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Showing posts from April, 2025

श्रम की साधना: जिनके हाथों से सपने आकार लेते हैं"

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*संपादकीय:*  1 मई 2025  *"श्रम की साधना: जिनके हाथों से सपने आकार लेते हैं"*  "श्रम वह शक्ति है जो बंजर भूमि को हरियाली में बदल देती है, जो सपनों को हकीकत में गढ़ती है, और जो मानव सभ्यता को निरंतर आगे बढ़ाती है।" हर वर्ष 1 मई को मजदूर दिवस मनाया जाता है — न सिर्फ एक औपचारिकता के रूप में, बल्कि श्रम की महत्ता और श्रमिकों के योगदान को सलाम करने के लिए। यह दिन हमें याद दिलाता है कि सभ्यता की ऊंची इमारतें, तरक्की के पुल और विकास की राहें उन्हीं हाथों ने गढ़ी हैं, जिन पर अक्सर मेहनत की कठोर रेखाएं उकेरी होती हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। मजदूर दिवस का उद्देश्य केवल अवकाश या समारोह नहीं है, बल्कि एक चेतना है — श्रमिकों के अधिकारों की सुरक्षा, सम्मानजनक जीवन, न्यायोचित मजदूरी और बेहतर कार्य परिस्थितियों की वकालत करना। आज जब दुनिया नयी टेक्नोलॉजी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की ओर बढ़ रही है, तब भी श्रमिक वर्ग की भूमिका अपरिवर्तित है। कोई भी तकनीक उनकी कर्मठता और समर्पण को पूरी तरह प्रतिस्थापित नहीं कर सकती। समाज और नीति-निर्माताओं का यह नैतिक दायित्...

तकनीक और मानवीय संवेदनाएँ

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संपादकीय: 29 अप्रैल 2025  *तकनीक और मानवीय संवेदनाएँ*  आज हम जिस युग में साँस ले रहे हैं, वह तकनीक के चरम विकास का काल है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, सोशल मीडिया और डेटा एनालिटिक्स ने मानव जीवन को असंभव लगने वाले ढंग से सरल बना दिया है। परंतु इसी चकाचौंध में एक चिंता गहरी होती जा रही है — क्या तकनीक हमें मानवीय संवेदनाओं से दूर कर रही है? यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। जहाँ एक ओर तकनीक ने दुनिया को जोड़ने का दावा किया, वहीं दूसरी ओर व्यक्तिगत संवाद में दूरी भी बढ़ी है। आज लोग अपने नजदीकी संबंधों की बजाय वर्चुअल मित्रताओं पर अधिक निर्भर हो रहे हैं। मशीनों पर बढ़ती निर्भरता ने संवेदनशीलता, करुणा और सहअस्तित्व की भावना को धीमा कर दिया है। समस्या तकनीक में नहीं, उसके अंधाधुंध और असंतुलित उपयोग में है। आवश्यकता इस बात की है कि हम तकनीकी विकास के साथ मानवीय मूल्यों की रक्षा भी करें। हमें ऐसी तकनीक गढ़नी चाहिए जो न केवल सुविधाएं दे, बल्कि सामाजिक बंधनों को भी प्रगाढ़ करे। आज हम एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुके हैं, जहां तकनीक ने हमारे जीवन का हर पहलू बदल ...

पहलगाम की चीख: क्या अब भी हम नहीं जागेंगे?

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संपादकीय  27 अप्रैल 2025।   *पहलगाम की चीख: क्या अब भी हम नहीं जागेंगे?*  पहलगाम... जहां बर्फ की सफेदी भी आज लहू के धब्बों से दागदार है। जहां खुशियों की चहकती आवाजें अब सिसकियों में बदल चुकी हैं। जहां जिंदगी कुछ देर और इंतजार कर सकती थी — काश, अगर सुरक्षा होती, काश अगर समय पर मदद पहुंचती। जरूर यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे बोलता है। आज सरकार ने पहली बार अपनी गलती मानी है। यह साहस का नहीं, जिम्मेदारी का पहला कदम है। लेकिन क्या इतना ही काफी है? क्या हम सिर्फ गलती स्वीकार कर के आगे बढ़ जाएंगे, जैसे कुछ हुआ ही नहीं? जनवरी 2025 तक दो यूनिट CRPF की तैनाती वहां थी। किसने हटाया उन्हें? क्यों हटाया जब इनपुट मौजूद थे? कौन है इस निर्णय का जिम्मेदार? इन सवालों के जवाब आज हर भारतीय नागरिक जानना चाहता है — क्योंकि कल को यह लापरवाही किसी और के घर उजाड़ सकती है, किसी और मां की गोद सूनी कर सकती है। सबसे दुखद पहलू ये है कि कुछ लोगों को अगर समय पर इलाज मिला होता, तो वे आज भी जिंदा होते। डेढ़ घंटे तक न कोई एंबुलेंस पहुँची, न कोई राहत। क्या हमारी संवेदनाएं भी इस कदर मर चुकी ह...

पहलगाम की त्रासदी: आतंक की छाया में खोता पर्यटन और सुरक्षा पर उठते सवाल

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संपादकीय  26 अप्रैल 2025 *"पहलगाम की त्रासदी: आतंक की छाया में खोता पर्यटन और सुरक्षा पर उठते सवाल"*  जम्मू-कश्मीर के सुरम्य पहाड़ी स्थल पहलगाम में हाल ही में घटित आतंकवादी हमले ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। इस हमले में न केवल देश के वीर नागरिक बलिदान हुए, बल्कि उन निर्दोष पर्यटकों की भी जान गई, जो केवल प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लेने वहाँ पहुँचे थे। यह घटना केवल एक आतंकी हमला नहीं, बल्कि राष्ट्र की सुरक्षा व्यवस्था, आंतरिक खुफिया तंत्र और सामाजिक मनोबल पर गहरी चोट है। यदि मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। पहलगाम, जो अब तक एक शांत पर्यटक स्थल के रूप में प्रसिद्ध था, आज दहशत, आंसू और लहू की धरती बन गया है। इस हमले ने यह स्पष्ट कर दिया कि आतंकवाद अब केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहा, वह उन स्थानों को भी अपना निशाना बना रहा है जो आमजन की शांति, उत्सव और सौंदर्य से जुड़े हैं।  *मृत पर्यटकों के प्रति राष्ट्र की संवेदना*  सबसे पहले, इस दुर्भाग्यपूर्ण हमले में जान गंवाने वाले सभी निर्दोष पर्यटकों को श्रद्धांजलि और उनके परिजनों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करना...

डिग्रीधारी चपरासी – भारत के युवाओं की मजबूरी या सिस्टम की विफलता?"

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संपादकीय 25 अप्रैल 2025   *"डिग्रीधारी चपरासी – भारत के युवाओं की मजबूरी या सिस्टम की विफलता?"*  भारत को विश्व का सबसे युवा देश कहा जाता है। लेकिन इसी युवा भारत की सबसे बड़ी त्रासदी आज उसकी बेरोजगारी बन गई है। एक हालिया उदाहरण ने इस सच्चाई को फिर से उजागर कर दिया है – राजस्थान में चपरासी की मात्र 53,749 भर्तियों के लिए 24 लाख 76 हजार से अधिक युवाओं ने आवेदन किया। इनमें MBA, PHD, MA, MSc, MCA, M.Ed, B.Ed और यहां तक कि कानून की पढ़ाई करने वाले अभ्यर्थी भी शामिल हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। यह सिर्फ एक आकड़ा नहीं है, यह उस टूटते हुए विश्वास की तस्वीर है, जो इस देश का युवा वर्षों से संजोए बैठा था – कि शिक्षा से नौकरी मिलेगी, नौकरी से सम्मान मिलेगा और सम्मान से भविष्य बनेगा। लेकिन आज वही युवा, जिनके कंधों पर राष्ट्र निर्माण की जिम्मेदारी थी, सरकारी इमारतों में चाय और फाइलें उठाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।  *83% बेरोजगारी में युवा – क्या यही था वादा?*  एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत के बेरोजगारों में 83% हिस्सेदारी युवाओं की है। यह आँकड़ा चौ...

अनकहे शब्द: रिश्तों में तनाव का एक अनदेखा कारण

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संपादकीय  23 अप्रैल 2025 *अनकहे शब्द: रिश्तों में तनाव का एक अनदेखा कारण* रिश्ते हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, और इनमें संचार एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब हम अपने विचारों और भावनाओं को व्यक्त करने से बचते हैं, तो यह रिश्तों में तनाव पैदा कर सकता है। अनकहे शब्द एक अदृश्य अवरोध पैदा करते हैं, जिससे गलतफहमी और नाराज़गी पैदा होती है। रोमांटिक रिश्तों में, खुले संचार की अनुपस्थिति उपेक्षा या त्याग की भावनाओं को जन्म दे सकती है। दोस्ती में, अनकहे शब्द दूरी पैदा कर सकते हैं और विश्वास को खत्म कर सकते हैं। जितना अधिक हम अपने विचारों और भावनाओं को रोक कर रखते हैं, खाई उतनी ही गहरी होती जाती है, जिससे विभाजन को पाटना और घावों को भरना मुश्किल हो जाता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। प्रेम अवश्य स्वतंत्र है, परंतु इसके प्रभाव में आने वाले ज्यादातर लोग इसके गुलाम बन जाते हैं। स्नेह अनकहे शब्दों का वह संसार होता है, जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है। अनकहे शब्द रिश्तों में तनाव पैदा कर सकते हैं, जिससे संचार में कमी आ सकती है। जब हम अपनी ज़रूरतों, चिंताओं ...

समय, आत्मविवेक और सफलता की अकेली राह

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संपादकीय  22 अप्रैल 2025।  *समय, आत्मविवेक और सफलता की अकेली राह* जीवन एक बहती हुई नदी की तरह है, जो बिना रुके, बिना थके अपनी दिशा में बहती चली जाती है। इस जीवन-यात्रा में समय सबसे मूल्यवान साथी है, लेकिन यही समय सबसे बड़ा शिक्षक भी है। यह कभी किसी के लिए नहीं रुकता, और ना ही किसी के कहने पर पलटकर आता है। जो समय की गति को समझ गया, उसने जीवन के कई रहस्यों को जान लिया। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। हमारे बड़े-बुज़ुर्ग यूं ही नहीं कहा करते थे कि बल और धन का अहंकार नहीं करना चाहिए। जिस तरह पेड़ पर लगे फल को नीचे गिरने में एक क्षण भी नहीं लगता, वैसे ही जीवन की स्थिरता भी क्षण में अस्थिर हो सकती है। बल और धन, दोनों ही समय के अधीन हैं। जिस दिन समय साथ छोड़ दे, उस दिन सबसे ताकतवर और सबसे अमीर व्यक्ति भी असहाय हो जाता है। इसलिए हमें कभी अपने सामर्थ्य या अपनी संपत्ति का घमंड नहीं करना चाहिए, क्योंकि ये सब कुछ समय की देन है — और समय ही इन्हें वापस ले भी सकता है। जीवन में सुख और दुःख दोनों आते हैं, परंतु हमारी मानसिकता यह तय करती है कि हम किसे पकड़कर बैठते हैं। यद...

अंबेडकर की मशाल: अतीत की लौ, वर्तमान का रास्ता"

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संपादकीय  14 April 2025  *"अंबेडकर की मशाल: अतीत की लौ, वर्तमान का रास्ता"*  भारत रत्न डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर केवल एक संविधान निर्माता नहीं थे, वे एक विचार थे, जो आज भी जीवित है – और प्रासंगिक भी। उनका जीवन संघर्ष और उनके विचार आज के भारत में एक दिशा-संकेतक की तरह हैं, जो हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा हैं जो अन्याय, असमानता और अंधविश्वास के अंधेरे में घिरा हुआ है। मैं यहां बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। बाबासाहेब अंबेडकर संघर्ष की मिसाल थे जहां मिट्टी में जन्मे, वहीं इतिहास गढ़ा डाला। एक अस्पृश्य माने जाने वाले समुदाय में जन्मे डॉ. आंबेडकर ने बचपन में जो अपमान सहा, उसने उन्हें तोड़ा नहीं, बल्कि एक नई चेतना दी। उन्होंने अपने आत्मसम्मान के साथ कभी समझौता नहीं किया, चाहे स्कूल के बाहर पानी पीने का अधिकार हो या उच्च शिक्षा के लिए संघर्ष। कोलंबिया यूनिवर्सिटी और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स जैसे विश्व प्रसिद्ध संस्थानों से डिग्रियाँ लेकर लौटे आंबेडकर ने देश के सबसे वंचित तबकों के लिए न्याय की आवाज़ बनकर खड़े होना चुना। उनके संघर्ष ने उन्हें "संविधान शिल्पी" ह...

टकराव नहीं, संवाद है समाधान

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संपादकीय  20 अप्रैल 2025 *“टकराव नहीं, संवाद है समाधान”* जहाँ एक ओर यह कहा जाता है कि परिवार जीवन का अभिन्न अंग है और वहाँ प्रेम, सुरक्षा व अपनापन मिलता है, वहीं यह भी मानना चाहिए कि हर इंसान एक स्वतंत्र सोच रखने वाला व्यक्ति है। हर सदस्य की भावनाएँ, इच्छाएँ और अपेक्षाएँ अलग-अलग हो सकती हैं, और जब ये अपेक्षाएँ पूरी नहीं होतीं, तो टकराव स्वाभाविक हो जाता है। उपरोक्त विचार में यह माना गया है कि परिवार में यदि कोई आपसे नाराज हो जाए तो आपको चुप रहकर सुनना चाहिए और अपनी गलती स्वीकार कर लेनी चाहिए। लेकिन क्या यह जरूरी है कि हर बार गलती हमारी ही हो? क्या आत्म-सम्मान की बलि देकर शांति खरीदना उचित है? हमारा मानना है कि किसी भी रिश्ते को मजबूत बनाने के लिए संवाद सबसे आवश्यक है, न कि चुप्पी या केवल सहनशीलता। यदि आप हमेशा झुकते रहेंगे, तो एक दिन आपकी आत्मा ही थक जाएगी। परिवार के हर सदस्य को अपनी बात कहने, समझे जाने और सम्मान पाने का हक है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।  परिवार जीवन का अभिन्न अंग होता है, जहां बिना शर्त प्रेम, सुरक्षा और अधिकार आदि ऐसी चीजें मिलती ...

आत्म-साक्षात्कार की ओर बढ़ते कदम

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संपादकीय - 15 April 2015 *आत्म-साक्षात्कार की ओर बढ़ते कदम* *ध्यान, योग, ज्ञान, साधना, चेतन, प्रज्ञा और मोक्ष का क्रमिक विकास* आत्म-साक्षात्कार एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जो व्यक्ति को अपने बारे में गहराई से समझने और अपने जीवन को बेहतर बनाने में मदद करती है।आत्म-मुलाकात से व्यक्ति अपने बारे में अधिक जागरूक होता है, जिससे वह अपने विचारों, भावनाओं और व्यवहार को बेहतर ढंग से समझ पाता है।आत्म-मुलाकात से व्यक्ति आंतरिक शांति और संतुष्टि प्राप्त कर सकता है, क्योंकि वह अपने बारे में अधिक जागरूक होता है और अपने जीवन को बेहतर बना सकता है। आत्म-मुलाकात से व्यक्ति अपने निर्णय लेने की क्षमता में सुधार कर सकता है, क्योंकि वह अपने विचारों और भावनाओं को बेहतर ढंग से समझ पाता है। आत्म-मुलाकात से व्यक्ति अपने आत्म-विकास के लिए काम कर सकता है, क्योंकि वह अपने बारे में अधिक जागरूक होता है और अपने जीवन को बेहतर बना सकता है। आत्म-मुलाकात मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक है, क्योंकि यह तनाव और चिंता को कम करने में मदद कर सकता है और व्यक्ति को अधिक सकारात्मक और आशावादी बना सकता है। आत्म-मुलाकात...

जूठा भोजन: संस्कार, संयम और सम्मान का प्रतीक”

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संपादकीय 15 April 2015  *“जूठा भोजन: संस्कार, संयम और सम्मान का प्रतीक”*  भारत की सांस्कृतिक परंपराएं अत्यंत समृद्ध और गूढ़ अर्थों से परिपूर्ण हैं। इन परंपराओं में केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र के लिए व्यावहारिक और नैतिक दिशानिर्देश छिपे हैं। भोजन से जुड़ी मर्यादाएं भी इन्हीं में से एक हैं। “जैसा अन्न, वैसा मन” – यह कहावत बताती है कि अन्न केवल शरीर को नहीं, हमारे विचारों और कर्मों को भी प्रभावित करता है। इसलिए हमारे पूर्वजों ने भोजन को परम पवित्र माना है और इसके अपमान को पाप की श्रेणी में रखा है। या मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।  रामायण से प्रेरणा: जूठे भोजन का संकेत रामायण में वर्णित प्रसंग, जिसमें हनुमानजी रावण की रसोई में उसकी जूठी थाली देखकर उसकी मृत्यु निकट समझते हैं, केवल एक धार्मिक कथा नहीं बल्कि एक गहरा सांकेतिक संदेश है। यह दिखाता है कि जिनका जीवन असंयमित और अन्न का अपमान करने वाला होता है, उनका अंत निकट होता है। रावण जैसा शक्तिशाली राजा भी जब अन्न का सम्मान करना भूल गया, तो उसका विनाश निश्चित हो गया। भोजन का सम्मान: स्वास्थ्य, ...

पीड़ा परखने वाला ही असली जौहरी होता है"

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संपादकीय 11 अप्रैल 2025 महात्मा ज्योतिबा फुले जयंती।  *"पीड़ा परखने वाला ही असली जौहरी होता है"*  “हीरे की परख हर कोई नहीं कर सकता, और इंसान की पीड़ा समझना तो और भी दुर्लभ कला है। किसी के आँसू पढ़ लेना, उनके मौन में छिपा दर्द जान लेना—यही तो है इंसानियत की असली चमक।”आज के इस भागदौड़ भरे और स्वार्थ से भरे युग में लोग अक्सर दूसरों की हैसियत, कपड़े, सफलता और शोहरत पर ध्यान देते हैं, पर किसी की आंतरिक पीड़ा, उसकी मानसिक स्थिति या टूटी आत्मा पर शायद ही किसी की नज़र जाती है। हीरा चमकता है, लेकिन दर्द चुपचाप सहता है।हीरे की पहचान करने वाला जौहरी सम्मान पाता है क्योंकि वह कीमती चीज़ की क़द्र करता है। लेकिन जो किसी टूटे हुए दिल, बिखरे मन और पीड़ा से भरे जीवन को समझने की कोशिश करता है—वह समाज का सबसे मूल्यवान व्यक्ति होता है। किसी की मुस्कान के पीछे छिपे आँसुओं को देख लेना, और बिना कहे किसी की तकलीफ़ को महसूस कर लेना, ये गुण बाज़ार में नहीं मिलते। ये संवेदनशीलता और मानवीयता के सबसे ऊंचे स्तर की निशानी हैं। हर मुस्कान के पीछे कहानी होती है। हम अक्सर लोगों को हंसते हुए देखते ...

बदले की आग नहीं, जीवन की रोशनी चुनिए

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संपादकीय  10 अप्रैल 2025  “बदले की आग नहीं, जीवन की रोशनी चुनिए” “एक बार जंगल में आग लग गई, सभी जानवर इधर-उधर भागने लगे। एक छोटी चिड़िया बार-बार अपनी चोंच में पानी भरकर आग बुझाने की कोशिश कर रही थी। एक शेर ने मज़ाक में पूछा – ‘तू इस छोटे से पानी से क्या आग बुझा पाएगी?’ चिड़िया बोली – ‘शायद आग न बुझे, लेकिन मेरी कोशिश में बदले की आग नहीं, जीवन बचाने की भावना है।’जहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। यही है सोच जो आज के इंसान को भी अपनानी चाहिए – बदले की आग में जलने से बेहतर है जीवन को रोशन करने की दिशा में आगे बढ़ना। बदला नहीं, बेहतर बनने का प्रयास करें। जब कोई हमें ठेस पहुंचाता है, हमारा आत्मसम्मान, विश्वास या भावनाएं चोटिल होती हैं, तो मन में प्रतिशोध की ज्वाला उठना स्वाभाविक है। लेकिन यही वह क्षण होता है जब हमें तय करना होता है कि हम 'प्रतिक्रिया देंगे या प्रगति करेंगे।' किसी ने आपको गिराया, और आपने भी उसे गिरा दिया – फिर आप दोनों में क्या फर्क रह गया? सच्ची समझदारी तो तब है जब आप उस चोट को प्रेरणा बना लें, और खुद को इतना ऊपर उठा लें कि वही लोग आपके क़दमों क...

सामाजिक समरसता को खंडित करने वाली राजनेताओं की ओछी हरकतें

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संपादकीय- 9 अप्रैल 2025।  *सामाजिक समरसता को खंडित करने वाली राजनेताओं की ओछी हरकतें*  हाल ही में रामनवमी के दिन प्रतिपक्ष नेता टीकाराम जूली के मंदिर प्रवेश पर भाजपा नेता ज्ञान देव आहूजा द्वारा गंगाजल छिड़कने और उससे जुड़ी असौभनीय टिप्पणी ने भारतीय लोकतंत्र और सामाजिक समरसता पर एक बार फिर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। यह घटना केवल एक राजनेता के अपमान तक सीमित नहीं, बल्कि यह भारतीय संविधान की आत्मा — सामाजिक समानता और अस्पृश्यता उन्मूलन — को सीधी चुनौती देती है। जिस देश में बाबा साहेब अंबेडकर ने अस्पृश्यता के खिलाफ संघर्ष कर संविधान की रचना की, वहां आज भी जातिवाद की छाया में राजनीति करना न केवल निंदनीय है बल्कि समाज को पीछे ले जाने वाला कृत्य भी है। यह घटना यह स्पष्ट करती है कि सत्ता की राजनीति अब भी सामाजिक भेदभाव के जहर से अछूती नहीं है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। राजनीति में वैचारिक मतभेद होना स्वाभाविक है, परंतु धार्मिक स्थलों को घृणा और अपमान का माध्यम बनाना भारतीय संस्कृति और लोकतंत्र दोनों के विरुद्ध है। मंदिर सभी के लिए हैं — आस्था, समानता और...

बदले की भावना से मुक्ति: जीवन की सच्ची जीत

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*संपादकीय:* 5 अप्रैल 2025  "बदले की भावना से मुक्ति: जीवन की सच्ची जीत" "जो जितना साथ चला उसका उतना शुक्रिया।" यह वाक्य हमें यह सिखाता है कि जीवन में हमें किसी से बदला लेने की जरूरत नहीं है। बदले की भावना ही बर्बादी की निशानी है। जीवन में हमें कई बार कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, और हमें लगता है कि हमें बदला लेना चाहिए। लेकिन बदले की भावना हमें और अधिक कठिनाइयों में डाल सकती है। इसके बजाय, हमें अपने जीवन को सकारात्मक और सार्थक बनाने पर ध्यान देना चाहिए। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। किसी से बदला लेने में समय व्यर्थ ना करें क्योंकि जो आप को चोट पहुंचाते हैं, वे अपने कर्म का स्वयं सामना करेंगे। बदले की भावना ही बर्बादी की निशानी है । अगर आपके साथ किसी ने बुरा किया और आपने भी बुरे का बदला बुरा ही किया तो आप दोनों में अंतर ही क्या हुआ ।इसलिए जो जितना साथ चला उसका उतना शुक्रिया। कहते हैं कि जिंदगी में समस्या का सरलता, सहजता से समाधान करना है, तो जीवन में संस्कार, व्यवहार व सम्मान के साथ नम्रता भी अपनाएं। कभी कोई कठिनाई नहीं आएगी। प्रतिशोध (बद...

जीवन की संघर्ष यात्रा और सफलता की परिभाषा

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*संपादकीय:* 4 अप्रैल 2025  "जीवन की संघर्ष यात्रा और सफलता की परिभाषा" जीवन एक संघर्ष यात्रा है, जिसमें हमें हर कदम पर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। लेकिन यह संघर्ष ही हमें मजबूत बनाता है और हमें सफलता की ओर ले जाता है। जा मैं बोलूंगा तो फिर तो बोलता है। जीवन का आरंभ और अंत संघर्ष से ही होता है । बच्चे को पहली बार सांस लेने के लिए संघर्ष करना होता है और मरते समय भी सांस की डोर न टूटे, इसके लिए संघर्ष करना पड़ता है । सभी अपनी अपनी तरह से संघर्षरत करते हैं और उनके बीच से अपने लिए लक्ष्य को हासिल करना इतना आसान नहीं होता जितना संघर्ष करते हुए प्राप्त किया जाता है। यह काम जीवन पर्यन्त चलता रहता है । संघर्ष तो जीवन के साथ ही समाप्त होता है।‌ सबक सिखना है तो मधुमक्खी से सीखिए, मधुमक्खी कठिन संघर्ष का जीवंत पर्याय है। वह छोटी सी काया अपने जीवनपर्यंत संघर्ष को स्वीकार करती है। अनुशासित तरीके से संघर्ष कर जीवन जीने की कला हमें मधुमक्खी से सीखनी चाहिए। वह दिन भर कठिन यात्राएं कर मधु इकठ्ठा करती है। उसका संघर्ष दिन खुलते ही प्रारंभ हो जाता है। हमें भी अपने जी...