एक कटोरा पानी, एक मुट्ठी दाना: करुणा, समझ और सह-अस्तित्व की पुकार
संपादकीय@हरेश पंवार #02-05-2026 *“एक कटोरा पानी, एक मुट्ठी दाना: करुणा, समझ और सह-अस्तित्व की पुकार”* तपती धूप, लू के थपेड़े और सूखते जल स्रोत—यह केवल इंसानों के लिए नहीं, बल्कि धरती पर बसे हर जीव के लिए चुनौती का समय है। ऐसे में सबसे ज्यादा प्रभावित वे पक्षी होते हैं, जिनका जीवन पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर है। खेत-खलिहान सूख रहे हैं, जंगल सिमट रहे हैं और शहरों का फैलाव उनके प्राकृतिक घरों को निगलता जा रहा है। परिणामस्वरूप, एक बूंद पानी और एक दाने की तलाश में भटकते पक्षी अब हमारे घरों की छतों की ओर आशा भरी नजरों से देखते हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। इस संदर्भ में एक गंभीर सामाजिक भ्रम भी सामने आता है—हम पक्षियों को “बेजुबान” कह देते हैं। यह शब्द न केवल गलत है, बल्कि हमारी समझ की सीमाओं को भी उजागर करता है। पक्षी बेजुबान नहीं हैं, उनकी अपनी एक समृद्ध और सजीव भाषा है, जिसे हम “मानवेत्तर भाषा” कह सकते हैं। उनकी चहचहाहट, पुकार, स्वर और व्यवहार—सब कुछ संवाद का हिस्सा है। वे अपने समूह को खतरे की सूचना देते हैं, साथी को बुलाते हैं, बच्चों को सिखाते हैं और अपने भा...