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Showing posts from May, 2026

एक कटोरा पानी, एक मुट्ठी दाना: करुणा, समझ और सह-अस्तित्व की पुकार

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संपादकीय@हरेश पंवार #02-05-2026 *“एक कटोरा पानी, एक मुट्ठी दाना: करुणा, समझ और सह-अस्तित्व की पुकार”* तपती धूप, लू के थपेड़े और सूखते जल स्रोत—यह केवल इंसानों के लिए नहीं, बल्कि धरती पर बसे हर जीव के लिए चुनौती का समय है। ऐसे में सबसे ज्यादा प्रभावित वे पक्षी होते हैं, जिनका जीवन पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर है। खेत-खलिहान सूख रहे हैं, जंगल सिमट रहे हैं और शहरों का फैलाव उनके प्राकृतिक घरों को निगलता जा रहा है। परिणामस्वरूप, एक बूंद पानी और एक दाने की तलाश में भटकते पक्षी अब हमारे घरों की छतों की ओर आशा भरी नजरों से देखते हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। इस संदर्भ में एक गंभीर सामाजिक भ्रम भी सामने आता है—हम पक्षियों को “बेजुबान” कह देते हैं। यह शब्द न केवल गलत है, बल्कि हमारी समझ की सीमाओं को भी उजागर करता है। पक्षी बेजुबान नहीं हैं, उनकी अपनी एक समृद्ध और सजीव भाषा है, जिसे हम “मानवेत्तर भाषा” कह सकते हैं। उनकी चहचहाहट, पुकार, स्वर और व्यवहार—सब कुछ संवाद का हिस्सा है। वे अपने समूह को खतरे की सूचना देते हैं, साथी को बुलाते हैं, बच्चों को सिखाते हैं और अपने भा...

“टूटते रिश्तों की चीख: जब परिवार की जड़ें ही होने लगीं कमजोर”

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संपादकीय@हरेश पंवार #01-05-2026 *“टूटते रिश्तों की चीख: जब परिवार की जड़ें ही होने लगीं कमजोर”* समाज की सबसे मजबूत इकाई परिवार होता है। यही वह आधार है, जिस पर सभ्यता, संस्कार और सामाजिक संतुलन टिका रहता है। लेकिन आज का समय एक चिंताजनक सच्चाई सामने ला रहा है—परिवार की जड़ों में दरारें पड़ रही हैं, और रिश्तों की पवित्रता धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। जो परिवार कभी प्रेम, विश्वास और त्याग का प्रतीक हुआ करता था, आज वही संदेह, स्वार्थ और हिंसा का केंद्र बनता दिखाई दे रहा है। मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। हाल के वर्षों में सामने आई घटनाएँ समाज को झकझोर देने वाली हैं। भाई द्वारा भाई की हत्या, पति-पत्नी के बीच क्रूर हिंसा, और पारिवारिक विवादों का खौफनाक रूप लेना—ये केवल अपराध नहीं हैं, बल्कि यह हमारे सामाजिक ढांचे के विघटन का संकेत हैं। सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या बदल गया है, जिसने रिश्तों को इतना कमजोर और खतरनाक बना दिया? एक बड़ा कारण है—आभासी दुनिया का बढ़ता प्रभाव। आज हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सोशल मीडिया के युग में जी रहे हैं, जहाँ जानकारी की कोई कमी नहीं है, लेकिन ...