पेड़ लगवाने से पहले बच्चों को जड़ें दीजिए: सरकारी स्कूलों में शिक्षा या श्रम?
✍️ संपादकीय
12 जुलाई 2025
*"पेड़ लगवाने से पहले बच्चों को जड़ें दीजिए: सरकारी स्कूलों में शिक्षा या श्रम?"*
आजकल राजस्थान के सरकारी विद्यालयों में एक नया चलन शुरू हुआ है—बच्चों को पौधे लगाने का टारगेट दिया गया है। पर्यावरण संरक्षण और संवर्धन का यह प्रयास प्रथम दृष्टया सराहनीय लग सकता है। लेकिन जब हम इस अभियान की पृष्ठभूमि और जिन बच्चों पर यह लागू किया जा रहा है, उनकी सामाजिक व आर्थिक स्थिति को देखते हैं, तो कई असहज प्रश्न जन्म लेते हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले अधिकांश छात्र अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ा वर्ग या आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों से आते हैं। वे वे बच्चे हैं जिनके माता-पिता दैनिक मजदूरी कर अपना पेट पालते हैं। उन्हें न तो घर में तकनीकी संसाधन मिलते हैं, न ही कोई गाइडेंस। यही नहीं, इन्हीं सरकारी स्कूलों में पढ़ाने वाले अधिकांश शिक्षक भी अपने बच्चों को निजी विद्यालयों में पढ़ा रहे हैं। यह एक करारा प्रश्न है—जब खुद शिक्षक सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता पर भरोसा नहीं कर पा रहे, तो समाज में विश्वास कैसे पैदा होगा?
पेड़ लगाना, किचन गार्डन बनाना, साफ-सफाई करना—ये सब कार्य यदि “शैक्षणिक परियोजना” के रूप में हो तो ठीक है। लेकिन जब इन कार्यों को नियमित जिम्मेदारी के रूप में बच्चों पर थोप दिया जाता है, तब यह शिक्षा नहीं, एक तरह की छुपी हुई बाल श्रम व्यवस्था बन जाती है। यह उस विद्यार्थी के साथ अन्याय है जो स्कूल इसलिए आया था कि वह जीवन में कुछ बन सके, न कि झाड़ू लगाने और पौधे सींचने की डिग्री लेकर लौटे।
दुखद पहलू यह है कि शिक्षा विभाग और सरकारी सिस्टम केवल “आंकड़े” प्रस्तुत करने में लगे हैं—कितने बच्चों का नामांकन हुआ, कितने पौधे लगाए, कितनी कक्षाओं में कितने बच्चों ने भाग लिया। लेकिन किसी ने यह नहीं देखा कि उन बच्चों के घरों में चूल्हा कितने दिन जला? क्या उन्हें स्कूल से लौटकर होमवर्क करने का समय या जगह मिलती है?
AI, डिजिटल इंडिया, NEP 2020 की बात करने वाला देश अगर आज भी गांव के बच्चों को पौधे लगाने और टॉयलेट साफ करने में लगाकर “चरित्र निर्माण” कहे, तो यह एक खतरनाक भ्रांति है। हकीकत यह है कि शिक्षा को एक मिशन नहीं, मिशनरी स्कूलों का बिजनेस मॉडल बनाकर देखना बंद करना होगा। वरना गरीब का बच्चा स्कूल भी जाए तो उसके हिस्से में सिर्फ पसीना और मेहनत आएगी, तरक्की और तकनीक नहीं।
यहां सोचने की जरूरत है कि यदि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे सिर्फ श्रम का अभ्यास करते रहेंगे और तकनीकी, भाषा, गणित, विज्ञान, नवाचार और डिजिटल साक्षरता से दूर रहेंगे, तो क्या वो अपने समानधर्मी निजी विद्यालयों के विद्यार्थियों से प्रतिस्पर्धा कर पाएंगे? नहीं। यह एक सामाजिक अन्याय है जो शिक्षा के नाम पर किया जा रहा है।
इसलिए आवश्यकता है कि शिक्षा विभाग आंकड़ों के पीछे भागने के बजाय ज़मीन पर जाकर उन बच्चों की सामाजिक, मानसिक और शैक्षणिक जरूरतों को समझे। शिक्षक केवल प्रवेश के समय घर-घर दस्तक देकर भर्ती बढ़ाने का कार्य न करें, बल्कि पूरे वर्ष अपने विद्यार्थियों के अभिभावकों से संवाद बनाए रखें। डिजिटल टूल्स, स्किल डेवलपमेंट और समावेशी शिक्षण की ओर गंभीर प्रयास हो।
जब तक सरकारी विद्यालयों को “गरीबों की जेल” और निजी विद्यालयों को “समृद्धि की चाबी” माना जाएगा, तब तक समाज की असल तरक्की संभव नहीं।
पेड़ लगाने से पहले उन बच्चों को जड़ दीजिए, जो पीढ़ियों से सिर्फ बोझ ढोते आ रहे हैं। तभी सच्चा विकास होगा।
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