सद्संस्कार: जीवन की मजबूत नींव
*संपादकीय:*
दिनांक 31 मार्च 2025
*सद्संस्कार: जीवन की मजबूत नींव*
आज के समय में जब समाज में विभिन्न प्रकार की समस्याएं बढ़ रही हैं, तब सद्संस्कार का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। सद्संस्कार न केवल हमारे जीवन को सुखी और शांतिपूर्ण बनाते हैं, बल्कि हमारे समाज को भी मजबूत और संगठित बनाते हैं। जहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
सद्संस्कार हमें अपने परिवार, समाज और देश के प्रति जिम्मेदार बनाते हैं। ये हमें सहनशीलता, सहयोग और सेवा की भावना से भर देते हैं। जब हमारे परिवार में सद्संस्कार होते हैं, तो हमारे बच्चे भी इन्हीं संस्कारों को सीखते हैं और आगे चलकर समाज में एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में योगदान करते हैं।
आजकल के समय में जब लोग अपने स्वार्थ में इतने व्यस्त हो गए हैं कि वे अपने परिवार और समाज के लिए समय नहीं निकाल पा रहे हैं, तब सद्संस्कार की आवश्यकता और भी अधिक बढ़ जाती है। हमें अपने जीवन में सद्संस्कारों को अपनाना चाहिए और अपने परिवार और समाज के लिए समय निकालना चाहिए।
सद्संस्कार हमें एक दूसरे के प्रति सहानुभूति और करुणा की भावना से भर देते हैं। जब हम अपने परिवार और समाज में सद्संस्कारों को अपनाते हैं, तो हमारे बीच की दूरियां कम हो जाती हैं और हम एक दूसरे के साथ जुड़ जाते हैं।
इसलिए, हमें अपने जीवन में सद्संस्कारों को अपनाना चाहिए और अपने परिवार और समाज के लिए समय निकालना चाहिए। इससे हमारे जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आएगी और हमारा समाज भी मजबूत और संगठित बनेगा।
प्रत्येक इंसान की पहचान उसके संस्कारों से होती है। संस्कार उसके समूचे जीवन को व्याख्यायित करते हैं। संस्कार हमारी जीवनी शक्ति हैं। संस्कार निरंतर जलने वाली ऐसी दीपशिखा है जो जीवन के अंधेरे मोड़ों पर भी प्रकाश की किरणें बिखेर देती है। उच्च संस्कार ही मानव को महामानव बनाते हैं।
परिवार समाज की एक इकाई है। परिवारों से मिलकर ही समाज का निर्माण होता है। अगर परिवार के सभी सदस्य स्वस्थ व खुशहाल होंगे, तो समाज भी खुशहाल होगा। पारिवारिक सुख और शांति के लिए परिवार के सदस्यों के मध्य आपसी स्नेह, विश्वास और सम्मान आवश्यक है।
आजकल के परिवारों में सहनशीलता का अभाव होता जा रहा है। पत्नी, मां-बेटे, मां-बेटी, भाई-भाई, भाई-बहन, सास-बहू और गुरु-शिष्य के संबंधों में सहनशीलता कम होती जा रही है। समाज व परिवार में यह आम देखने को मिलता है कि एक व्यक्ति अपने भाई को सहन नहीं करता, माता-पिता को सहन नहीं करता ।
यहां यह प्रकृति की विचित्रता ही है कि इंसान परिजनों की बजाय पड़ोसी को सहन कर लेता है, अपने मित्र को सहन कर लेता है। सहन करना अच्छी बात है, लेकिन घर में भी एक सीमा तक एक-दूसरे को सहन करना चाहिए, तभी छोटी-छोटी बातों को लेकर मनमुटाव व नित्य होने वाले विवाद नहीं होंगे।
सद्संस्कार अमूल्य संपदा हैं, जिनके आगे संसार के धन-दौलत का कुछ भी मोल नहीं है। सद्संस्कार मनुष्य की अमूल्य धरोहर हैं। परिवार के जिन सदस्यों के पास संस्कार व सहनशीलता रूपी धन है, उस परिवार के सदस्य सुख-शांतिपूर्ण जीवन जीते हैं।
जब अधिकतर परिवार सुख शांतिपूर्ण जीवन जिएंगे, तभी समाज में सुख-शांति कायम होगा । इसलिए, हमें अपने परिवारों में संस्कार और सहनशीलता को बढ़ावा देना चाहिए। हमें अपने बच्चों को संस्कार और सहनशीलता की शिक्षा देनी चाहिए। इससे हमारे समाज में सुख-शांति कायम होगी और हमारे बच्चे सुख-शांतिपूर्ण जीवन जिएंगे।
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