अपने रिश्तों में और अपने लक्ष्यों के प्रति बड़े-बड़े दावे करता है। लेकिन जब उन वादों की कसौटी पर समय आता है, तो अक्सर वे खोखले साबित हो जाते हैं। इसका कारण स्पष्ट है—वादे केवल शब्दों पर आधारित होते हैं, जबकि सफलता की नींव शब्दों से नहीं, बल्कि निरंतर प्रयास और कर्म से बनती है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। मनुष्य का जीवन अनिश्चितताओं से भरा हुआ है। यहाँ रिश्ते बदलते हैं, परिस्थितियाँ बदलती हैं और कई बार वे लोग भी साथ छोड़ देते हैं जिन पर हमने सबसे अधिक भरोसा किया होता है। ऐसे में यदि कोई चीज स्थायी रहती है, तो वह है—हमारी मेहनत और हमारी कोशिश। यही वह शक्ति है, जो हमें हर कठिन परिस्थिति में आगे बढ़ने का साहस देती है। वादे करना आसान है, लेकिन उन्हें निभाना कठिन। क्योंकि वादे बाहरी दुनिया से जुड़े होते हैं, जबकि कोशिश एक आंतरिक प्रतिबद्धता है—जो हम खुद से करते हैं। जब कोई व्यक्ति खुद से यह संकल्प लेता है कि वह हर परिस...

शब्द, संबंध और सत्य—जीवन को संतुलित करने की अनिवार्य शर्त

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 संपादकीय@26.03.2026 *शब्द, संबंध और सत्य—जीवन को संतुलित करने की अनिवार्य शर्त* मानव जीवन जितना सरल दिखाई देता है, उतना ही जटिल भी है। यह जटिलता केवल परिस्थितियों से नहीं, बल्कि हमारे विचारों, शब्दों और व्यवहार से भी उत्पन्न होती है। अक्सर हम यह भूल जाते हैं कि हमारे द्वारा बोले गए शब्द, बनाए गए संबंध और अपनाया गया दृष्टिकोण ही हमारे जीवन की दिशा तय करते हैं। शब्द भले ही मुफ्त में मिलते हों, लेकिन उनका प्रभाव इतना गहरा होता है कि वे या तो हमें सम्मान दिला सकते हैं या भारी कीमत चुकाने के लिए मजबूर कर सकते हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। आज के समय में संवाद की गति तो बढ़ी है, लेकिन उसकी संवेदनशीलता कम होती जा रही है। लोग बिना सोचे-समझे कुछ भी कह देते हैं, बिना यह समझे कि उनके शब्द किसी के मन को आहत कर सकते हैं। यही कारण है कि रिश्तों में दूरियां बढ़ रही हैं और समाज में तनाव का स्तर भी लगातार बढ़ रहा है। शब्दों का सही चयन न केवल एक कला है, बल्कि यह एक जिम्मेदारी भी है। यदि हम अपने शब्दों को संयमित और सकारात्मक बना लें, तो कई विवाद स्वतः ही समाप्त हो सकते ह...

शब्दों की शक्ति—रिश्तों को जोड़ने का सबसे सरल और प्रभावी माध्यम

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 संपादकीय@हरेश पंवार 27-03-2026 *शब्दों की शक्ति—रिश्तों को जोड़ने का सबसे सरल और प्रभावी माध्यम* मनुष्य को अन्य जीवों से अलग करने वाली सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उसकी वाणी है। शब्द केवल संवाद का माध्यम नहीं होते, बल्कि वे हमारे व्यक्तित्व, संस्कार और संवेदनशीलता के प्रतिबिंब भी होते हैं। एक मीठा और सम्मानजनक शब्द जहाँ कट्टर दुश्मन के हृदय को भी पिघला सकता है, वहीं एक कड़वा और असंवेदनशील वाक्य वर्षों पुराने रिश्तों को तोड़ने की क्षमता रखता है। यही कारण है कि हमारे जीवन में शब्दों का चयन अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। भारतीय संत परंपरा में वाणी की महत्ता को विशेष रूप से रेखांकित किया गया है। संत कबीरदास जी ने अपने प्रसिद्ध दोहे में कहा है— “ऐसी बाणी बोलिये, मन का आपा खोय। औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होय।” इस दोहे का सार यह है कि हमें अपने अहंकार को त्यागकर ऐसी वाणी का प्रयोग करना चाहिए, जो दूसरों के मन को शीतलता प्रदान करे। जब हम दूसरों को सम्मान और प्रेम से संबोधित करते हैं, तो उसका सकारात्मक प्रभाव हमारे अपने मन पर भी पड़ता है। इस...

परिणाम नहीं, प्रयास का सम्मान—परीक्षा से आगे की असली शिक्षा

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 संपादकीय@ हरेश पंवार 24-03-2026 *परिणाम नहीं, प्रयास का सम्मान—परीक्षा से आगे की असली शिक्षा* राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा 10वीं कक्षा का परीक्षा परिणाम आज घोषित होने जा रहा है। यह केवल एक सामान्य शैक्षणिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि कई मायनों में ऐतिहासिक बदलाव का प्रतीक भी है। पहली बार मार्च माह में परिणाम घोषित किया जा रहा है और पारंपरिक क्रम को बदलते हुए 10वीं का परिणाम 12वीं से पहले जारी किया जा रहा है। साथ ही 8वीं और 5वीं के परिणाम भी इसी समय आने की संभावना है। शिक्षा व्यवस्था में यह बदलाव निश्चित रूप से समय प्रबंधन और अकादमिक सत्र को व्यवस्थित करने की दिशा में एक सकारात्मक कदम है। लेकिन इन सबके बीच सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या हम इस परिणाम को केवल “अंक” और “प्रतिशत” तक सीमित कर देंगे, या इसे आत्ममंथन और सुधार का अवसर बनाएंगे? यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। हर वर्ष की तरह इस बार भी लाखों विद्यार्थी अपने परिणाम को लेकर उत्सुक हैं। कुछ के चेहरे पर मुस्कान होगी, तो कुछ के मन में निराशा। लेकिन यह समझना आवश्यक है कि परीक्षा का परिणाम केवल दो ही ...

कपिलवस्तु—इतिहास की धरती पर जीवंत होती बुद्धकालीन सभ्यता की गाथा

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संपादकीय@ हरेश पंवार -23.03.2026 यात्रा वृतांत भाग- 5   *कपिलवस्तु—इतिहास की धरती पर जीवंत होती बुद्धकालीन सभ्यता की गाथा*  भारत की पवित्र भूमि पर स्थित कपिलवस्तु केवल एक ऐतिहासिक स्थान नहीं, बल्कि बौद्धकालीन संस्कृति, राजनीति और मानवता के उत्कर्ष का जीवंत साक्षी है। जब हमारा भ्रमण दल उत्तर प्रदेश के इस ऐतिहासिक स्थल की ओर अग्रसर हुआ, तो यह यात्रा केवल भौगोलिक दूरी तय करने तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह हमें हजारों वर्ष पुराने इतिहास के साक्षात्कार तक ले गई। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। घने जंगलों से होकर गुजरती हमारी यात्रा अपने आप में एक अद्भुत अनुभव थी। सागवान और पलाश के चौड़े हरे पत्तों से ढके पेड़ों के बीच से निकलते हुए ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो प्रकृति स्वयं हमें उस कालखंड में ले जा रही हो, जहाँ कभी राजकुमार सिद्धार्थ ने अपने बचपन के दिन बिताए थे। वातावरण में एक अनोखी शांति थी, जो इस बात का संकेत दे रही थी कि हम किसी विशेष और ऐतिहासिक भूमि की ओर बढ़ रहे हैं। कपिलवस्तु के समीप पहुँचते ही भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा किए जा रहे उत्खनन कार्य ने ह...

कुशीनगर का ज्ञानोदय बुद्ध विहार — शांति, इतिहास और आध्यात्मिक चेतना का स्मरणीय पड़ाव*

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संपादकीय@हरेश पंवार का यात्रा वृतांत भाग 4  *कुशीनगर का ज्ञानोदय बुद्ध विहार — शांति, इतिहास और आध्यात्मिक चेतना का स्मरणीय पड़ाव* भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपरा में बौद्ध स्थलों का विशेष महत्व रहा है। ये स्थल केवल ऐतिहासिक धरोहर ही नहीं, बल्कि मानवता, करुणा और ज्ञान की जीवित परंपरा के प्रतीक भी हैं। ऐसी ही एक अविस्मरणीय यात्रा के दौरान हमारे भ्रमण दल को कुशीनगर स्थित ज्ञानोदय बुद्ध विहार में रात्रि विश्राम का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यह अनुभव केवल एक पड़ाव नहीं था, बल्कि आध्यात्मिक चेतना और ऐतिहासिक स्मृतियों से जुड़ा एक गहरा संस्मरण बन गया। मैं यहां बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। हमारा यात्रा दल बौद्ध पर्यटक स्थलों के अध्ययन और दर्शन के उद्देश्य से निकला था। नेपाल के लुंबिनी में भगवान बुद्ध की जन्मस्थली के दर्शन के बाद हम कुशीनगर की ओर बढ़े, जहाँ भगवान बुद्ध का परिनिर्वाण हुआ था। कुशीनगर विश्व भर के बौद्ध श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए एक पवित्र और ऐतिहासिक स्थल है। यहाँ पहुँचने से पहले हमें जिस बुद्ध विहार में ठहरने का अवसर मिला, वह अपने आप में अत्यंत महत्वपू...

श्रावस्ती में अनाथपिंडक स्तूप : एक यात्रा, एक इतिहास और करुणा की अमर गाथा

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संपादकीय @ हरेश पंवार 21-03-2026  (यात्रा-वृत्तांत-3) *श्रावस्ती में अनाथपिंडक स्तूप : एक यात्रा, एक इतिहास और करुणा की अमर गाथा* भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपरा में कुछ स्थान ऐसे हैं, जहां इतिहास केवल पुस्तकों में नहीं बल्कि धरती की धूल, स्तूपों की ईंटों और जनमानस की स्मृतियों में जीवित रहता है। ऐसी ही एक पवित्र भूमि है श्रावस्ती, जहां कभी गौतम बुद्ध ने अपने जीवन का लंबा समय बिताया और मानवता को करुणा, समता और मध्यम मार्ग का संदेश दिया। हाल ही में श्रावस्ती की यात्रा के दौरान मुझे उस ऐतिहासिक स्थल को देखने का अवसर मिला, जिसे अनाथपिंडक स्तूप के नाम से जाना जाता है। इस स्थल को देखकर केवल इतिहास की स्मृति ही नहीं जागती, बल्कि बौद्ध संस्कृति के मानवीय मूल्यों का जीवंत अनुभव भी होता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। यात्रा का अनुभव और ऐतिहासिक वातावरण जब मैं श्रावस्ती के ऐतिहासिक क्षेत्र में पहुंचा तो वातावरण में एक अलग ही शांति और आध्यात्मिकता का अनुभव हुआ। यहां के प्राचीन अवशेष, विहार और स्तूप मानो सदियों पुरानी सभ्यता की कहानी सुना रहे थे। इन्हीं ऐतिह...

श्रावस्ती की धरती पर अहिंसा का संदेश — अंगुलिमाल के हृदय परिवर्तन की ऐतिहासिक गाथा

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संपादकीय@हरेश पंवार संपादक- दैनिक भीम प्रज्ञा  यात्रा वृतांत भाग- 2  *श्रावस्ती की धरती पर अहिंसा का संदेश — अंगुलिमाल के हृदय परिवर्तन की ऐतिहासिक गाथा* भारत की पवित्र और ऐतिहासिक धरती केवल राजाओं और युद्धों की कहानियों से ही नहीं, बल्कि मानवता, करुणा और आध्यात्मिक परिवर्तन की अद्भुत घटनाओं से भी समृद्ध रही है। उत्तर प्रदेश का श्रावस्ती ऐसा ही एक ऐतिहासिक स्थल है, जहाँ हर पत्थर, हर स्तूप और हर अवशेष मानव इतिहास की एक गहरी आध्यात्मिक कथा सुनाता है। इन दिनों श्रावस्ती के ऐतिहासिक स्थलों का भ्रमण करते हुए बौद्ध संस्कृति और तथागत गौतम बुद्ध के जीवन से जुड़ी अनेक घटनाओं को निकट से देखने और समझने का अवसर मिला। यह यात्रा केवल एक पर्यटन अनुभव नहीं, बल्कि इतिहास और मानवता के संदेश को आत्मसात करने का एक गंभीर प्रयास भी रही। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। श्रावस्ती बौद्ध धम्म के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। कहा जाता है कि महात्मा बुद्ध ने अपने जीवन के लगभग पच्चीस वर्ष वर्षावास के रूप में यहीं व्यतीत किए थे। श्रावस्ती के जेतवन विहार में ...

मजबूत मीडिया मैनेजमेंट — संगठन की सफलता की अनिवार्य शर्त

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 संपादकीय@हरेश पंवार -17.03.2026 *मजबूत मीडिया मैनेजमेंट — संगठन की सफलता की अनिवार्य शर्त* किसी भी संगठन की सफलता केवल उसके उद्देश्य, विचारधारा या योजनाओं पर ही निर्भर नहीं करती, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करती है कि वह अपने विचारों को समाज तक कितनी प्रभावी ढंग से पहुँचा पाता है। यदि किसी संगठन के पास स्पष्ट दृष्टि और मजबूत रणनीति होने के बावजूद उसका संदेश लोगों तक नहीं पहुँचता, तो वह संगठन धीरे-धीरे सीमित दायरे में सिमट कर रह जाता है। ठीक उसी प्रकार जैसे कोई मूर्तिकार कितनी ही सुंदर मूर्ति बना ले, लेकिन यदि उसके चेहरे की आकृति ही ठीक न बने तो पूरी मूर्ति का आकर्षण समाप्त हो जाता है। उसी तरह किसी संगठन की नीति और विचारधारा चाहे कितनी भी मजबूत क्यों न हो, यदि उसका मीडिया मैनेजमेंट कमजोर है तो संगठन के भीतर विखंडन की संभावनाएँ जन्म लेने लगती हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। मीडिया किसी भी संगठन की आवाज होता है। यह वह माध्यम है जिसके द्वारा संगठन अपनी सोच, अपने लक्ष्य और अपनी गतिविधियों को लोगों तक पहुँचाता है। बिना जनसंचार के कोई भी विचार सीमित दायरे में कै...

श्रावस्ती और बुद्ध धम्म : सांस्कृतिक मूल्य और महत्व- एक धम्म यात्रावृत्तांत

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संपादकीय @हरेश पंवार 16-03-2026 *श्रावस्ती और बुद्ध धम्म : सांस्कृतिक मूल्य और महत्व- एक धम्म यात्रावृत्तांत*  दिनांक 15 मार्च 2026 को उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती शहर में बौद्ध धम्म के सांस्कृतिक मूल्यों अध्ययन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। हमारा धम्मयात्रा दल दिल्ली से रवाना होकर अखिल भारतीय नाग संघ के तीन दिवसीय द्वितीय राष्ट्रीय अधिवेशन में सामिल हुए वरिष्ठ साहित्यकार डॉ रूपचंद गौतम, दैनिक भीम प्रज्ञा के संपादक हरेश पंवार सहित दर्जनों विद्वान लोग तथा आठ राज्यों के सैकड़ों वक्त पहुंचे। प्रथम दृष्टया यह रमणीय कार्यक्रम आयोजित हुआ। 1. *श्रावस्ती का ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व* श्रावस्ती प्राचीन भारत का एक अत्यंत महत्वपूर्ण नगर रहा है, जो आज के उत्तर प्रदेश में स्थित है। बौद्ध परंपरा के अनुसार यह नगर उस समय के शक्तिशाली राज्य कोशल की राजधानी था और यहां के राजा प्रसेनजित बुद्ध के अनुयायी थे। इतिहास और बौद्ध ग्रंथों के अनुसार तथागत गौतम बुद्ध ने अपने जीवन के लगभग 24 वर्ष वर्षावास (वर्षा ऋतु में ठहराव) श्रावस्ती में बिताए थे। यही कारण है कि श्रावस्ती को बौद्ध धर्म का एक प्रमु...

शुद्धता पर संकट — जब मुनाफ़े के आगे हारती जा रही इंसानियत

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 संपादकीय @ हरेश पंवार दिनांक 15.03.2026 *शुद्धता पर संकट — जब मुनाफ़े के आगे हारती जा रही इंसानियत* आधुनिक जीवन की तेज़ रफ्तार में हम सुविधा और उपभोग की ऐसी दुनिया में पहुँच चुके हैं, जहाँ हर वस्तु आसानी से उपलब्ध तो है, लेकिन उसकी शुद्धता और विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़े हो गए हैं। कभी-कभी रोजमर्रा के छोटे-छोटे अनुभव भी हमें इस सच्चाई का एहसास कराते हैं। जैसे ट्रेन की बोगी में मिलने वाली गर्म चाय या बाजार में मिलने वाला ठंडा पैक्ड पानी। ये दोनों साधारण बातें हैं, लेकिन इनके माध्यम से एक बड़ा सवाल सामने आता है—क्या हम वास्तव में शुद्ध और सुरक्षित खाद्य पदार्थों का सेवन कर रहे हैं, या फिर केवल दिखावे और विश्वास के आधार पर जहर निगल रहे हैं? यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है आज बाजार में मिलने वाले अधिकांश खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता को लेकर संदेह पैदा होने लगा है। दूध, पानी, मसाले, मिठाइयाँ और यहाँ तक कि फल-सब्जियाँ भी मिलावट के आरोपों से अछूती नहीं हैं। उपभोक्ता के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह हर वस्तु की शुद्धता की जाँच नहीं कर सकता। वह केवल विश्वास के ...

ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा—सच्चे आत्मविश्वास की आधारशिला

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 संपादकीय @14.03.2026 ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा—सच्चे आत्मविश्वास की आधारशिला आज के तेज़ी से बदलते दौर में जब सफलता को अक्सर धन, पद और बाहरी उपलब्धियों से मापा जाने लगा है, तब ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा जैसे मूल्यों का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। आधुनिक जीवन की प्रतिस्पर्धा में कई बार लोगों को यह भ्रम हो जाता है कि बेईमानी या शॉर्टकट अपनाकर जल्दी सफलता प्राप्त की जा सकती है। लेकिन यह केवल एक क्षणिक भ्रम होता है, क्योंकि वास्तविक और स्थायी सफलता वही होती है जो नैतिकता, ईमानदारी और कर्तव्य के मार्ग पर चलकर प्राप्त की जाए। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति की सबसे बड़ी ताकत उसका आत्मविश्वास और आत्मसम्मान होता है। वह जानता है कि उसने अपने जीवन में जो भी प्राप्त किया है, वह उसकी मेहनत और सत्यनिष्ठा का परिणाम है। यही विश्वास उसे मानसिक शांति और संतोष प्रदान करता है। जब व्यक्ति अपने कार्य और व्यवहार में ईमानदारी बरतता है, तो समाज में भी उसके प्रति विश्वास और सम्मान की भावना विकसित होती है। यह विश्वास किसी भी धन या पद से कहीं अधिक मूल्य...

आज का पसीना, कल की मुस्कान

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 संपादकीय@13.3.2026 *आज का पसीना, कल की मुस्कान* समय जीवन की सबसे मूल्यवान संपत्ति है। यह एक ऐसी धारा है जो निरंतर बहती रहती है और किसी के लिए भी ठहरती नहीं। जिसने समय की कीमत को समझ लिया, वह जीवन की दौड़ में आगे निकल जाता है, और जिसने इसे हल्के में लिया, वह अक्सर पछतावे के साथ पीछे रह जाता है। विशेष रूप से विद्यार्थी जीवन, युवावस्था और करियर की शुरुआत का समय मनुष्य के जीवन का ‘स्वर्ण काल’ माना जाता है। यही वह दौर होता है जब व्यक्ति के शरीर में ऊर्जा, मन में उत्साह और दिमाग में नए सपनों की उड़ान होती है। यदि इस समय का सही उपयोग किया जाए तो यही परिश्रम आगे चलकर जीवन की सफलता की मजबूत नींव बन जाता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। विद्यार्थी जीवन केवल किताबें पढ़ने या परीक्षाएं पास करने का नाम नहीं है, बल्कि यह वह समय होता है जब व्यक्ति अपने व्यक्तित्व, सोच और जीवन के लक्ष्य को आकार देता है। इस समय किया गया संघर्ष और अनुशासन व्यक्ति को भविष्य के लिए तैयार करता है। जो विद्यार्थी अपने समय को पढ़ाई, कौशल विकास और सकारात्मक गतिविधियों में लगाते हैं, वे धीरे-धीरे ...

आत्मसम्मान की कीमत और सम्मानपूर्ण समाज की आवश्यकता

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संपादकीय@11.03.2026 आत्मसम्मान की कीमत और सम्मानपूर्ण समाज की आवश्यकता मानव जीवन में सबसे महत्वपूर्ण यदि कोई संपत्ति है, तो वह है आत्मसम्मान और इज्जत। धन, पद और प्रतिष्ठा समय के साथ कम या ज्यादा हो सकते हैं, लेकिन यदि किसी व्यक्ति का आत्मसम्मान टूट जाए तो उसका जीवन भीतर से खाली हो जाता है। इसलिए कहा जाता है कि इज्जत बहुत महंगी चीज होती है, और इसे हर किसी से मिलने की उम्मीद करना भी उचित नहीं होता। समाज में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनकी सोच संकीर्ण होती है और जिनके संस्कार इतने कमजोर होते हैं कि उन्हें दूसरों की कद्र करना नहीं आता। ऐसे लोगों से सम्मान की अपेक्षा करना स्वयं को दुख देने के समान है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। दरअसल, सम्मान केवल शब्दों से नहीं, बल्कि व्यवहार से प्रकट होता है। जब कोई व्यक्ति आपकी उपस्थिति को महत्व देता है, आपकी बात को ध्यान से सुनता है और आपके विचारों की कद्र करता है, तभी वह सच्चा सम्मान होता है। लेकिन जहां आपकी बातों को अनदेखा किया जाए, आपकी मौजूदगी को महत्व न दिया जाए और आपके आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाई जाए, वहां बैठना या बने रहना ...

गलती से घबराना नहीं, उससे सीखना ही प्रगति का मार्ग

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संपादकीय@11.03.2026 गलती से घबराना नहीं, उससे सीखना ही प्रगति का मार्ग जीवन में प्रगति का मार्ग कभी सीधा और सरल नहीं होता। यह उतार-चढ़ाव, संघर्ष और अनुभवों से होकर गुजरता है। अक्सर समाज में गलती को विफलता का पर्याय मान लिया जाता है, जबकि वास्तविकता यह है कि गलती ही वह शिक्षक है जो मनुष्य को सही दिशा की ओर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। जो व्यक्ति गलतियों से डरकर प्रयास करना छोड़ देता है, वह कभी नई ऊँचाइयों तक नहीं पहुँच पाता। इसलिए यह समझना आवश्यक है कि गलतियाँ जीवन की असफलता नहीं, बल्कि प्रगति की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। जब कोई व्यक्ति नया कार्य करने का प्रयास करता है, तब उससे गलती होना स्वाभाविक है। दरअसल, गलती यह संकेत देती है कि हम कुछ नया सीखने की प्रक्रिया में हैं। अगर कोई व्यक्ति जीवन में कभी गलती नहीं करता, तो इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि उसने कभी नया करने का साहस ही नहीं किया। इतिहास गवाह है कि जिन महान लोगों ने दुनिया को नई दिशा दी, उन्होंने अपने जीवन में कई बार असफलताओं और गलतियों का सामना किया, लेकिन उन गलतिय...

जनसंख्या नियंत्रण कानून में बदलाव — दूरदर्शिता का अभाव या राजनीतिक मजबूरी?

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 संपादकीय@10.03.2026  *जनसंख्या नियंत्रण कानून में बदलाव — दूरदर्शिता का अभाव या राजनीतिक मजबूरी?*  राजस्थान की पंचायत राज व्यवस्था में हाल ही में किया गया एक  संशोधन प्रदेश की राजनीति और समाज में नई बहस को जन्म दे रहा है। राज्य सरकार ने पंचायत राज अधिनियम में बदलाव करते हुए यह प्रावधान समाप्त कर दिया है कि दो से अधिक संतान वाले व्यक्ति पंचायत राज संस्थाओं के चुनाव नहीं लड़ सकते। यह संशोधन विधानसभा में पारित हो चुका है, लेकिन इसके पीछे की मंशा और इसके संभावित सामाजिक प्रभावों को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े हो रहे हैं। यह नियम लगभग तीन दशक पहले तत्कालीन सरकार के समय लागू किया गया था। उस समय प्रदेश में तेजी से बढ़ती जनसंख्या को नियंत्रित करने के लिए इसे एक सामाजिक प्रयोग के रूप में देखा गया था। इस कानून का मूल उद्देश्य यह था कि जो व्यक्ति गांव और समाज का नेतृत्व करना चाहता है, वह पहले स्वयं परिवार नियोजन की जिम्मेदारी को समझे और उसका पालन करे। यह एक प्रकार का नैतिक संदेश भी था कि जनप्रतिनिधि समाज के लिए आदर्श प्रस्तुत करें। समय के साथ यह नियम पंचायत चुनावों की ए...

महंगाई और शिक्षा का संकट: गरीबों के सपनों पर बढ़ता बोझ

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संपादकीय@07.03.2026 *महंगाई और शिक्षा का संकट: गरीबों के सपनों पर बढ़ता बोझ* आज के आधुनिक युग में शिक्षा को सफलता की सबसे महत्वपूर्ण कुंजी माना जाता है। यह केवल व्यक्ति के जीवन को दिशा देने का माध्यम ही नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के विकास की आधारशिला भी है। किंतु वर्तमान समय की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यही शिक्षा धीरे-धीरे गरीब और वंचित वर्ग की पहुँच से दूर होती जा रही है। बढ़ती महंगाई और शिक्षा के बढ़ते व्यवसायीकरण ने इस समस्या को और अधिक गंभीर बना दिया है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। पिछले कुछ वर्षों में महंगाई ने आम आदमी की आर्थिक स्थिति को बुरी तरह प्रभावित किया है। आटा, दाल, तेल, सब्जी, गैस और ईंधन जैसी दैनिक उपयोग की वस्तुओं की कीमतों में लगातार वृद्धि हो रही है। एक सामान्य मजदूर या निम्न आय वर्ग के परिवार की आय का बड़ा हिस्सा केवल दो वक्त की रोटी जुटाने में ही खर्च हो जाता है। ऐसे में स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी आवश्यकताएँ धीरे-धीरे परिवार की प्राथमिकताओं से पीछे छूटती चली जाती हैं। गरीब अभिभावकों के सामने सबसे बड़ी दुविधा यह होती है कि वे सीम...

शब्दों की शक्ति – विनाश भी, उपचार भी

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संपादकीय@08.03.2026 शब्दों की शक्ति – विनाश भी, उपचार भी मनुष्य को अन्य प्राणियों से अलग पहचान देने वाली सबसे बड़ी विशेषता उसकी वाणी है। विचारों को शब्दों के माध्यम से व्यक्त करने की क्षमता ही मनुष्य को सामाजिक और संवेदनशील बनाती है। लेकिन यही वाणी यदि संयम और संवेदनशीलता से रहित हो जाए तो वह संबंधों में दरार पैदा कर सकती है। कहा भी गया है कि “बाण से हुआ घाव भर सकता है, लेकिन वाणी से हुआ घाव अक्सर जीवन भर नहीं भरता।” यही कारण है कि शब्दों की शक्ति को समझना और उनका सही उपयोग करना आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गया है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। समाज में अक्सर यह देखा जाता है कि लोग क्रोध या आवेश में आकर ऐसे शब्द बोल देते हैं, जो सामने वाले के आत्मसम्मान को गहरी चोट पहुँचा देते हैं। तलवार से लगा घाव समय के साथ भर सकता है, लेकिन अपमानजनक शब्दों से लगा मानसिक घाव लंबे समय तक मनुष्य के मन में टीस बनकर बना रहता है। कई बार तो यही कड़वे शब्द रिश्तों के टूटने का कारण बन जाते हैं। वर्षों से बने विश्वास और अपनत्व का रिश्ता भी एक पल में बिखर सकता है। आज के दौर में ज...