पत्रकार वाचनालय पर कुंडली मारती मंशाएं: सूचनाओं के मंदिर को मत बनाइए सत्ता की चौकी
✍️ संपादकीय
17 जुलाई 2025
*"पत्रकार वाचनालय पर कुंडली मारती मंशाएं: सूचनाओं के मंदिर को मत बनाइए सत्ता की चौकी"*
राजस्थान प्रदेश के झुंझुनूं जिला मुख्यालय पर सूचना केंद्र में वर्षों से स्थापित पत्रकार वाचनालय केवल ईंट-पत्थर का भवन नहीं है, यह उस लोकतंत्र की नींव का हिस्सा है जो सूचना की पारदर्शिता, जन-चेतना, और स्वतंत्र अभिव्यक्ति पर टिका हुआ है। इस वाचनालय में बैठकर पत्रकार वह सामग्री तैयार करते हैं, जो समाज के अंधेरे कोनों में रोशनी फैलाती है। यह भवन पत्रकारों का कार्यस्थल नहीं, एक जनतांत्रिक चित्त की प्रयोगशाला है, जहां से खबरें नहीं, चेतना निकलती है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
दुर्भाग्य है कि आज उसी वाचनालय को प्रशासनिक दबाव में एसीबी कार्यालय हेतु अलॉट करने की प्रक्रिया चलाई जा रही है। यह निर्णय सिर्फ भवन बदलने का नहीं, बल्कि स्वतंत्र पत्रकारिता को विस्थापित करने की कोशिश है।
यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब ज़िले में दर्जनों वैकल्पिक सरकारी भवन खाली पड़े हैं, तो फिर पत्रकारों की आत्मा बसे इस पवित्र स्थल पर ही निगाह क्यों? क्या प्रशासन को सूचनाओं के स्रोतों पर नियंत्रण करने की मंशा है? क्या सरकार को यह स्थान खटक रहा है क्योंकि यहां से सच लिखा और जनता तक पहुँचाया जाता है?
पत्रकारों का आक्रोश स्वाभाविक है, और उनकी चेतावनी भी गंभीर। यदि अब भी शासन और प्रशासन चेत नहीं पाते, तो आने वाले समय में यह विषय सिर्फ जिला विवाद नहीं रहेगा — यह प्रेस स्वतंत्रता पर सीधा हमला माने जाने लगेगा। यह पत्रकारों का भवन नहीं, लोकतंत्र की नींव है। इसे छेड़ना सत्ता के पैरों के नीचे की ज़मीन खींचने जैसा है।
आश्चर्य की बात यह भी है कि जिले के कई जनप्रतिनिधि, जिनका जनमत मीडिया के माध्यम से ही उभरा है, वे भी इस मुद्दे पर मौन हैं। यह मौन कहीं स्वीकृति का संकेत तो नहीं?
अब समय आ गया है कि यह स्पष्ट किया जाए कि पत्रकार भवनों की रक्षा सिर्फ पत्रकारों की जिम्मेदारी नहीं — यह समाज की अभिव्यक्ति की रक्षा का विषय है। यदि वाचनालय उजड़ता है, तो सूचनाएं दम तोड़ेंगी, और तब न कोई सरकार का सच जानेगा, न कोई जनता का दुःख।
हम उम्मीद करते हैं कि प्रशासन इस हठधर्मिता को त्यागेगा और पत्रकारों के साथ संवाद कर एक सम्मानजनक समाधान निकालेगा। क्योंकि जिस दिन सत्ता सच से डरने लगे, उसी दिन लोकतंत्र का बंधक बनना तय होता है।
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