मेरे पिता—संस्कार, संघर्ष और सत्य का जीवंत विद्यालय
संपादकीय@ हरेश पंवार 23.03.2026 *“मेरे पिता—संस्कार, संघर्ष और सत्य का जीवंत विद्यालय”* मनुष्य के जीवन में कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जो केवल संबंध नहीं बल्कि संपूर्ण जीवन-दर्शन बन जाते हैं। मेरे लिए मेरे पिता ऐसे ही एक आदर्श, एक प्रेरणा और एक जीवंत पाठशाला थे। वे भले ही औपचारिक रूप से अधिक पढ़े-लिखे नहीं थे, लेकिन जीवन के गूढ़तम ज्ञान, सामाजिक समझ और व्यवहारिक विज्ञान में उनकी पकड़ अद्भुत थी। उन्होंने कभी बड़ी-बड़ी किताबों का हवाला नहीं दिया, बल्कि अपने अनुभवों और सरल शब्दों में जो शिक्षा दी, वही मेरे जीवन की सबसे बड़ी पूंजी बन गई। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। मेरे पिता कहा करते थे—“पढ़ाई ऐसी चीज है जो कभी बंटती नहीं, जितनी बांटो उतनी बढ़ती है।” यह एक साधारण वाक्य नहीं, बल्कि जीवन का वह मूलमंत्र है जिसने मुझे शिक्षा के प्रति समर्पित किया। उन्होंने हमें यह नहीं सिखाया कि केवल डिग्रियां हासिल करनी हैं, बल्कि यह सिखाया कि ज्ञान को आत्मसात करना है और उसे समाज के हित में उपयोग करना है। वे परिश्रम के उपासक थे। उनका मानना था—“मेहनत इतनी खामोशी से करो कि सफलता खुद...