जूठा भोजन: संस्कार, संयम और सम्मान का प्रतीक”

संपादकीय
15 April 2015

 *“जूठा भोजन: संस्कार, संयम और सम्मान का प्रतीक”* 
भारत की सांस्कृतिक परंपराएं अत्यंत समृद्ध और गूढ़ अर्थों से परिपूर्ण हैं। इन परंपराओं में केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र के लिए व्यावहारिक और नैतिक दिशानिर्देश छिपे हैं। भोजन से जुड़ी मर्यादाएं भी इन्हीं में से एक हैं। “जैसा अन्न, वैसा मन” – यह कहावत बताती है कि अन्न केवल शरीर को नहीं, हमारे विचारों और कर्मों को भी प्रभावित करता है। इसलिए हमारे पूर्वजों ने भोजन को परम पवित्र माना है और इसके अपमान को पाप की श्रेणी में रखा है। या मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। 

रामायण से प्रेरणा: जूठे भोजन का संकेत रामायण में वर्णित प्रसंग, जिसमें हनुमानजी रावण की रसोई में उसकी जूठी थाली देखकर उसकी मृत्यु निकट समझते हैं, केवल एक धार्मिक कथा नहीं बल्कि एक गहरा सांकेतिक संदेश है। यह दिखाता है कि जिनका जीवन असंयमित और अन्न का अपमान करने वाला होता है, उनका अंत निकट होता है। रावण जैसा शक्तिशाली राजा भी जब अन्न का सम्मान करना भूल गया, तो उसका विनाश निश्चित हो गया।
भोजन का सम्मान: स्वास्थ्य, समृद्धि और संतुलन का सूत्र है।
थाली में भोजन छोड़ना, विशेषकर जूठा भोजन छोड़ना, केवल संसाधनों की बर्बादी नहीं है, यह मां अन्नपूर्णा और मां लक्ष्मी का अपमान भी माना जाता है। इस कारण से आर्थिक संकट, अशांति और जीवन में असंतुलन उत्पन्न हो सकता है। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, ऐसा करने से शनि और चंद्रमा जैसे ग्रहों का कुप्रभाव भी जीवन पर पड़ता है, जिससे मानसिक तनाव, अवसाद और जीवन की दिशा भटक सकती है।
वर्तमान समय में बच्चों में अच्छे संस्कारों की आवश्यकता है।
आज के युग में बच्चों में यह देखने को मिलता है कि वे भोजन में रूचि नहीं लेते या थाली में बचा कर छोड़ देते हैं। यह आदत धीरे-धीरे उन्हें लापरवाह, असंयमी और अकृतज्ञ बना देती है। पढ़ाई में मन न लगना, अनुशासनहीनता और मानसिक भटकाव ऐसे ही संस्कारहीन आचरण के परिणाम हैं। इसलिए यह जरूरी है कि बच्चों को यह सिखाया जाए कि भोजन केवल पेट भरने का माध्यम नहीं, यह प्रकृति, किसान और ईश्वर के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर है।
आधुनिक जीवनशैली और जिम्मेदारी के दौर में तेजी से भागती आधुनिक जिंदगी में हम अक्सर “फास्ट फूड कल्चर” और भोजन की बर्बादी को सामान्य मानने लगे हैं। रेस्त्रां, विवाह या पार्टियों में थालियां आधी भरी रहती हैं और फिर कूड़ेदान में चली जाती हैं। यह व्यवहार न केवल संसाधनों की बर्बादी है, बल्कि भूखे लोगों का भी अपमान है। आज जब दुनिया के करोड़ों लोग भूखे सोते हैं, तब हमारी थाली का एक-एक दाना अमूल्य हो जाता है।
ऐसी मान्यता है कि यात्रा के दौरान जूठा भोजन फेंकना शुभ नहीं होता। ऐसा करने से कार्यों में अड़चनें आती हैं, योजनाएं बिगड़ती हैं और सफलता दूर होती जाती है। यह आस्था केवल डराने वाली बात नहीं, बल्कि इस बात की याद दिलाती है कि हर जगह, हर स्थिति में हमें भोजन का आदर बनाए रखना चाहिए।
भोजन का सम्मान करना नैतिक शिक्षा और समाज के प्रति उत्तरदायित्व है।भोजन के प्रति सम्मान हमारे सामाजिक और पारिवारिक संस्कारों की नींव है। जब कोई बच्चा भोजन का आदर करता है, तो वह जिम्मेदारी और करुणा जैसे गुण भी अपने भीतर विकसित करता है। ऐसे व्यक्ति समाज में संतुलन, सहयोग और सम्मान का वातावरण बनाते हैं।
भोजन के प्रति श्रद्धा केवल एक धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है। "बहुत बढ़िया, खाओ मण भर – छोड़ो न कण भर" और "उतना ही लो थाली में – व्यर्थ न जाए नाली में" जैसे भावपूर्ण वाक्य हमें बार-बार याद दिलाते हैं कि संयम, संतुलन और संतोष ही सच्चे सुख का मूल है।
आइए, हम अपने जीवन में इस विचार को आत्मसात करें और अगली पीढ़ी को भी यह सिखाएं कि भोजन का सम्मान, जीवन का सम्मान है। जितना चाहिए उतना ही लें, और उसे पूरे मन से ग्रहण करें—यही हमारे पूर्वजों की सीख है, और यही हमारा कर्तव्य भी।

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