*ये कैसी न्याय: यौन अपराध को लेकर भ्रामक निर्णय

संपादकीय 
26 मार्च 2025
 *ये कैसी न्याय: यौन अपराध को लेकर भ्रामक निर्णय* 
"लगेगी आग तो आएंगे कई घर जद में, यहां पर सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है।"
कानून का मतलब केवल अपराधी को सजा देना ही नहीं, बल्कि ऐसी अपराध की घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए प्रभावी अथॉरिटी रूल्स के रूप में काम में आती है लेकिन आजकल मुंबई हाई कोर्ट इलाहाबाद के विवादित बयान के बाद न्याय व्यवस्था की शाख के प्रति आम जल की भावना में जो गिरावट आई है। वह बड़ा चिंता का विषय है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। 
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक हालिया निर्णय ने पूरे देश में आक्रोश पैदा किया है, जिसमें कहा गया है कि लड़की के स्तन पकड़ना, नाड़ा खोलना और पुलिया के नीचे ले जाना बलात्कार का प्रयास नहीं है। यह निर्णय न केवल महिलाओं के अधिकारों के लिए खतरनाक है, बल्कि यह यौन अत्याचारों के प्रति शिथिलता को भी बढ़ावा देता है।
इस निर्णय के विरोध में देश भर में महिला संगठनों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने आवाज उठाई है। उन्होंने तर्क दिया है कि यह निर्णय महिलाओं के शरीर की स्वतंत्रता और गरिमा का उल्लंघन करता है।
हाल ही में, दिल्ली में "हिंदुस्तान टाइम्स" की एक महिला रिपोर्टर के साथ एक पुलिसकर्मी द्वारा दुर्व्यवहार किया गया। यह घटना इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय के विरोध में हो रहे प्रदर्शनों के बीच में हुई है।
दिल्ली में "हिंदुस्तान टाइम्स" की महिला रिपोर्टर की स्तन दबाने के  विरोध में मिडिया का प्रदर्शन!
काश पत्रकारों के द्वारा इलाहाबाद हाई कोर्ट के  जस्टिस राममनोहर नारायण मिश्रा के अराजक फैसले "लड़की के स्तन पकड़ना, नाड़ा खोलना और पुलिया के नीचे ले जाना बलात्कार का प्रयास नहीं" को लेकर मिडिया हाउस में आलोचना हुई होती। तो आज दिल्ली पुलिस मुख्यालय के सामने देश के प्रतिष्ठित अखबार "हिंदुस्तान टाइम्स" की महिला रिपोर्टर का स्तन दबाने का दु:साहस एक पुलिस वाला नहीं करता।
सभ्य समाज के लिए चिंता का विषय यह है कि आरोपित पुलिस का कहना कि स्कूल की छात्रा समझ कर ऐसी हरकत कर बैठा। तो सवाल उठता है क्या स्कूली छात्रा का स्तन दबाना अपराध नहीं है?
हो सकता है पुलिस वाला जानबूझ कर यह हरकत किया होगा कि उच्च न्यायालय तो स्तन दबाने को बलात्कार करने की प्रयास के श्रेणी से बाहर कर दिया।
अब देखना दिलचस्प होगा कि महिला पत्रकार भारतीय दंड संहिता की किस धारा के तहत मामला दर्ज करवाती है।
निर्वस्त्र किए बगैर नाबालिग को छूना यौन उत्पीड़न नहीं : बॉम्बे हाईकोर्ट ने पॉक्सो एक्ट में दोषी करार आरोपी की सजा घटाने के लिए जो फैसला सुनाया। इस फैसले की भी पूरे देश में इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले की तरह ही आलोचना हो रही है। मुंबई हाई कोर्ट और इलाहाबाद हाई कोर्ट के दोनों तात्कालिक निर्णय से महिला सुरक्षा संरक्षण की समस्या को लेकर तरह-तरह की टिप्पणियां सामने आ रही है।
मुंबई बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा कि किसी नाबालिग को निर्वस्त्र किए बगैर उसके शरीर को छूना यौन उत्पीड़न नहीं माना जा सकता। ऐसा कृत्य पोक्सो एक्ट में यौत हमले के रूप में परिभाषित नहीं हो सकता। पोक्सों में मजबूत साक्ष्य व गंभीर आरोप होने चाहिए। ऐसे केस के आरोपी पर आइपीसी की धारा 354 (शील भंग) में मुकदमा चलाया जाना चाहिए।
बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर पीठ की जस्टिस पुष्पा गनेडीवाला ने अपने फैसले में कहा कि यौन हमले का कृत्य माने जाने के लिए, यौन मंशा से स्किन से रिकन का संपर्क होना जरूरी है। महज छूना भर यौन हमले की परिभाषा में नहीं आता।
जस्टिस पुष्पा गनेडीवाला, बॉम्बे हाई कोर्ट यौन हमले मानने के लिए यौन मंशा से स्किन से स्किन का संपर्क जरूरी है। महज छूना यौन हमले की परिभाषा नहीं आता।  उन्होंने पोक्सो एक्ट में ये है यौन हमले की व्याख्या की है, जब कोई यौन मंशा से बच्ची-बच्चे के निजी अंगों को छूता है या उनसे अपने या किसी अन्य व्यक्ति के निजी अंग को छूता है या यौन मंशा से कोई अन्य कृत्य करता है, जिसमें संभोग किए बगैर यौन संबंध से शारीरिक संपर्क शामिल हो. उसे यौन हमला कहा जाता है। यह नागपुर की घटना में कहा गया है कि नाबालिग लड़की के यौन उत्पीड़न पर सत्र अदालत ने 39 साल के आरोपी सतीश को 3 साल जेल की सजा दी थी। प्रकरणानुसार 2016 में आरोपी सतीश नागपूर में लड़की को खाने का सामान देने के बहाने घर ले गया। उसने लड़की के सीने को हुआ और उसे निर्वस्त्र करने की कोशिश की। हाई कोर्ट ने कहा, चूंकि आरोपी ने लड़की को निर्वस्त्र किए बिना उसके सीने को छूने की कोशिश  की इसे यौन हमला नहीं कहा जा सकता। यह धारा 354 के तहत महिला के शील को भंग करने का अपराध है। धारा 354 में न्यूनतम सजा एक वर्ष वहीं पोक्सों में न्यूनतम सजा 3 वर्ष की कैद है।
यह घटनाएं यह दर्शाती है कि महिलाओं के प्रति यौन अत्याचारों की समस्या अभी भी हमारे समाज में व्याप्त है। यह हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हमारे न्यायालय महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करने में विफल हो रहे हैं?
इस प्रश्न का उत्तर ढूंढने के लिए, हमें अपने न्यायिक प्रणाली में सुधार करने की आवश्यकता है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारे न्यायालय महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करने में सक्षम हों और यौन अत्याचारों के प्रति शिथिलता को बढ़ावा न दें।

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