“टूटते रिश्तों की चीख: जब परिवार की जड़ें ही होने लगीं कमजोर”

संपादकीय@हरेश पंवार #01-05-2026

*“टूटते रिश्तों की चीख: जब परिवार की जड़ें ही होने लगीं कमजोर”*
समाज की सबसे मजबूत इकाई परिवार होता है। यही वह आधार है, जिस पर सभ्यता, संस्कार और सामाजिक संतुलन टिका रहता है। लेकिन आज का समय एक चिंताजनक सच्चाई सामने ला रहा है—परिवार की जड़ों में दरारें पड़ रही हैं, और रिश्तों की पवित्रता धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। जो परिवार कभी प्रेम, विश्वास और त्याग का प्रतीक हुआ करता था, आज वही संदेह, स्वार्थ और हिंसा का केंद्र बनता दिखाई दे रहा है। मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

हाल के वर्षों में सामने आई घटनाएँ समाज को झकझोर देने वाली हैं। भाई द्वारा भाई की हत्या, पति-पत्नी के बीच क्रूर हिंसा, और पारिवारिक विवादों का खौफनाक रूप लेना—ये केवल अपराध नहीं हैं, बल्कि यह हमारे सामाजिक ढांचे के विघटन का संकेत हैं। सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या बदल गया है, जिसने रिश्तों को इतना कमजोर और खतरनाक बना दिया?

एक बड़ा कारण है—आभासी दुनिया का बढ़ता प्रभाव। आज हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सोशल मीडिया के युग में जी रहे हैं, जहाँ जानकारी की कोई कमी नहीं है, लेकिन संवेदनाओं का अकाल पड़ता जा रहा है। विडंबना यह है कि एक ही घर में रहने वाले लोग एक-दूसरे से दूर होते जा रहे हैं। एक ही कमरे में बैठे लोग अपने-अपने मोबाइल में खोए रहते हैं, लेकिन एक-दूसरे से संवाद नहीं करते। रिश्तों की गर्माहट अब स्क्रीन की ठंडी रोशनी में खोती जा रही है।

पहले रिश्तों में “नजरों की शर्म” होती थी—एक मर्यादा, एक संकोच, एक सम्मान। लेकिन आज वह भावना लगभग लुप्त हो चुकी है। अब रिश्ते केवल औपचारिकता बनकर रह गए हैं, जिनमें आत्मीयता और अपनापन कम होता जा रहा है। जब संवाद खत्म होता है, तो गलतफहमियाँ जन्म लेती हैं, और यही गलतफहमियाँ कभी-कभी हिंसा का रूप ले लेती हैं।

आर्थिक बदलाव और बढ़ता पूंजीवाद भी इस स्थिति के लिए जिम्मेदार हैं। आज का समाज प्रतिस्पर्धा और भौतिक सफलता की दौड़ में इतना उलझ गया है कि रिश्तों की अहमियत पीछे छूटती जा रही है। पैसा और प्रतिष्ठा रिश्तों से ऊपर हो गए हैं। जब स्वार्थ हावी होता है, तो संबंध केवल उपयोग का साधन बन जाते हैं, और जब उपयोग खत्म होता है, तो संबंध भी टूट जाते हैं।

विवाह, जो कभी सात जन्मों का बंधन माना जाता था, आज एक अस्थायी समझौते में बदलता जा रहा है। तलाक के मामलों में वृद्धि और “लिव-इन रिलेशनशिप” जैसी व्यवस्थाओं का बढ़ना इस बात का संकेत है कि लोग स्थायी रिश्तों से बचने लगे हैं। यह बदलाव पूरी तरह गलत नहीं है, लेकिन जब यह जिम्मेदारी से बचने का माध्यम बन जाए, तो यह समाज के लिए खतरे की घंटी बन जाता है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि परिवार के भीतर ही विश्वास की कमी हो रही है। जब एक भाई दूसरे भाई पर शक करता है, जब पति-पत्नी एक-दूसरे को प्रतिद्वंदी समझने लगते हैं, तो यह केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं रहती, बल्कि सामाजिक संकट बन जाती है। बचपन में जो भाई एक ही थाली में खाते थे, आज वही एक-दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं—यह केवल अपराध नहीं, बल्कि रिश्तों की मौत है।

इस स्थिति का समाधान केवल कानून या सख्त नियमों से नहीं हो सकता। इसके लिए सामाजिक और मानसिक स्तर पर बदलाव जरूरी है। सबसे पहले हमें संवाद को पुनर्जीवित करना होगा। परिवार में समय देना, एक-दूसरे की बात सुनना और समझना—ये छोटे-छोटे प्रयास रिश्तों को मजबूत बना सकते हैं।

दूसरा, हमें अपनी प्राथमिकताओं को पुनः निर्धारित करना होगा। भौतिक सुख-सुविधाएँ जरूरी हैं, लेकिन वे रिश्तों की कीमत पर नहीं होनी चाहिए। बच्चों को भी यह सिखाना होगा कि रिश्तों का मूल्य क्या होता है, और उन्हें कैसे निभाया जाता है।

तीसरा, डिजिटल दुनिया के उपयोग में संतुलन लाना होगा। तकनीक का उपयोग करें, लेकिन उसे अपने जीवन और रिश्तों पर हावी न होने दें। वास्तविक दुनिया के रिश्ते ही जीवन को अर्थ देते हैं, आभासी दुनिया केवल भ्रम पैदा करती है।

अंततः, यह समझना होगा कि परिवार केवल खून का रिश्ता नहीं, बल्कि भावनाओं का बंधन है। यदि इस बंधन को हम कमजोर होने देंगे, तो समाज का पूरा ढांचा हिल जाएगा।

आज जरूरत है आत्ममंथन की—क्या हम रिश्तों को निभा रहे हैं, या केवल उन्हें ढो रहे हैं?
यदि समय रहते नहीं संभले, तो वह दिन दूर नहीं जब परिवार केवल एक शब्द बनकर रह जाएगा, और इंसान अपने ही बनाए अकेलेपन में कैद हो जाएगा।

*भीम प्रज्ञा अलर्ट* 

“रिश्तों की असली मजबूती शब्दों में नहीं, बल्कि समय, विश्वास और संवेदनाओं के निवेश में होती है।”

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