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Showing posts from August, 2024

सरकारी नौकरी के प्रति आकर्षण

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संपादकीय  सरकारी नौकरी में व्यक्ति अपने आप को सबसे ज्यादा सुरक्षित समझता है। इसलिए सरकारी नौकरी पाने के लिए अच्छी खासी भीड़ हर प्रकार की वैकेंसी में देखी जा सकते हैं और सरकारी नौकरी पानी के लिए इस भीड़ के हिस्से में केवल बेरोजगारी नहीं है बल्कि प्राइवेट सेक्टर में काम कर रहे युवक भी अपने भाग्य की लकीरों को आजमाना चाहते हैं। प्राइवेट सेक्टर की जो यातनाओं को झेलना पड़ता है। शायद उसे आहत होकर युवक सरकारी नौकरी पाना चाहता है। सामाजिक रिश्तों में विवाह के लिए दूल्हा दुल्हन की तलाश में चार गोत्र टालने की परंपरा के साथ पंचम गोत्र सरकारी नौकरी की आवश्यकता प्राथमिक रहती है। सरकारी नौकरी का दवा सर्वगुण संपन्न है या नहीं कोई महीना नहीं रखता है विवाह के पक्ष कला का चरित्र आचरण अच्छा है या नहीं है कोई नहीं मैन रखना लेकिन सरकारी नौकरी है तो उसके वारे निवारे हैं। सरकारी नौकरी पाने वाले भीड़ के आलम को देखकर मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।  सरकारी नौकरी के प्रति लगाव का बढ़ते जाना जहां स्वाभाविक है, वहीं विचारणीय भी है। देश में अगर कहीं भी कोई सरकारी भर्ती निकल रही है, तो वहा...

सरकारी नौकरी के प्रति आकर्षण@Haresh panwar

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संपादकीय  सरकारी नौकरी में व्यक्ति अपने आप को सबसे ज्यादा सुरक्षित समझता है। इसलिए सरकारी नौकरी पाने के लिए अच्छी खासी भीड़ हर प्रकार की वैकेंसी में देखी जा सकते हैं और सरकारी नौकरी पानी के लिए इस भीड़ के हिस्से में केवल बेरोजगारी नहीं है बल्कि प्राइवेट सेक्टर में काम कर रहे युवक भी अपने भाग्य की लकीरों को आजमाना चाहते हैं। प्राइवेट सेक्टर की जो यातनाओं को झेलना पड़ता है। शायद उसे आहत होकर युवक सरकारी नौकरी पाना चाहता है। सामाजिक रिश्तों में विवाह के लिए दूल्हा दुल्हन की तलाश में चार गोत्र टालने की परंपरा के साथ पंचम गोत्र सरकारी नौकरी की आवश्यकता प्राथमिक रहती है। सरकारी नौकरी का दवा सर्वगुण संपन्न है या नहीं कोई महीना नहीं रखता है विवाह के पक्ष कला का चरित्र आचरण अच्छा है या नहीं है कोई नहीं मैन रखना लेकिन सरकारी नौकरी है तो उसके वारे निवारे हैं। सरकारी नौकरी पाने वाले भीड़ के आलम को देखकर मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।  सरकारी नौकरी के प्रति लगाव का बढ़ते जाना जहां स्वाभाविक है, वहीं विचारणीय भी है। देश में अगर कहीं भी कोई सरकारी भर्ती निकल रही है, तो वहा...

राजनीतिक गलियारे में पेंशन योजना

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संपादकीय- राजनीतिक दंगल में बहुत से मुद्दे चुनाव स्टंट करने के काम करते हैं जिसमें भारतीय परिपेक्ष में पेंशन योजना भी एक महत्वपूर्ण राजनीतिक दखलअंदाजी का महत्वपूर्ण पाठ है। अब हाल ही में हरियाणा व जम्मू कश्मीर में चुनाव है वही सियासी गलियारे में पेंशन योजना पुरानी स्कीम और नई स्कीम की तुलना में राजनीतिक गलियारे में पेंशन योजना जबरदस्त उछाल पर है। पेंशन योजना के लागू करने से देश की अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा आए जरा जानते हैं। बेशक भारत की अर्थव्यवस्था विश्व में सबसे तेज गति से बढ़ रही है, लेकिन यह इतनी भी नहीं है कि हम 2047 में ‘विकसित भारत’ का सपना साकार कर सकें। अब यूपीएस में भारत सरकार 18.5 फीसदी का योगदान देगी, जबकि पहले यह हिस्सा 14 फीसदी का था। यह भी अतिरिक्त बोझ है। यह राशि पेंशन के तौर पर एक बहुत छोटे श्रम-बल पर खर्च की जानी है। पेंशन हमारी व्यवस्था की परंपरा रही है कि जिस कर्मचारी ने जीवन के 25-30 साल सरकार को दिए हैं, उसका बुढ़ापा ‘सुनिश्चित’ होना चाहिए। यह अंजाम भी सरकार और देश को भुगतना पड़ेगा पेंशन योजना की राजनीतिक दृष्टिकोण पर मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि ...