एक सच यह भी: दुख में अपनापन और सुख में परायापन
*संपादकीय:* 1 अप्रैल 2025 *एक सच यह भी: दुख में अपनापन और सुख में परायापन* "दुख में सुमिरन सब करें, सुख में करे न कोय। सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे को होय।" देखो! दुनिया में दर्द भी कितना खुश नसीब है, जिसे पाकर लोग अपनों को याद करते हैं। और दौलत कितनी बदनसीब है, जिसे पाकर लोग अपनों को ही भूल जाते हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। सुख-दुख यह संसार की रीत है। आज जिसकी हार है तो कल उसकी जीत है। कौन है इस दुनिया में जिस पर विपत्ता आई नहीं। क्या राम और घनश्याम पर ऐसी काली घटा छाई नहीं। दुख रात है तो सुख दिन है। हर रात बीत जाने के बाद सवेरा आवश्यक होता है। जीवन में सुख और दुख का चक्र चलता रहता है, और यह निश्चित है कि दुख के बाद सुख की घड़ी अवश्य आएगी। जैसे एक मां अपने बच्चे को जन्म देती है और उस दर्द को भूल जाती है, वैसे ही एक पिता अपने बच्चों के लिए काम करता है और उनके उज्जवल भविष्य को देखकर अपने सारे कष्टों को भूल जाता है। इसी प्रकार, जीवन में दौलत की महत्ता होती है, लेकिन यह भी महत्वपूर्ण है कि दौलत को कैसे उपयोग किया ज...