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Showing posts from July, 2025

जनसत्ता बनाम जनविरोध: राजस्थान की राजनीति के वर्तमान सियासी संवाद ?

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संपादकीय  31 जुलाई 2025  *"जनसत्ता बनाम जनविरोध: राजस्थान की राजनीति के वर्तमान सियासी संवाद ?"*  झालावाड़ की स्कूल त्रासदी के बाद राजस्थान की राजनीति इस वक्त बेहद संवेदनशील चौराहे पर खड़ी नजर आ रही है। यहां यह स्पष्ट नहीं कहा जा सकता कि यह विकास की रफ्तार  है या फिर सत्ता का रिवर्स गियर? – आज राजस्थान की राजनीति पर जिस तरह से सवालों की बौछार  हो रही है। इस संदर्भ में मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। एक ओर मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा अपनी सरल, प्रशासनिक -निष्ठ और तकनीक-समर्थ सरकार की छवि बनाने में जुटे हैं, वहीं दूसरी ओर सरकार के कई निर्णय — या यूं कहिए पूर्ववर्ती योजनाओं को ठंडे बस्ते में डालना — जनता के भीतर असंतोष और राजनीतिक संदेह की चिंगारी भड़का रहे हैं। विपक्ष का यह आरोप कि भाजपा सरकार ने पूर्ववर्ती गहलोत सरकार की लोकहितकारी योजनाओं को बिना मूल्यांकन बंद कर दिया, नवगठित जिला मुख्यालयों को निरस्त किया, और अब पंचायत राज परिसीमन में सत्ताधारी दल के प्रतिनिधियों की मर्जी को मानक बना दिया — यह सब राज्य के लोकतांत्रिक ढांचे पर सीधा प्रहार प्रतीत ह...

*संगठन – स्वार्थ नहीं, समर्पण की साधना है*

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संपादकीय 29 जुलाई 2025   *संगठन – स्वार्थ नहीं, समर्पण की साधना है*  संगठन का स्वरूप केवल संस्थागत ढांचे या औपचारिक बैठकों तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह एक जीवंत चेतना है, जो व्यक्तियों को ‘मैं’ से उठाकर ‘हम’ की भावना में ढालती है। संगठन नियमों से नहीं, बल्कि व्यवस्था से चलता है। सूचना देने से नहीं, बल्कि समझ विकसित करने से उसकी नींव मजबूत होती है। यहाँ कानून नहीं, अनुशासन आवश्यक होता है। संगठन में डर नहीं, बल्कि आपसी विश्वास ही उसकी असली शक्ति है। संगठन का उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष का यशगान नहीं, बल्कि सामूहिक उत्थान होता है। यह शोषण नहीं, बल्कि पोषण की भूमि है, जहाँ हर सदस्य को बढ़ने, सीखने और नेतृत्व करने का अवसर मिलता है। संगठन में आज्ञा नहीं, आदर चलता है; संपर्क नहीं, बल्कि भावनात्मक संबंध चलते हैं। अर्पण सीमित होता है, समर्पण अनंत होता है। इसलिए संगठन केवल दीखावटी उपस्थिति या व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि साझा संकल्प और साझा संघर्ष के लिए होता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। संगठन कोई ईंट-पत्थर की संरचना नहीं होती, न ही यह केवल लोगों क...

"सेवा के सारथी: सेवाराम गुप्ता का समर्पित जीवन यात्रा"

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*"सूरजगढ़ की धड़कन, राष्ट्र निर्माण के सच्चे कर्मयोगी- सेवाराम गुप्ता"*   *"सेवा के सारथी: सेवाराम गुप्ता का समर्पित जीवन यात्रा"*  समाज में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो पद से नहीं, बल्कि अपने कर्तव्यबोध, कर्मनिष्ठा और सेवा भाव से पहचाने जाते हैं। सूरजगढ़ (झुंझुनूं) के जीवन मंडी से जुड़ा एक ऐसा ही नाम है — सेवाराम गुप्ता। जिनका जीवन राष्ट्रसेवा, जनसेवा और सामाजिक उत्थान की त्रिवेणी का साकार रूप है। उन्होंने राजनीति को जनसंपर्क नहीं, जनकल्याण का माध्यम बनाया और सेवा को साधना का रूप दिया।  *साधारण  से जननायक बनने तक की यात्रा*  सूरजगढ़ (जिला झुंझुनूं) के जीवन मंडी क्षेत्र में जन्मे  सेवाराम गुप्ता, आज राजस्थान के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य में एक प्रेरक व्यक्तित्व बन चुके हैं। इनके पिता स्व. श्री ड़ूगरमल गुप्ता न केवल क्षेत्र के प्रख्यात अनाज व्यापारी रहे, बल्कि किसानों के प्रगति-पथ पर चलने के मार्गदर्शक भी रहे। 1967 से 1977 तक वह झुंझुनूं जिले की पहली कृषि उपज मंडी समिति के अध्यक्ष रहे, जिससे परिवार की समाजसेवा की परंपरा प्रारंभ हुई। सेव...

झालावाड़ त्रासदी : जब शिक्षा की छांव मौत की छाया बन गई"

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संपादकीय  26 जुलाई 2025।   *"झालावाड़ त्रासदी : जब शिक्षा की छांव मौत की छाया बन गई"*  झालावाड़ की दर्दनाक दुर्घटना ने न सिर्फ कई मासूम जिंदगियां लील लीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की खस्ताहाली और प्रशासनिक लापरवाही की परतें भी उधेड़ कर रख दीं। यह कोई सामान्य दुर्घटना नहीं, बल्कि एक सामाजिक-शैक्षणिक विडंबना है, जिसमें हाशिये पर खड़े समाज के बच्चे बेमौत मारे गए — वे बच्चे जो पहली पीढ़ी के शिक्षार्थी थे, जिनके लिए स्कूल ज्ञान की नहीं, जीवन की रोशनी थी। जहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। मृतक छात्रों का सामाजिक-सांस्कृतिक चेहरा हमें झकझोरता है — 4 भील (ST), 2 रैदास (SC) – जो सगे भाई-बहन थे, और 1 लोधा (OBC)। घायल बच्चों में भी अधिकांश भील समुदाय से हैं – कई एक ही परिवार के। यह आंकड़े नहीं, समाज के उस वर्ग की पीड़ा हैं जो दशकों से अवसरों से वंचित रहे और अब शिक्षा तक पहुंचने की उनकी कोशिशें भी जीवन पर भारी पड़ रही हैं। विडंबना यह है कि यह घटना किसी प्राकृतिक आपदा से नहीं, बल्कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था की लापरवाही से हुई है। विद्यालय की मूलभूत सुविधाएं, जैसे ...

प्रेम – जुड़ाव की भावना है, बंधन नहीं

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संपादकीय 24 जुलाई 2025  *प्रेम – जुड़ाव की भावना है, बंधन नहीं*  “प्रेम एक जुड़ाव है, बंधन नहीं”  यह कोई केवल सुन्दर कहावत भर नहीं है, बल्कि प्रेम की सबसे शुद्ध और गहन परिभाषा है। प्रेम को यदि बंधन बना दिया जाए, तो वह बोझ बन जाता है। लेकिन जब प्रेम को जुड़ाव के रूप में देखा जाए, तो यह जीवन का सबसे सुंदर अनुभव बन जाता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। आज के दौर में अधिकांश लोग प्रेम को स्वामित्व और अपेक्षाओं की परिधि में परिभाषित करने लगे हैं। परिणामस्वरूप रिश्ते टूटते हैं, मनों में ईर्ष्या और द्वेष उपजता है, और प्रेम जैसे पवित्र भाव का सौंदर्य मलिन हो जाता है। प्रेम का अर्थ केवल "तुम मेरे हो" कहकर किसी पर अधिकार जताना नहीं है। यह कहना है – “तुम जैसे भी हो, मैं तुम्हें वैसे ही स्वीकार करता हूं।”  एक वृक्ष की तरह सोचिए – जो पक्षियों को छांव, फल, और स्थान देता है, लेकिन उन पर अधिकार नहीं जताता। वे उड़ जाएं, लौटें या न लौटें – वृक्ष सिर्फ देता है, बदले में अपेक्षा नहीं रखता।  प्रेम भी ऐसा ही होना चाहिए – मुक्त, स्वीकार और स्थायी। जब प्रेम मे...

धार्मिक उन्माद नहीं, सामाजिक सद्भाव चाहिए – अनुशासन और आत्मचिंतन समय की मांग"

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संपादकीय  25 जुलाई 2025   *"धार्मिक उन्माद नहीं, सामाजिक सद्भाव चाहिए – अनुशासन और आत्मचिंतन समय की मांग"*  वर्तमान समय में आस्था और अंधभक्ति के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है। विशेषकर श्रावण मास में कांवड़ यात्रा जैसे धार्मिक आयोजनों का स्वरूप जिस प्रकार से विकृत होता जा रहा है, वह केवल चिंताजनक नहीं, बल्कि सामाजिक ताने-बाने के लिए घातक भी है। धार्मिक विश्वास व्यक्ति की निजता का विषय है, न कि उसे प्रदर्शन का माध्यम बनाकर दूसरों के अधिकारों और स्वतंत्रता पर हमला करने का। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। कांवड़ चढ़ाने की आड़ में ‘नेतागिरी’चमकने और धार्मिक ‘उन्माद’फैलाने जैसे पिछले कुछ वर्षों में कांवड़ यात्रा का जो रूप सामने आया है, वह किसी धार्मिक साधना का नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन, शोर-शराबा, डीजे, आतिशबाजी, ड्रेस कोड, बाइक रैली और सोशल मीडिया स्टंट का बनकर रह गया है। यह और भी शर्मनाक तब हो जाता है जब कुछ लोग इस धार्मिक यात्रा को ‘जाति श्रेष्ठता’ या ‘धर्म रक्षा’ के नाम पर इस्तेमाल कर समाज में विषाक्त पैदा करते हैं। जो लोग दुष्प्रचार और हिंस...

संवैधानिक इस्तीफा या मजबूरी का मंथन – उपराष्ट्रपति धनखड़ का कदम और लोकतंत्र की गूंज

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संपादकीय 22 जुलाई 2025।   *"संवैधानिक इस्तीफा या मजबूरी का मंथन – उपराष्ट्रपति धनखड़ का कदम और लोकतंत्र की गूंज"*  देश की दूसरी सर्वोच्च संवैधानिक कुर्सी — उपराष्ट्रपति पद — से इस्तीफा देना कोई साधारण घटना नहीं होती। और जब यह इस्तीफा राजस्थान के झुंझुनूं जैसे जनमानस से जुड़े क्षेत्र के बेटे और भारत के प्रतिष्ठित नेता जगदीप धनखड़ द्वारा दिया जाए, तो यह सिर्फ एक राजनीतिक घटनाक्रम नहीं बल्कि जनचेतना का झटका बन जाता है। धनखड़ साहब ने अपने इस्तीफे में स्वास्थ्य कारणों का हवाला दिया है, लेकिन क्या यह केवल इतना भर है? यह वही देश है जहां आम आदमी डॉक्टर की सलाह के बावजूद सिगरेट नहीं छोड़ता, वहां एक सक्षम, सक्रिय और राजनीतिक रूप से सजग उपराष्ट्रपति अपना पद त्याग देता है — वह भी तब, जब देश चुनावी घमासान के मुहाने पर खड़ा है! स्वास्थ्य कारण बताकर दिया गया यह त्यागपत्र सवालों का बवंडर खड़ा करता है। क्या यह वास्तव में शारीरिक स्वास्थ्य है, या फिर राजनीतिक स्वास्थ्य से जुड़ी कोई गहरी बेचैनी? क्या उन्हें सत्ता के गलियारों में कुछ ऐसा दिखा जो अब अनदेखा नहीं किया जा सकता था? सव...

स्वार्थ नहीं, सारथ्य बनिए – संबंधों की असली दिशा

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संपादकीय : 21 जुलाई 2025  *"स्वार्थ नहीं, सारथ्य बनिए – संबंधों की असली दिशा"*  वर्तमान समय की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि मनुष्य ने तकनीकी और आर्थिक विकास में जितनी प्रगति कर ली है, उतनी ही गिरावट उसके भावनात्मक, नैतिक और संबंधों के स्तर पर देखी जा रही है। यही कारण है कि जीवन की आपाधापी में जहां भौतिक वस्तुओं की भरमार हो गई है, वहीं आत्मिक शांति, पारिवारिक संतुलन और रिश्तों की ऊष्मा खोती जा रही है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। हर सुबह की शुरुआत यदि आत्मचिंतन, प्रकृति के सान्निध्य और महापुरुषों की विचारधारा से हो, तो मन न केवल शुद्ध होता है, बल्कि भीतर से एक ऊर्जा का संचार भी होता है। ऐसे लोग दिन भर सकारात्मक, विनम्र और कर्मशील बने रहते हैं। यही मनोबल उन्हें कठिन परिस्थितियों में भी संतुलित रखता है। हममें से अधिकांश लोग दूसरों को तुच्छ समझने की भूल कर बैठते हैं—कोई छोटा पद पर हो, विरोधी हो, या फिर कोई असहज प्रश्न उठाने वाला। लेकिन यह समझना चाहिए कि जैसे एक छोटा-सा सांप, एक छोटी बीमारी या एक हलकी-सी चिंगारी बड़ा नुकसान कर सकती है, वैसे ही किसी को कम आं...

“ईर्ष्या और द्वेष – आत्मविनाश की अदृश्य आग* ”

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✒️ संपादकीय 20 जुलाई 2025  *“ईर्ष्या और द्वेष – आत्मविनाश की अदृश्य आग* ” आज के सामाजिक और मानसिक परिदृश्य में सबसे बड़ा रोग यदि कोई है, तो वह है – ईर्ष्या और उसका उग्र रूप द्वेष। यह मानसिक विकृति बाहर से दिखाई नहीं देती, परंतु भीतर ही भीतर एक मनुष्य को खोखला कर देती है। जब मनुष्य दूसरों की सफलता को देखकर दुखी होता है और यह चाहता है कि “मेरे पास भी वही हो”, तो यह ईर्ष्या कहलाती है। लेकिन जब यही भाव यह चाहने लगता है कि “उसके पास वो चीज न रहे”, तो यह द्वेष बन जाता है – और यहीं से शुरू होती है पतन की गाथा। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। आंतरिक अशांति की जड़ें: दूसरों से तुलना में छुपी हुई है। हमारा समाज आज तुलनात्मक मूल्यांकन की मानसिकता में जी रहा है। कोई भी व्यक्ति अपने सुख, सफलता और साधनों से संतुष्ट नहीं है। वह यह नहीं देखता कि उसके पास क्या है, बल्कि यह देखता है कि दूसरों के पास क्या है। सामने वाले का घर बड़ा क्यों है? उसकी गाड़ी मुझसे बेहतर क्यों है? वह समाज में प्रसिद्ध क्यों है, जबकि मैं नहीं? यह तुलनात्मक सोच ही ईर्ष्या का बीज है। और जब यह बीज मन में प...

"युवा शक्ति की दिशा बदलो: तभी राष्ट्र बनेगा सशक्त"

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संपादकीय: 19 जुलाई 2025  *"युवा शक्ति की दिशा बदलो: तभी राष्ट्र बनेगा सशक्त"*  "युवा शक्ति जब तक नशे, दिखावे और धार्मिक अंधानुकरण में उलझी रहेगी, तब तक राष्ट्र निर्माण एक अधूरा सपना ही रहेगा।" यह वाक्य केवल एक विचार नहीं, बल्कि हमारे वर्तमान समाज की जमीनी सच्चाई और भविष्य की चुनौती को रेखांकित करता है। आज का युवा, जो राष्ट्र की रीढ़ माना जाता है, वह अगर भटक जाए तो संपूर्ण समाज और राष्ट्र अपने लक्ष्य से दूर हो जाता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। भारत जैसे युवा देश में जहां जनसंख्या का सबसे बड़ा हिस्सा 18 से 35 वर्ष के बीच का है, वहां यह और भी चिंताजनक हो जाता है कि यह शक्ति आज नशे, सोशल मीडिया के दिखावे, धार्मिक अंधानुकरण और अराजक गतिविधियों में फंसती जा रही है। स्कूल-कॉलेज में पढ़ने वाले युवा आज किताबों की जगह रिल्स, ट्रेंड्स और तमाशों में मशगूल हैं। यह स्थिति केवल उनके भविष्य के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्र के लिए भी एक गहरी चिंता का विषय है।  *नशा और निकम्मापन: सबसे बड़ी चुनौती*  नशे की लत एक कैंसर की तरह युवाओं को खोखला कर रही है। पंजाब से ...

संकट ही चरित्र निर्माण की वास्तविक पाठशाला है

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संपादकीय  18 जुलाई 2025  *संकट ही चरित्र निर्माण की वास्तविक पाठशाला है*  जीवन की सफलता का मापदंड केवल सुख-सुविधाओं में नहीं होता, बल्कि वह संघर्षों में निखरते व्यक्तित्व में होता है। कठिनाइयां और समस्याएं हमें तोड़ने नहीं, बल्कि गढ़ने के लिए आती हैं। यह एक सार्वभौमिक सत्य है कि जब मनुष्य को सहज जीवन मिलता है, तब उसका व्यक्तित्व उतना दृढ़ नहीं बन पाता, जितना वह कठिन परिस्थिति में बनता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। मनुष्य का स्वभाव ऐसा है कि जब उसे अधिक छूट, आराम और सुख-सुविधाएं मिलती हैं तो वह धीरे-धीरे आलसी, निकम्मा और आत्ममुग्ध हो जाता है। परिणामस्वरूप, उसकी सोच संकीर्ण हो जाती है और क्रियाशीलता क्षीण। यही कारण है कि समाज में बहुत से लोग सुविधा के बावजूद जीवन में कोई ठोस पहचान नहीं बना पाते। दूसरी ओर, वे लोग जो अभाव, संघर्ष और कठिन परिस्थितियों से जूझते हैं – वही इतिहास रचते हैं। महात्मा गांधी, बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर, एपीजे अब्दुल कलाम, नारायण मूर्ति, कल्पना चावला – ये सभी जीवन के संघर्षों से तपकर निखरे हुए लोग हैं। डॉ. अंबेडकर ने बचप...

पत्रकार वाचनालय पर कुंडली मारती मंशाएं: सूचनाओं के मंदिर को मत बनाइए सत्ता की चौकी

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✍️ संपादकीय 17 जुलाई 2025  *"पत्रकार वाचनालय पर कुंडली मारती मंशाएं: सूचनाओं के मंदिर को मत बनाइए सत्ता की चौकी"*  राजस्थान प्रदेश के झुंझुनूं जिला मुख्यालय पर सूचना केंद्र में वर्षों से स्थापित पत्रकार वाचनालय केवल ईंट-पत्थर का भवन नहीं है, यह उस लोकतंत्र की नींव का हिस्सा है जो सूचना की पारदर्शिता, जन-चेतना, और स्वतंत्र अभिव्यक्ति पर टिका हुआ है। इस वाचनालय में बैठकर पत्रकार वह सामग्री तैयार करते हैं, जो समाज के अंधेरे कोनों में रोशनी फैलाती है। यह भवन पत्रकारों का कार्यस्थल नहीं, एक जनतांत्रिक चित्त की प्रयोगशाला है, जहां से खबरें नहीं, चेतना निकलती है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।  दुर्भाग्य है कि आज उसी वाचनालय को प्रशासनिक दबाव में एसीबी कार्यालय हेतु अलॉट करने की प्रक्रिया चलाई जा रही है। यह निर्णय सिर्फ भवन बदलने का नहीं, बल्कि स्वतंत्र पत्रकारिता को विस्थापित करने की कोशिश है। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब ज़िले में दर्जनों वैकल्पिक सरकारी भवन खाली पड़े हैं, तो फिर पत्रकारों की आत्मा बसे इस पवित्र स्थल पर ही निगाह क्यों? क्या प्रशासन क...

"कांवड़ की आड़ में दिशा से भटके युवा – आस्था या अवसरवादी अपव्यय?"

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संपादकीय 15 जुलाई 2025।  *"कांवड़ की आड़ में दिशा से भटके युवा – आस्था या अवसरवादी अपव्यय?"*  सावन का महीना आते ही देशभर की सड़कों पर भगवा वस्त्रों में लिपटे, कांवड़ उठाए युवाओं का एक विशाल जत्था हरिद्वार, गंगोत्री और अन्य तीर्थ स्थलों की ओर दौड़ पड़ता है। चारों ओर ‘बोल बम’ की गूंज और डीजे की धुनें वातावरण को धार्मिकता से अधिक शोरगुल और प्रदर्शन का रूप देने लगती हैं। लेकिन क्या यह सब वास्तव में "श्रद्धा" है? या यह निठलापन, सामाजिक भ्रम और दिशाहीनता का प्रतीक बन चुका है? यहां मैं पढ़ लूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। हमारे गांवों, कस्बों और पिछड़े क्षेत्रों के विद्यालयों से, खेतों से और घरों से ऐसे दृश्य आम हो चले हैं कि बच्चे स्कूल छोड़कर, युवा खेतों से काम छोड़कर और बेरोजगार नौजवान घरों की जिम्मेदारियों से मुंह मोड़कर कांवड़ यात्रा पर निकल पड़ते हैं। कांवड़ लाने की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक परंपरा, जहां कभी श्रवण कुमार जैसी भक्ति और त्याग का प्रतीक थी, आज वह चिलम, गांजा, भांग, डीजे और फ़ैशन परेड का आयोजन बनती जा रही है। गांवों के मोहल्लों में युवा दिखाई नहीं...

रोटी खिलाना नहीं, रोटी कमाना सिखाना है असली सेवा

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✍️ संपादकीय  14 जुलाई 2025 "रोटी खिलाना नहीं, रोटी कमाना सिखाना है असली सेवा" समाज सेवा का अर्थ वर्षों से हम केवल एक ही रूप में देखते आए हैं – गरीब को खाना खिलाना, कपड़े देना, और जरूरतमंद को चंद रुपए की सहायता कर देना। इसमें कोई दो राय नहीं कि यह मानवीय करुणा के प्रतीक हैं, लेकिन जब बात समाज को बदलने की हो, तो केवल दान नहीं, दिशा की आवश्यकता होती है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। एक भूखे को रोटी देना पुण्य का काम है, लेकिन उससे भी बड़ा पुण्य है, उसे रोटी कमाने का हुनर सिखा देना। क्योंकि एक समय की भूख मिट सकती है, लेकिन भूख की आदत को आत्मनिर्भरता में बदलना ही वास्तविक परिवर्तन है। आज भी हमारे आसपास हजारों लोग हैं जो दान पर निर्भर जीवन जी रहे हैं — वे हाथ फैलाने को मजबूर हैं, क्योंकि उनके पास हुनर नहीं, संसाधन नहीं और अवसर नहीं। यदि हम उन्हें हुनर दे दें, तो न केवल वे अपनी आजीविका स्वयं चला सकते हैं, बल्कि आत्मसम्मान के साथ जी सकते हैं। यही कारण है कि आज समाज को केवल "दानदाता" नहीं, दिशा-निर्देशक" की ज़रूरत है। हमें खाना बांटने से अधिक रो...

"आरटीई की असलियत: अधिकार नहीं, अपमान का दायित्व!"

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✍️ संपादकीय  13 जुलाई 2025   *"आरटीई की असलियत: अधिकार नहीं, अपमान का दायित्व!"*  शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 (Right to Education Act - RTE) इस आशा और आकांक्षा का प्रतीक था कि देश का हर बच्चा, चाहे वह किसी भी जाति, धर्म, वर्ग या आर्थिक पृष्ठभूमि से क्यों न हो, समान शिक्षा प्राप्त करेगा। लेकिन आज जब हम जमीनी हकीकत पर नजर डालते हैं, तो यह अधिनियम केवल किताबों में लिखी एक कानूनी भाषा बन कर रह गया है। इसका उद्देश्य था—जरूरतमंद और आर्थिक रूप से पिछड़े परिवारों के बच्चों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ना, लेकिन आज वह मुख्यधारा ही उन्हें किनारे लगा रही है। यहां यदि मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। निजी स्कूलों में 25% आरक्षण का प्रावधान गरीब तबके के बच्चों को अच्छी शिक्षा की उम्मीद देता है, लेकिन यथार्थ में यही आरक्षण इन बच्चों के लिए अपमान और उपेक्षा का कारण बनता जा रहा है। कई स्कूलों में आरटीई के तहत पढ़ने वाले बच्चों को दूसरे दर्जे का नागरिक माना जाता है। उन्हें अलग बैठाया जाता है, उन्हें प्रतियोगिताओं में भाग लेने नहीं दिया जाता, और यहां तक कि शिक्षक और ...

पेड़ लगवाने से पहले बच्चों को जड़ें दीजिए: सरकारी स्कूलों में शिक्षा या श्रम?

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✍️ संपादकीय 12 जुलाई 2025  *"पेड़ लगवाने से पहले बच्चों को जड़ें दीजिए: सरकारी स्कूलों में शिक्षा या श्रम?"*  आजकल राजस्थान के सरकारी विद्यालयों में एक नया चलन शुरू हुआ है—बच्चों को पौधे लगाने का टारगेट दिया गया है। पर्यावरण संरक्षण और संवर्धन का यह प्रयास प्रथम दृष्टया सराहनीय लग सकता है। लेकिन जब हम इस अभियान की पृष्ठभूमि और जिन बच्चों पर यह लागू किया जा रहा है, उनकी सामाजिक व आर्थिक स्थिति को देखते हैं, तो कई असहज प्रश्न जन्म लेते हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले अधिकांश छात्र अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ा वर्ग या आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों से आते हैं। वे वे बच्चे हैं जिनके माता-पिता दैनिक मजदूरी कर अपना पेट पालते हैं। उन्हें न तो घर में तकनीकी संसाधन मिलते हैं, न ही कोई गाइडेंस। यही नहीं, इन्हीं सरकारी स्कूलों में पढ़ाने वाले अधिकांश शिक्षक भी अपने बच्चों को निजी विद्यालयों में पढ़ा रहे हैं। यह एक करारा प्रश्न है—जब खुद शिक्षक सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता पर भरोसा नहीं कर पा रहे, तो समाज में विश्वास कैसे पैदा होगा?...

पीले रंग की परत में लिपटी लापरवाही- बाल वाहिनी की अनदेखी, युवाओं की सुरक्षा पर संकट

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✍️ संपादकीय 11 जुलाई 2025  *पीले रंग की परत में लिपटी लापरवाही*   *बाल वाहिनी की अनदेखी, युवाओं की सुरक्षा पर संकट*  आज की शिक्षा व्यवस्था में विद्यालय केवल शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों का संगम हैं। एक बड़ी जिम्मेदारी बच्चों की सुरक्षित घर से स्कूल और स्कूल से घर वापसी है — यही वह कड़ी है, जिसे ‘बाल वाहिनी’ कहा जाता है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि इस सुरक्षा के नाम पर एनसीआर की नकारा और खटारा बसों को पीले रंग की पोताई देकर सजाया-संवारा जा रहा है, ताकि वे ‘कानूनी दिखावटी बाल वाहिनी’ का रूप धरकर रोज़ाना सैकड़ों बच्चों को लापरवाही की राह पर ढो सकें।  बरसात का मौसम आते ही यह लापरवाही और भी भयावह रूप ले लेती है। फिसलती सड़कों पर जर्जर टायर, ब्रेक फेल होते वाहन, टूटे शीशे, दरवाजे में फंसी स्कूल यूनिफॉर्म, और ओवरलोडेड बसें—यह सब आज एक आम दृश्य बन गया है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। अधिकांश निजी स्कूल ट्रांसपोर्ट के नाम पर उन वाहनों को शामिल कर रहे हैं, जो रिटायर हो चुके हैं, आरटीओ के मापदंडों से बाहर हैं, और जिनकी कंडिशन देख कर आम ...

"व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी से निकले डॉक्टर: गांधी पीस फाउंडेशन नेपाल का डिग्री वाला धंधा"

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✍️ संपादकीय - 7 जुलाई 2025   *"व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी से निकले डॉक्टर: गांधी पीस फाउंडेशन नेपाल का डिग्री वाला धंधा"*  आज एक ऐसा दौर आ चुका है जहां "डॉक्टरेट" अब ज्ञान का प्रमाण नहीं, पैकेज्ड प्रतिष्ठा का तमाशा बन गया है। बात गांधी की  नहीं, गांधी पीस फाउंडेशन नेपाल की हो रही है — जो न तो भारत की मान्यता प्राप्त संस्था है, न यूजीसी से सम्बद्ध, न ही शिक्षा मंत्रालय की स्वीकृत सूची में दर्ज — फिर भी यह संस्था भारत के विभिन्न हिस्सों में "डॉक्टरेट" की उपाधियां बांट रही है, जैसे कोई मिठाई का डिब्बा बांटा जा रहा हो। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। आज देश में शिक्षा और शोध का सबसे बड़ा अपमान अगर कोई कर रहा है, तो वह है — गांधी पीस फाउंडेशन नेपाल जैसी वह संस्था, जो डॉक्टरेट की मानद उपाधियाँ नहीं, बल्कि “इमेज पैकेज” बेच रही है। यह न कोई विश्वविद्यालय है, न कोई शोध संस्थान। फिर भी, राजस्थान और हरियाणा के सीमावर्ती जिलों में फर्जी “डॉ.” तैयार करने का अघोषित कारखाना बन चुका है। 'डॉ.' का तमाशा: ना थीसिस, ना शोध — बस फोटो, माला और सर्टिफिक...

*रोज़गारहीन विकास और दिशाहीन युवा: देश के भविष्य पर मंडराता खतरा*

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✍️ संपादकीय 9 जुलाई 2025   *रोज़गारहीन विकास और दिशाहीन युवा: देश के भविष्य पर मंडराता खतरा*  भारत आर्थिक विकास की चमकती तस्वीर पेश कर रहा है। जीडीपी की तेज़ रफ्तार, चमकदार इंफ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल इंडिया और मेक इन इंडिया जैसी योजनाएँ आंकड़ों की दुनिया में बड़ी सफलता की कहानी बुन रही हैं। मगर इन आंकड़ों की परत के नीचे दबा हुआ सच यह है कि देश का सबसे बड़ा संसाधन — उसकी युवा शक्ति — आज सबसे बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। करोड़ों शिक्षित युवा हाथ में डिग्रियां लिए रोजगार की तलाश में दर-दर भटक रहे हैं। बेरोज़गारी अब केवल एक व्यक्तिगत संकट नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आपदा बनती जा रही है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। हर साल लाखों छात्र देशभर के विश्वविद्यालयों से पढ़कर निकलते हैं, लेकिन बाज़ार की ज़रूरत और शिक्षा की दिशा में कोई तालमेल नहीं दिखता। परिणामस्वरूप, एक ओर जहां लाखों युवा रोजगार की तलाश में भटक रहे हैं, वहीं उद्योग जगत को योग्य और प्रशिक्षित कर्मचारी नहीं मिल रहे। शहरों की तुलना में गांवों की स्थिति और भी खराब है। वहां स्किल्स की शिक्षा, तकनीकी प्रशिक...

हवा में बिखरता भरोसा: चूरू में वायुसेना के जगुआर क्रैश ने फिर खड़ा किया सवाल"

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✍️ संपादकीय 10 जुलाई 2025  "हवा में बिखरता भरोसा: चूरू में वायुसेना के जगुआर क्रैश ने फिर खड़ा किया सवाल" राजस्थान के चूरू जिले में एक बार फिर आसमान से चीख सुनाई दी — यह कोई युद्ध नहीं था, बल्कि भारतीय वायुसेना का एक और जगुआर लड़ाकू विमान क्रैश हो गया। हादसे में पायलट और को-पायलट की दर्दनाक मौत हो गई। विमान का मलबा गांव में बिखरा पड़ा था और शवों के चिथड़े दूर-दूर तक फैल गए। यह सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, यह भारत की वायु सुरक्षा नीति, विमान रखरखाव और पायलट प्रशिक्षण प्रणाली की खामियों का एक और भयावह प्रमाण है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। चौंकाने वाली बात यह है कि यह पहली घटना नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में मिग-21, सुखोई, तेजस और जगुआर जैसे कई विमान तकनीकी खराबियों और अन्य कारणों से क्रैश हो चुके हैं। चूरू की घटना ने फिर से यह सवाल खड़ा किया है कि आखिर भारत की वायुसेना के पुराने विमानों को कब तक उड़ाया जाएगा? जगुआर विमान, जो ब्रिटेन में 1960 के दशक में डिजाइन हुआ था और 1980 के दशक में भारतीय वायुसेना में शामिल किया गया — अब तकनीकी रूप से थका हुआ हो चुका है...

प्रकृति के क्रोध से पहले चेत जाएं: विनाश की आहट और मानवता की ज़िम्मेदारी

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संपादकीय 07-07-2025  *"प्रकृति के क्रोध से पहले चेत जाएं: विनाश की आहट और मानवता की ज़िम्मेदारी"*  वर्तमान समय में जो कुछ हमारे चारों ओर हो रहा है। अप्रत्याशित वर्षा, बाढ़, सूखा, भूस्खलन, लू, ओलावृष्टि, जल स्रोतों का सूखना—यह केवल मौसम नहीं है, यह प्रकृति की चेतावनी है। यह संकेत है कि हमने विकास के नाम पर जो विनाश किया है, अब वह हमें ही निगलने आ रहा है। भारत के कई राज्यों में बाढ़ का कहर है, तो कहीं किसान पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस रहे हैं। खेत या तो पानी में डूबे हैं या धूप से झुलस रहे हैं। यह केवल “प्राकृतिक घटना” नहीं है, बल्कि मानवजनित आपदा है—जिसकी नींव हमने स्वयं रखी है, अपने लालच, लापरवाही और तथाकथित विकास की अंधी दौड़ में आखिर विकास की परिभाषा क्या हो। पुनर्विचार की आवश्यकता है यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।  विकास का अर्थ क्या केवल कंक्रीट की इमारतें, चौड़ी सड़कें, चमकती गाड़ियां, और हरे पेड़ों की जगह हरे रंग के पेंट से भरी दीवारें हैं? कभी गाँवों में बावड़ियाँ, तालाब, कुएँ और चारागाह हुआ करते थे—अब वे ग़ायब हैं। हमने पेड़ काटे, पहाड़ ख...

रील में उलझी रियल ज़िंदगी: लाइक्स के लिए लड़ते रिश्ते, फिल्टर में छिपा खालीपन

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संपादकीय 5 जुलाई 2025  *"रील में उलझी रियल ज़िंदगी: लाइक्स के लिए लड़ते रिश्ते, फिल्टर में छिपा खालीपन"*  "लाइक्स बढ़ रहे हैं, लेकिन ज़िंदगी 'लो बैटरी' मोड में जा रही है।" कभी रिश्ते आंखों में उतरते थे, अब स्क्रीन पर टिकते हैं। कभी इंसान बोलता था, आज वो स्टोरी डालता है। ‘रील’ ने हमारी ‘रियलिटी’ को कैसे निगल लिया, इसका अंदाज़ा अब तब होता है जब परिवार में बात करने के लिए वीडियो कॉल करना पड़ता है—वो भी एक-दूसरे के कमरे से! यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। आज हर हाथ में मोबाइल है, और हर आंखें रीलों में गड़ी हैं। जो दिखता है, वही बिकता है—यह बाजारवाद अब सामाजिक संबंधों में भी उतर आया है। सोशल मीडिया ने एक नया ‘डिजिटल थियेटर’ रच दिया है, जिसमें हर इंसान एक अभिनेता है। भावनाएं स्क्रिप्टेड, खुशियां फिल्टर्ड, और दुख – अपलोड न करने योग्य। जो प्लेटफॉर्म कभी जुड़ने के लिए था, अब वह तुलना और प्रतिस्पर्धा का अखाड़ा बन गया है। “उसके पास आईफोन  है, मुझे भी लेना है”, “उसने दुबई घूम लिया, मुझे भी दिखाना है।” इस दिखावे की दौड़ में इंसान थकता जा रहा है, पर...

सर्वोच्च न्यायालय का समावेशी कदम: न्याय अब व्यवस्था में भी

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संपादकीय 4 जुलाई 2025  *"सर्वोच्च न्यायालय का समावेशी कदम: न्याय अब व्यवस्था में भी"*  भारत के लोकतांत्रिक ढांचे की सबसे ऊँची संवैधानिक संस्था सुप्रीम कोर्ट — ने एक ऐसा ऐतिहासिक फैसला लिया है जो न केवल प्रतीकात्मक है, बल्कि सामाजिक न्याय की भावना को वास्तविक अर्थों में क्रियान्वित करता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 में समानता, अवसर की समता और आरक्षण की जो गारंटी दी गई है, वह लोकतंत्र की आत्मा मानी जाती है। किंतु दुर्भाग्यवश, अब तक यह गारंटी उन संस्थानों पर ही लागू नहीं थी जो इन सिद्धांतों की रक्षा के लिए सबसे अधिक उत्तरदायी हैं — जैसे कि भारत का सर्वोच्च न्यायालय। लेकिन अब यह ऐतिहासिक अन्याय सुधारा गया है। 23 जून 2025 को भारत के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में लिए गए एक अभूतपूर्व निर्णय के तहत सुप्रीम कोर्ट प्रशासन ने अपने गैर-न्यायिक पदों पर आरक्षण लागू करने की घोषणा की है। यह निर्णय एक संवेदनशील और प्रगतिशील सोच का परिचायक है जो न केवल कानून की भाषा को, बल्कि उसके व्यवहारिक स्वरूप को भी न्यायोचित बनाता है...

"कागज़ों में मरा आदमी: सिस्टम की जीवंत लापरवाही पर एक तीखा व्यंग्य"

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संपादकीय  3 जुलाई 2025  *"कागज़ों में मरा आदमी: सिस्टम की जीवंत लापरवाही पर एक तीखा व्यंग्य"*  सिस्टम का पेट इतना बड़ा हो गया है कि अब यह ज़िंदा लोगों को भी पचा जाता है और दस्तावेज़ों में उन्हें 'मृत' घोषित कर देता है। कानपुर में घटित यह घटना, जहाँ एक जीवित युवक को पुलिस और प्रशासन मिलकर पोस्टमॉर्टम के लिए भेजने की तैयारी कर चुके थे, न केवल हास्यास्पद है, बल्कि यह सरकारी तंत्र की गंभीरतम लापरवाही और संवेदनहीनता पर करारा तमाचा है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगी कि बोलता है। सोचिए, एक सामान्य युवक थाने पहुंचकर गिड़गिड़ा रहा है – "साहब! मैं जिंदा हूं, मेरा पोस्टमॉर्टम रुकवाइए, नहीं तो कागजों में मैं मृत रहूंगा।" यह कोई फ़िल्मी संवाद नहीं, बल्कि एक जीवंत व्यक्ति की प्रशासन के आगे मरने से पहले की अंतिम पुकार है। और यह कोई पहली घटना नहीं, यह हमारे तंत्र की जड़ हो चुकी बेरुखी और कागज़ी कार्यप्रणाली का जीवंत उदाहरण है। यह घटना सिर्फ पुलिस विभाग की नहीं, बल्कि उस पूरे ‘कागज़ी राज’ की पोल खोलती है, जहां कागज़ों की मौत इंसान की ज़िंदगी से बड़ी हो जाती है। पं...

“इलाज या उद्योग?—जब जीवन की सांसों पर व्यापार का पहरा बैठ जाए”

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✍️ संपादकीय 01-07-2025  *“इलाज या उद्योग?—जब जीवन की सांसों पर व्यापार का पहरा बैठ जाए”*  हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ 'इलाज' का अर्थ धीरे-धीरे बदल रहा है। पहले जहाँ चिकित्सक को "धरती का भगवान" कहा जाता था, आज वही चिकित्सक कई बार कॉरपोरेट अस्पताल की चकाचौंध में 'सुविधा का विक्रेता' बनता दिखाई देता है। यह विडंबना नहीं, बल्कि वर्तमान चिकित्सा व्यवस्था का त्रासदीपूर्ण सच है — एक ऐसा सच जिसे नकारना खुद से मुंह मोड़ने जैसा होगा। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। मरीज नहीं, 'पैकेज' है इंसान जिसे कभी "रोगी" कहा जाता था, वह अब 'क्लेम जनरेटिंग केस' बन गया है। अस्पतालों की भाषा बदल चुकी है—“इस मरीज में कितना स्कोप है?”, “कितना बिल बनेगा?”, “पैकेज कितना खिंच सकता है?”। ICU, MRI, टेस्ट, स्कैन — हर उपचार एक नंबर बन चुका है, और हर मरीज एक 'टारगेट'। बुजुर्गों के साथ जो हो रहा है, वह तो हमारी सभ्यता पर प्रश्नचिह्न है। 80-85 वर्ष की उम्र में जब व्यक्ति को सुकून, परिवार का साथ और शांत वातावरण की जरूरत होती है, उसे अस्प...