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Showing posts from March, 2025

एक सच यह भी: दुख में अपनापन और सुख में परायापन

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*संपादकीय:*  1 अप्रैल 2025   *एक सच यह भी: दुख में अपनापन और सुख में परायापन*  "दुख में सुमिरन सब करें, सुख में करे न कोय।  सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे को होय।" देखो! दुनिया में दर्द भी कितना खुश नसीब है, जिसे पाकर लोग अपनों को याद करते हैं। और दौलत कितनी बदनसीब है, जिसे पाकर लोग अपनों को ही भूल जाते हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। सुख-दुख यह संसार की रीत है। आज जिसकी हार है तो कल उसकी जीत है। कौन है इस दुनिया में जिस पर विपत्ता आई नहीं। क्या राम और घनश्याम पर ऐसी काली घटा छाई नहीं। दुख रात है तो सुख दिन है। हर रात बीत जाने के बाद सवेरा आवश्यक होता है। जीवन में सुख और दुख का चक्र चलता रहता है, और यह निश्चित है कि दुख के बाद सुख की घड़ी अवश्य आएगी। जैसे एक मां अपने बच्चे को जन्म देती है और उस दर्द को भूल जाती है, वैसे ही एक पिता अपने बच्चों के लिए काम करता है और उनके उज्जवल भविष्य को देखकर अपने सारे कष्टों को भूल जाता है। इसी प्रकार, जीवन में दौलत की महत्ता होती है, लेकिन यह भी महत्वपूर्ण है कि दौलत को कैसे उपयोग किया ज...

सद्संस्कार: जीवन की मजबूत नींव

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*संपादकीय:* दिनांक 31 मार्च 2025  *सद्संस्कार: जीवन की मजबूत नींव*  आज के समय में जब समाज में विभिन्न प्रकार की समस्याएं बढ़ रही हैं, तब सद्संस्कार का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। सद्संस्कार न केवल हमारे जीवन को सुखी और शांतिपूर्ण बनाते हैं, बल्कि हमारे समाज को भी मजबूत और संगठित बनाते हैं। जहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। सद्संस्कार हमें अपने परिवार, समाज और देश के प्रति जिम्मेदार बनाते हैं। ये हमें सहनशीलता, सहयोग और सेवा की भावना से भर देते हैं। जब हमारे परिवार में सद्संस्कार होते हैं, तो हमारे बच्चे भी इन्हीं संस्कारों को सीखते हैं और आगे चलकर समाज में एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में योगदान करते हैं। आजकल के समय में जब लोग अपने स्वार्थ में इतने व्यस्त हो गए हैं कि वे अपने परिवार और समाज के लिए समय नहीं निकाल पा रहे हैं, तब सद्संस्कार की आवश्यकता और भी अधिक बढ़ जाती है। हमें अपने जीवन में सद्संस्कारों को अपनाना चाहिए और अपने परिवार और समाज के लिए समय निकालना चाहिए। सद्संस्कार हमें एक दूसरे के प्रति सहानुभूति और करुणा की भावना से भर देते हैं। जब हम अपने...

समय और सांसें: जीवन के दो अमूल्य धन

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संपादकीय 28 मार्च 2025 HIRD हॉस्टल नीलोखेड़ी।  *समय और सांसें: जीवन के दो अमूल्य धन*    समय ही धन है। हर व्यक्ति के जीवन में समय एक ऐसी संपत्ति है। जो मुफ्त में मिलती है। यह समय रूपी संपत्ति जो खो जाने यि बीत जाने के बाद कभी वापस लौट कर नहीं आती है। समय अपनी धूरी पर गति करता है। समय की धूरी के साथ व्यक्ति अपनी प्रगति कर सकता है। समय का सिद्धांत है, यदि समय के साथ कोई व्यक्ति नहीं चलता है। तो वह उसे किनारे पर धकेल कर समय आगे बढ़ जाता है। जीवन में समय कभी लौटकर नहीं आया इसलिए समय की कदर करना सीखें, जो बीत गया उसे बिसराई है और मूल्यांकन कीजिए आगे बढ़िए ,क्योंकि आने वाले समय के साथ फिर तालमेल नहीं बना तो यह समय भी बीत जाएगा बीता हुआ समय कभी लौटकर नहीं आता है। ठीक उसी प्रकार से जीवन में सासों का भी निश्चित दायरा है। व्यक्ति को अपने सांसों का भी कदर करना सीखना चाहिए क्योंकि जीवन में समय और सांसें दो ऐसे अमूल्य धन हैं जो हमें प्राप्त होते हैं। ये दोनों ही निश्चित और सीमित हैं, इसलिए इनका समझदारी से उपयोग करना आवश्यक है। समय जीवन का सबसे कीमती संसाधन है। यह ऐसा अमूल्य...

*ये कैसी न्याय: यौन अपराध को लेकर भ्रामक निर्णय

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संपादकीय  26 मार्च 2025  *ये कैसी न्याय: यौन अपराध को लेकर भ्रामक निर्णय*  "लगेगी आग तो आएंगे कई घर जद में, यहां पर सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है।" कानून का मतलब केवल अपराधी को सजा देना ही नहीं, बल्कि ऐसी अपराध की घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए प्रभावी अथॉरिटी रूल्स के रूप में काम में आती है लेकिन आजकल मुंबई हाई कोर्ट इलाहाबाद के विवादित बयान के बाद न्याय व्यवस्था की शाख के प्रति आम जल की भावना में जो गिरावट आई है। वह बड़ा चिंता का विषय है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।  इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक हालिया निर्णय ने पूरे देश में आक्रोश पैदा किया है, जिसमें कहा गया है कि लड़की के स्तन पकड़ना, नाड़ा खोलना और पुलिया के नीचे ले जाना बलात्कार का प्रयास नहीं है। यह निर्णय न केवल महिलाओं के अधिकारों के लिए खतरनाक है, बल्कि यह यौन अत्याचारों के प्रति शिथिलता को भी बढ़ावा देता है। इस निर्णय के विरोध में देश भर में महिला संगठनों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने आवाज उठाई है। उन्होंने तर्क दिया है कि यह निर्णय महिलाओं के शरीर की स्वतंत्रता और गरिमा का उ...

पवित्र हृदय: जीवन की सफलता की कुंजी

संपादकीय 25 मार्च 2025 नीलोखेड़ी करनाल।  *पवित्र हृदय: जीवन की सफलता की कुंजी* जीवन मसफ लता प्राप्त करने के लिए कई कारक महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण कारक है पवित्र हृदय। पवित्र हृदय से ही हम महान कार्य संपन्न कर सकते हैं और अपने जीवन को सफल बना सकते हैं। पवित्र हृदय का अर्थ है अपने दिल की आवाज़ सुनना और उसका अनुसरण करना। यह हमें सही और गलत के बीच का अंतर समझने में मदद करता है और हमें उचित निर्णय लेने में सक्षम बनाता है। पवित्र हृदय हमें अपने जीवन में उच्च चरित्र विकसित करने में मदद करता है, जो हमें सफलता की ओर ले जाता है। मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। पवित्र हृदय से ही महान कार्य संपन्न हो सकते हैं । इसलिए यदि हमारे जीवन का लक्ष्य श्रेष्ठ है तो हमारे हृदय की भावनायें भी निर्मल होनी चाहिए। उच्च चरित्र को विकसित करने के लिए दृढ़ता, धैर्य की आवश्यकता होती है। इसमें सही काम को उस समय तक बार-बार करना शामिल है, जब तक कि यह आदत न बन जाए। पवित्रता पवित्र आदतों से पोषित होती है। अनुशासन और शिष्यत्व के बीच आध्यात्मिक और साथ ही व्युत्पत्ति संबंधी संबंध है। इसलिए हृदय की ...