एक सच यह भी: दुख में अपनापन और सुख में परायापन
*संपादकीय:*
1 अप्रैल 2025
*एक सच यह भी: दुख में अपनापन और सुख में परायापन*
"दुख में सुमिरन सब करें, सुख में करे न कोय।
सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे को होय।"
देखो! दुनिया में दर्द भी कितना खुश नसीब है, जिसे पाकर लोग अपनों को याद करते हैं। और दौलत कितनी बदनसीब है, जिसे पाकर लोग अपनों को ही भूल जाते हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
सुख-दुख यह संसार की रीत है। आज जिसकी हार है तो कल उसकी जीत है। कौन है इस दुनिया में जिस पर विपत्ता आई नहीं। क्या राम और घनश्याम पर ऐसी काली घटा छाई नहीं। दुख रात है तो सुख दिन है। हर रात बीत जाने के बाद सवेरा आवश्यक होता है।
जीवन में सुख और दुख का चक्र चलता रहता है, और यह निश्चित है कि दुख के बाद सुख की घड़ी अवश्य आएगी। जैसे एक मां अपने बच्चे को जन्म देती है और उस दर्द को भूल जाती है, वैसे ही एक पिता अपने बच्चों के लिए काम करता है और उनके उज्जवल भविष्य को देखकर अपने सारे कष्टों को भूल जाता है।
इसी प्रकार, जीवन में दौलत की महत्ता होती है, लेकिन यह भी महत्वपूर्ण है कि दौलत को कैसे उपयोग किया जाए। दौलत सिर्फ़ एक साधन है, और इससे व्यक्ति की पहचान नहीं बनती। पहचान उन गुणों और कौशल से बनती है जो व्यक्ति ने अपने जीवन में अर्जित किए होते हैं।
दौलत इतनी होनी चाहिए कि दो वक्त की रोटी के लिए किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े। लेकिन इंसान की अपनी जरूरत के लिए तो होना चाहिए ताकि बुढ़ापे में बच्चों पर निर्भर न रहना पड़े।
इसलिए, हमें दौलत की महत्ता को समझना चाहिए और इसका उपयोग अपने जीवन को सुखी और संतुष्ट बनाने के लिए करना चाहिए। हमें अपने गुणों और कौशल को विकसित करना चाहिए ताकि हम अपनी पहचान बना सकें और अपने जीवन को सफल बना सकें।
इंसान के जीवन में सुख दुख चलते रहते हैं और यह भी निश्चित है कि दुख के बाद सुख की घड़ी अवश्य ही आएगी । जैसे एक मां जब वह अपनी संतान को जन्म देती है तो वह कितने दर्द से गुजरती है वह केवल एक मां ही जानती है परंतु जब उसका बच्चा उसकी बाहों में होता है तो वह उस दर्द को पलभर में ही भूल जाती है । उसे इतनी खुशी का अनुभव होता है । इसी प्रकार एक पिता इतनी मेहनत करके दर बदर की ठोकरें खाकर अपने बच्चों के लिए काम करता है । खुद भूखा रहकर अपने बच्चों का पेट पालता है, अच्छी शिक्षा देकर उनका उज्जवल भविष्य बनाता है और जब उसका बच्चा खुद कमाने योग्य या अपने पिता का हाथ बढ़ाने वाला बनता है तो वह अपने सारे कष्टों को भूल जाता है।
जहां तक दौलत का संबंध है, अधिकांश दौलत तो इंसान को विरासत में मिलती है, लेकिन उसे पहचान तो अपने दम पर ही बनानी पड़ती है, इस बात को इस तरह से समझा जा सकता है कि विरासत से मिली दौलत सिर्फ़ एक साधन है । इससे व्यक्ति की पहचान नहीं बनती बल्कि इंसान को अपनी पहचान के लिए खुद ही प्रयास करने होते हैं क्योंकि पहचान उन गुणों और कौशल से बनती है, जो व्यक्ति ने अपने जीवन में अर्जित किए होते हैं । दौलत इतनी तो होनी चाहिए कि दो वक्त की रोटी के लिए किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े। पैसा कितना भी हो, कम ही लगता है ।लेकिन इंसान की अपनी जरूरत के लिए तो होना चाहिए ताकि बुढ़ापे में बच्चों पर निर्भर न रहना पड़े।
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