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Showing posts from May, 2026

रिश्तों की असली पूंजी: तालमेल और समझौते का संतुलन

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संपादकीय@हरेश पंवार -01-06-2026 *रिश्तों की असली पूंजी: तालमेल और समझौते का संतुलन* आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि सुविधाएं बढ़ती जा रही हैं, लेकिन रिश्तों में दूरियां भी उसी गति से बढ़ रही हैं। परिवार छोटे होते जा रहे हैं, संवाद कम होता जा रहा है और अहंकार का दायरा बढ़ता जा रहा है। ऐसे समय में हमारे बुजुर्गों द्वारा कही गई एक साधारण-सी बात जीवन का बड़ा दर्शन प्रस्तुत करती है कि “परिवार, समाज और किसी भी रिश्ते को निभाने की कला में तालमेल और समझौता दो सबसे बड़े स्तंभ हैं।” यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है ‌ रिश्ते केवल खून के संबंधों से नहीं चलते, बल्कि भावनाओं, विश्वास और परस्पर सम्मान से संचालित होते हैं। यदि जीवन को एक रथ माना जाए तो रिश्ते उसके पहिए हैं और तालमेल व समझौता उन पहियों को संतुलित रखने वाले आधार। इनके बिना जीवन का सफर कठिन और असंतुलित हो जाता है। आज अधिकांश विवादों की जड़ यह नहीं होती कि लोग एक-दूसरे से प्रेम नहीं करते, बल्कि समस्या यह होती है कि वे अपनी बात को ही अंतिम सत्य मान लेते हैं। हर व्यक्ति चाहता है कि सामने वाला उसकी भावनाओं को स...

उज्ज्वला की लौ क्यों पड़ गई मंद? महंगाई, गैस संकट और गांव की रसोई का बदलता सच

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 संपादकीय@हरेश पंवार -31-05-2026 *उज्ज्वला की लौ क्यों पड़ गई मंद? महंगाई, गैस संकट और गांव की रसोई का बदलता सच* भारत में जब प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना की शुरुआत हुई थी, तब इसे ग्रामीण महिलाओं के जीवन में एक क्रांतिकारी बदलाव के रूप में प्रस्तुत किया गया। वर्षों से चूल्हे के धुएँ में जीवन बिताने वाली महिलाओं को स्वच्छ ईंधन उपलब्ध कराने का सपना दिखाया गया। उस समय यह कहा गया था कि अब गरीब परिवारों की माताओं और बहनों की आँखों में धुएँ के आँसू नहीं आएँगे। लाखों परिवारों को निःशुल्क गैस कनेक्शन और चूल्हे उपलब्ध कराए गए। यह एक सराहनीय पहल थी, जिसने ग्रामीण भारत की रसोई तक आधुनिक सुविधा पहुँचाई। लेकिन यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। किसी भी कल्याणकारी योजना की सफलता केवल उसके शुभारंभ से नहीं, बल्कि उसकी दीर्घकालिक उपयोगिता और आमजन तक पहुंच से तय होती है। एक समय था जब प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना को ग्रामीण भारत की महिलाओं के जीवन में क्रांतिकारी बदलाव लाने वाली योजना के रूप में प्रस्तुत किया गया था। धुएं से भरी रसोई, जलती आंखें और लकड़ी-उपलों के बीच संघर्ष करती महिल...

भाषणों में विश्वगुरु, जमीन पर आर्थिक मजबूरी : क्या हमारी विदेश नीति और आर्थिक प्रबंधन सवालों के घेरे में हैं?”

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 संपादकीय @हरेश पंवार 30-05-2026 *“भाषणों में विश्वगुरु, जमीन पर आर्थिक मजबूरी : क्या हमारी विदेश नीति और आर्थिक प्रबंधन सवालों के घेरे में हैं?”* भारत आज वैश्विक मंचों पर स्वयं को एक उभरती हुई महाशक्ति और “विश्वगुरु” के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा है। बड़े-बड़े अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भारत की विदेश नीति की सफलता के दावे किए जाते हैं, लेकिन दूसरी ओर जब यूक्रेन-रूस युद्ध जैसे क्षेत्रीय संघर्ष का असर भारत की आम जनता की रसोई, जेब और जीवनशैली पर सीधा दिखाई देने लगे, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या हमारी आर्थिक और विदेश नीति वास्तव में उतनी मजबूत है, जितना उसका प्रचार किया जाता है? यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। यूक्रेन और रूस के बीच चल रहे युद्ध ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है। भारत भी इससे अछूता नहीं रहा। पेट्रोल-डीजल की कीमतों में अस्थिरता, रसोई गैस के बढ़ते दाम, खाद्य पदार्थों की महंगाई और डॉलर के मुकाबले रुपये की लगातार कमजोर होती स्थिति ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि सरकार स्वयं जनता से...

अंतिम सफर में पद नहीं, रिश्ते साथ चलते हैं

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 संपादकीय@ हरेश पंवार # 28मई 2026 *अंतिम सफर में पद नहीं, रिश्ते साथ चलते हैं* मनुष्य का जीवन एक लंबी यात्रा की तरह है, जिसमें वह जन्म से लेकर अंतिम सांस तक सफलता, सम्मान, संपत्ति और पहचान पाने के लिए निरंतर संघर्ष करता रहता है। कोई ऊंचे पद की दौड़ में लगा है, कोई बैंक बैलेंस बढ़ाने में व्यस्त है और कोई अपने अहंकार को ही अपनी उपलब्धि मान बैठता है। लेकिन जीवन की ढलती शाम एक ऐसा आईना होती है, जहाँ हर भ्रम टूटने लगता है। तब इंसान को एहसास होता है कि उसने जिन चीजों को जीवन का सबसे बड़ा सत्य समझा था, वे वास्तव में क्षणिक थीं। अंत में यदि कुछ स्थायी रहता है, तो वह हैं—रिश्ते, यादें और इंसानियत से कमाई गई दुआएं। मैं यहां बोलेगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। आज का दौर भौतिकता और प्रतिस्पर्धा का दौर बन चुका है। इंसान अपनी पहचान को अपने पद, पैसे और प्रभाव से जोड़ने लगा है। समाज में भी अक्सर व्यक्ति का मूल्यांकन उसके बैंक बैलेंस और रसूख से किया जाता है। यही कारण है कि लोग रिश्तों से ज्यादा करियर को, संवेदनाओं से ज्यादा संपत्ति को और इंसानियत से ज्यादा अहंकार को महत्व देने लगे हैं। लेक...

गांव की सरकार पर ताला: आखिर पंचायत चुनावों से क्यों डर रही सरकार?

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संपादकीय@हरेश पंवार # 24-05-2026- गांव की सरकार पर ताला: आखिर पंचायत चुनावों से क्यों डर रही सरकार? लोकतंत्र की असली ताकत संसद और विधानसभा की ऊंची इमारतों में नहीं, बल्कि गांव की चौपालों में बसती है। भारत के संविधान निर्माताओं ने ग्राम पंचायतों को केवल प्रशासनिक इकाई नहीं, बल्कि लोकतंत्र की जड़ों के रूप में परिकल्पित किया था। लेकिन राजस्थान में पंचायत चुनावों को लेकर जो स्थिति बनी हुई है, वह लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर रही है। राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा 31 जुलाई से पहले पंचायत चुनाव करवाने के निर्देश देने के बावजूद सरकार की मंशा साफ नजर नहीं आ रही। राजनीतिक बयानबाजी, तकनीकी बहाने और “वन स्टेट, वन इलेक्शन” जैसी अवधारणाओं की आड़ में पंचायत चुनावों को टालना लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ खिलवाड़ प्रतीत होता है। भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मदन सिंह राठौड़ द्वारा यह बयान देना कि जिन पंचायतों का कार्यकाल अभी बाकी है, उनके साथ ही चुनाव करवाने पर विचार किया जा रहा है, सुनने में प्रशासनिक सुविधा का तर्क लग सकता है, लेकिन सवाल यह है कि जिन पंचायतों का कार्यकाल एक वर्ष पहले ...

कॉकरोच जनता पार्टी” : मज़ाक, आक्रोश या व्यवस्था के खिलाफ डिजिटल विद्रोह

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संपादकीय@हरेश पंवार # 23-05-2026 *“कॉकरोच जनता पार्टी” : मज़ाक, आक्रोश या व्यवस्था के खिलाफ डिजिटल विद्रोह?* भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में समय-समय पर ऐसे जनआंदोलन उभरे हैं, जिन्होंने सत्ता और व्यवस्था को आईना दिखाने का काम किया है। कभी यह आंदोलन सड़कों पर दिखाई दिए, तो कभी सोशल मीडिया के माध्यम से जनभावनाओं का विस्फोट बनकर सामने आए। हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर तेजी से उभरे “कॉकरोच जनता पार्टी” नामक डिजिटल अभियान ने भी कुछ ऐसे ही सवाल खड़े किए हैं। यह केवल एक व्यंग्यात्मक नाम या इंटरनेट ट्रेंड नहीं, बल्कि युवाओं के भीतर पनप रहे आक्रोश, असुरक्षा और व्यवस्था के प्रति अविश्वास का संकेत माना जा रहा है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। इस पूरे विवाद की शुरुआत भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की उस टिप्पणी से हुई, जिसमें कुछ बेरोजगार युवाओं और व्यवस्था पर हमला करने वाले तत्वों को “कॉकरोच” और “पैरासाइट” जैसे शब्दों से जोड़े जाने का आरोप लगा। बाद में मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि उनकी टिप्पणी को गलत संदर्भ में प्रस्तुत किया गया और उनका इशारा फर्जी डिग्री के सहारे...

मतभेद नहीं, मनभेद समाज के लिए सबसे बड़ा खतरा

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 संपादकीय @ हरेश पंवार #18 मई 2026 *मतभेद नहीं, मनभेद समाज के लिए सबसे बड़ा खतरा* किसी भी सभ्य और समृद्ध समाज की पहचान उसकी ऊंची इमारतों, चौड़ी सड़कों या आधुनिक तकनीक से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि वहां रहने वाले लोग एक-दूसरे के प्रति कितने संवेदनशील, सहनशील और सहयोगी हैं। समाज कोई मशीन नहीं, जिसे केवल नियमों और व्यवस्थाओं से चलाया जा सके। समाज एक जीवंत ताना-बाना है, जो विश्वास, प्रेम, भाईचारे और आपसी सम्मान के धागों से बुना जाता है। जब ये धागे कमजोर पड़ने लगते हैं, तो समाज भीतर से बिखरने लगता है। आज दुर्भाग्य से हमारा सामाजिक ताना-बाना इसी संकट से गुजर रहा है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। वर्तमान समय में मतभेद और मनभेद के बीच की दूरी तेजी से समाप्त होती जा रही है। विचारों में भिन्नता किसी भी लोकतांत्रिक और जीवंत समाज की पहचान होती है। हर व्यक्ति का सोचने का तरीका अलग हो सकता है। किसी मुद्दे पर अलग राय होना स्वाभाविक है और यही विविधता समाज को नई दिशा देती है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है, जब विचारों का मतभेद दिलों की दूरी यानी मनभेद में बदल जाता ...

दिखावे के रिश्तों के दौर में सच्ची मित्रता की तलाश

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 संपादकीय @ हरेश पंवार # 17 मई 2026 *दिखावे के रिश्तों के दौर में सच्ची मित्रता की तलाश* आज का समय अजीब विडंबनाओं का समय है। इंसान पहले से कहीं अधिक लोगों से जुड़ा हुआ दिखाई देता है, लेकिन भीतर से उतना ही अकेला होता जा रहा है। मोबाइल की स्क्रीन पर हजारों “फॉलोअर्स”, सैकड़ों “फ्रेंड्स” और अनगिनत “लाइक्स” देखकर लोग स्वयं को लोकप्रिय समझने लगे हैं। किसी की पोस्ट पर हजार प्रतिक्रियाएं आ जाएं, तो उसे लगता है कि उसके पास अपार सामाजिक पूंजी है। लेकिन जीवन का वास्तविक सच तब सामने आता है, जब कठिन समय दरवाजे पर दस्तक देता है। उस समय यह भीड़ धीरे-धीरे गायब हो जाती है और केवल वही व्यक्ति बचता है, जो बिना स्वार्थ के हमारे साथ खड़ा रहता है। इसलिए किसी ने बिल्कुल सही कहा है— “भीड़ इकट्ठा करने से कोई अमीर नहीं होता, संकट के समय जो ढाल बनकर खड़ा हो जाए, वही असली मित्र होता है।” यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। मानव जीवन में मित्रता केवल एक सामाजिक संबंध नहीं, बल्कि भावनात्मक सुरक्षा का सबसे मजबूत आधार होती है। मित्र वह नहीं जो केवल खुशियों में तालियां बजाए, बल्कि वह है जो असफल...

एक हाथ से ताली नहीं बजती : रिश्तों, विवादों और संयम का मनोविज्ञान

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 संपादकीय @ हरेश पंवार # 16-05-2026 *एक हाथ से ताली नहीं बजती : रिश्तों, विवादों और संयम का मनोविज्ञान* मानव जीवन संबंधों की बुनियाद पर टिका हुआ है। जहां रिश्ते हैं, वहां मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन जब मतभेद अहंकार में बदल जाते हैं, तब वही संबंध टूटने लगते हैं। इसी जीवन सत्य को लोकजीवन की एक छोटी लेकिन अत्यंत गहरी कहावत बखूबी समझाती है—“एक हाथ से ताली नहीं बजती।” यह केवल बोलचाल की कहावत नहीं, बल्कि मानवीय व्यवहार, सामाजिक संघर्ष और मानसिक परिपक्वता का ऐसा सूत्र है, जो जीवन को टूटने से बचा सकता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। आज का दौर प्रतिक्रियाओं का दौर बन चुका है। सोशल मीडिया पर कोई कुछ कह दे, तो तुरंत जवाब देना लोग अपनी बहादुरी समझने लगे हैं। परिवारों में छोटी-छोटी बातों पर तकरार हो रही है। सड़क से लेकर संसद तक शब्दों की मर्यादा टूटती दिखाई दे रही है। हर व्यक्ति खुद को सही साबित करने की जिद में है, जबकि सच यह है कि हर विवाद में केवल मुद्दा नहीं, बल्कि अहंकार भी शामिल होता है। यदि कोई व्यक्ति क्रोध में कटु शब्द कहता है और दूसरा उससे अधिक तीखा जवाब द...

जब सपनों पर चला बुलडोजर: परशुरामपुरा स्टेडियम विवाद और राजनीति का कठोर चेहरा

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 संपादकीय@हरेश पंवार # 15-05-2026 *“जब सपनों पर चला बुलडोजर: परशुरामपुरा स्टेडियम विवाद और राजनीति का कठोर चेहरा”* कहा जाता है कि किसी समाज की असली ताकत उसके युवा होते हैं, और युवाओं की ऊर्जा को सही दिशा देने का सबसे प्रभावी माध्यम खेल, शिक्षा और रचनात्मक मंच होते हैं। लेकिन जब उन्हीं मंचों पर बुलडोजर चलने लगे, तब सवाल केवल एक भवन के टूटने का नहीं रह जाता, बल्कि यह जनभावनाओं, उम्मीदों और लोकतांत्रिक संवेदनशीलता के टूटने का विषय बन जाता है। झुंझुनूं जिले के परशुरामपुरा में करोड़ों रुपये की लागत से बने राजीव गांधी खेल स्टेडियम को ध्वस्त किए जाने के बाद उपजा जनाक्रोश इसी पीड़ा का प्रतीक है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। यह मामला केवल भूमि विवाद या प्रशासनिक कार्रवाई तक सीमित नहीं है। गांव-कस्बों के युवाओं के लिए यह स्टेडियम एक सपने जैसा था। यहां खेलते हुए बच्चों की आंखों में खिलाड़ी बनने की उम्मीद थी। गांव के माता-पिता अपने बच्चों को नशे, अपराध और बेरोजगारी से दूर रखने के लिए खेल मैदान को सबसे सुरक्षित विकल्प मानते थे। लेकिन जब उसी मैदान पर बुलडोजर चला, तो लोग...

पेपर लीक का जहर और शिक्षा व्यवस्था का गिरता विश्वास

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 संपादकीय@हरेश पंवार  13-05-2026 *पेपर लीक का जहर और शिक्षा व्यवस्था का गिरता विश्वास* भारत में शिक्षा को हमेशा राष्ट्र निर्माण की सबसे मजबूत नींव माना गया है। एक गरीब मजदूर से लेकर मध्यम वर्गीय परिवार तक अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए दिन-रात मेहनत करता है। कोई खेत गिरवी रखता है, कोई कर्ज लेता है, तो कोई अपनी जरूरतों को मारकर बच्चों के सपनों को पंख देने का प्रयास करता है। विशेषकर मेडिकल जैसी प्रतिष्ठित परीक्षाओं की तैयारी करने वाले विद्यार्थी वर्षों तक कठिन परिश्रम करते हैं। दिन-रात किताबों के बीच संघर्ष करते हुए वे अपने भीतर एक डॉक्टर बनने का सपना संजोते हैं। लेकिन जब परीक्षा से पहले ही पेपर लीक होने की खबरें सामने आती हैं, तब केवल एक परीक्षा नहीं टूटती, बल्कि लाखों विद्यार्थियों और अभिभावकों का विश्वास भी टूट जाता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। नीट परीक्षा को लेकर जिस प्रकार पेपर आउट और धांधली के आरोप सामने आए हैं, उसने पूरे देश को झकझोर दिया है। जिन अभिभावकों ने अपने बच्चों के भविष्य के लिए लाखों रुपए कोचिंग, हॉस्टल और पढ़ाई पर खर्च किए, आज उनके च...

रिश्तों की दीमक: गलतफहमी और संवादहीनता का बढ़ता संकट

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 संपादकीय@ Haresh Panwar -11-05-2026 “रिश्तों की दीमक: गलतफहमी और संवादहीनता का बढ़ता संकट” मानव जीवन रिश्तों के सहारे चलता है। परिवार, मित्रता, प्रेम, सामाजिक संबंध—ये सभी जीवन को अर्थ और संवेदना प्रदान करते हैं। इंसान कितना भी संपन्न या सफल क्यों ना हो, यदि उसके रिश्तों में अपनापन और विश्वास नहीं है, तो उसका जीवन भीतर से खाली रह जाता है। यही कारण है कि कहा जाता है कि रिश्ते जीवन की सबसे बड़ी पूंजी होते हैं। लेकिन आज यही रिश्ते एक ऐसी अदृश्य बीमारी से ग्रसित होते जा रहे हैं, जो बाहर से दिखाई नहीं देती, पर भीतर से उन्हें खोखला कर देती है। इस बीमारी का नाम है—गलतफहमी। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। गलतफहमी किसी रिश्ते में अचानक पैदा नहीं होती। यह धीरे-धीरे पनपती है, ठीक वैसे ही जैसे दीमक लकड़ी को भीतर ही भीतर चाटती रहती है। बाहर से सब कुछ सामान्य दिखाई देता है, लेकिन अंदर मजबूती खत्म हो चुकी होती है। रिश्तों में भी अक्सर यही होता है। लोग एक ही घर में रहते हैं, साथ भोजन करते हैं, साथ मुस्कुराते भी हैं, लेकिन उनके बीच भावनात्मक दूरी बढ़ चुकी होती है। आज के समय ...

भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनलहर या नई राजनीति का भ्रम?—परिवर्तन की दिशा में जनता का मिज़ाज

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 संपादकीय @हरेश पंवार 5 मई 2026 *“भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनलहर या नई राजनीति का भ्रम?—परिवर्तन की दिशा में जनता का मिज़ाज”* क्ष भारतीय लोकतंत्र का इतिहास केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि जनभावनाओं के उतार-चढ़ाव का भी इतिहास रहा है। जब-जब जनता ने व्यवस्था से निराशा महसूस की है, तब-तब उसने नए नेतृत्व और नई राजनीतिक शक्तियों को अवसर दिया है। वर्तमान समय में भी राजनीति के इसी संक्रमण काल को हम देख रहे हैं, जहाँ भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले नेताओं और नई पार्टियों को जनता का समर्थन मिलता दिखाई दे रहा है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। साल 2010 के दशक की शुरुआत में देश ने एक बड़े जनआंदोलन को देखा, जब अन्ना हजारे के नेतृत्व में लोकपाल की मांग को लेकर देशभर में आंदोलन खड़ा हुआ। दिल्ली के जंतर-मंतर से उठी यह आवाज केवल एक कानून की मांग नहीं थी, बल्कि व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता का गुस्सा थी। इस आंदोलन ने राजनीतिक परिदृश्य को भी प्रभावित किया और उसी जमीन से आम आदमी पार्टी का उदय हुआ। अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में उभरी इस पार्टी ने “झाड़ू”...

शादी का दिखावा या जिंदगी का बोझ?—फिजूल खर्ची के खिलाफ सामाजिक चेतना की जरूरत

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 संपादकीय @हरेश पंवार # 4मई 2026 *“शादी का दिखावा या जिंदगी का बोझ?—फिजूल खर्ची के खिलाफ सामाजिक चेतना की जरूरत”* पिछले कुछ वर्षों में शादियों का स्वरूप जिस तेजी से बदला है, वह केवल परंपराओं का विस्तार नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिस्पर्धा और दिखावे की खतरनाक दौड़ बन चुका है। एक समय था जब विवाह सादगी, संस्कार और पारिवारिक मेल-जोल का प्रतीक हुआ करता था, लेकिन आज यह “स्टेटस शो” में बदलता जा रहा है। नौजवान पीढ़ी अपने घर की आर्थिक स्थिति को नजरअंदाज कर, दूसरों की नकल में ऐसे-ऐसे खर्च कर रही है, जो आने वाले कई वर्षों तक उनके जीवन को कर्ज के बोझ तले दबा देते हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। आज गांव से लेकर शहर तक शादियों में महंगी गाड़ियां, डीजे, फ्लोर डांस, रथ, ब्रांडेड कपड़े, महंगे आभूषण और वीडियो शूटिंग का दिखावा आम हो गया है। दूल्हा-दुल्हन से ज्यादा ध्यान उनके कपड़ों और एंट्री स्टाइल पर होता है। एक तरफ करोड़पति का बेटा सादगी से शादी कर रहा है, तो दूसरी तरफ मजदूर का बेटा उधार लेकर आलीशान शादी करने में लगा है। यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि जो व्यक्ति अपनी आर्थि...

सेवानिवृत्ति के बाद: पद का मोह या समाज के प्रति दायित्व?

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संपादकीय@हरेश पंवार# 3 मई 2026 *“सेवानिवृत्ति के बाद: पद का मोह या समाज के प्रति दायित्व?”* सेवानिवृत्ति जीवन का वह पड़ाव है, जहाँ व्यक्ति अपने बीते वर्षों का मूल्यांकन करता है और यह तय करता है कि आगे का जीवन किस दिशा में सार्थक बने। लेकिन वर्तमान सामाजिक परिदृश्य में एक विचित्र प्रवृत्ति तेजी से उभर रही है—कई लोग नौकरी से रिटायर होने के बाद भी “पद” और “प्रतिष्ठा” के मोह से मुक्त नहीं हो पा रहे। वे सामाजिक संगठनों का गठन कर, स्वयं को उच्च पदों पर स्थापित कर, मंचों पर बैठकर वही सम्मान पाने की कोशिश करते हैं, जो उन्हें नौकरी के दौरान मिला करता था। यह एक प्रकार का मनोवैज्ञानिक विस्तार है, जहाँ व्यक्ति पद छोड़ देता है, लेकिन पद की मानसिकता नहीं छोड़ पाता। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। यह भी सच है कि कुछ लोग सेवानिवृत्ति के आसपास “समाज सेवा” का स्वांग रचने लगते हैं। बड़े-बड़े अभिनंदन समारोह, प्रभावशाली चेहरों की उपस्थिति, फूल-मालाओं और सोशल मीडिया की चमक—यह सब मिलकर एक कृत्रिम छवि गढ़ने का प्रयास करते हैं। लेकिन समाज अब पहले जैसा भोला नहीं रहा। वह व्यक्ति के आचरण का...

एक कटोरा पानी, एक मुट्ठी दाना: करुणा, समझ और सह-अस्तित्व की पुकार

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संपादकीय@हरेश पंवार #02-05-2026 *“एक कटोरा पानी, एक मुट्ठी दाना: करुणा, समझ और सह-अस्तित्व की पुकार”* तपती धूप, लू के थपेड़े और सूखते जल स्रोत—यह केवल इंसानों के लिए नहीं, बल्कि धरती पर बसे हर जीव के लिए चुनौती का समय है। ऐसे में सबसे ज्यादा प्रभावित वे पक्षी होते हैं, जिनका जीवन पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर है। खेत-खलिहान सूख रहे हैं, जंगल सिमट रहे हैं और शहरों का फैलाव उनके प्राकृतिक घरों को निगलता जा रहा है। परिणामस्वरूप, एक बूंद पानी और एक दाने की तलाश में भटकते पक्षी अब हमारे घरों की छतों की ओर आशा भरी नजरों से देखते हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। इस संदर्भ में एक गंभीर सामाजिक भ्रम भी सामने आता है—हम पक्षियों को “बेजुबान” कह देते हैं। यह शब्द न केवल गलत है, बल्कि हमारी समझ की सीमाओं को भी उजागर करता है। पक्षी बेजुबान नहीं हैं, उनकी अपनी एक समृद्ध और सजीव भाषा है, जिसे हम “मानवेत्तर भाषा” कह सकते हैं। उनकी चहचहाहट, पुकार, स्वर और व्यवहार—सब कुछ संवाद का हिस्सा है। वे अपने समूह को खतरे की सूचना देते हैं, साथी को बुलाते हैं, बच्चों को सिखाते हैं और अपने भा...

“टूटते रिश्तों की चीख: जब परिवार की जड़ें ही होने लगीं कमजोर”

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संपादकीय@हरेश पंवार #01-05-2026 *“टूटते रिश्तों की चीख: जब परिवार की जड़ें ही होने लगीं कमजोर”* समाज की सबसे मजबूत इकाई परिवार होता है। यही वह आधार है, जिस पर सभ्यता, संस्कार और सामाजिक संतुलन टिका रहता है। लेकिन आज का समय एक चिंताजनक सच्चाई सामने ला रहा है—परिवार की जड़ों में दरारें पड़ रही हैं, और रिश्तों की पवित्रता धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। जो परिवार कभी प्रेम, विश्वास और त्याग का प्रतीक हुआ करता था, आज वही संदेह, स्वार्थ और हिंसा का केंद्र बनता दिखाई दे रहा है। मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। हाल के वर्षों में सामने आई घटनाएँ समाज को झकझोर देने वाली हैं। भाई द्वारा भाई की हत्या, पति-पत्नी के बीच क्रूर हिंसा, और पारिवारिक विवादों का खौफनाक रूप लेना—ये केवल अपराध नहीं हैं, बल्कि यह हमारे सामाजिक ढांचे के विघटन का संकेत हैं। सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या बदल गया है, जिसने रिश्तों को इतना कमजोर और खतरनाक बना दिया? एक बड़ा कारण है—आभासी दुनिया का बढ़ता प्रभाव। आज हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सोशल मीडिया के युग में जी रहे हैं, जहाँ जानकारी की कोई कमी नहीं है, लेकिन ...