“इलाज या उद्योग?—जब जीवन की सांसों पर व्यापार का पहरा बैठ जाए”
✍️ संपादकीय
01-07-2025
*“इलाज या उद्योग?—जब जीवन की सांसों पर व्यापार का पहरा बैठ जाए”*
हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ 'इलाज' का अर्थ धीरे-धीरे बदल रहा है। पहले जहाँ चिकित्सक को "धरती का भगवान" कहा जाता था, आज वही चिकित्सक कई बार कॉरपोरेट अस्पताल की चकाचौंध में 'सुविधा का विक्रेता' बनता दिखाई देता है। यह विडंबना नहीं, बल्कि वर्तमान चिकित्सा व्यवस्था का त्रासदीपूर्ण सच है — एक ऐसा सच जिसे नकारना खुद से मुंह मोड़ने जैसा होगा। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
मरीज नहीं, 'पैकेज' है इंसान
जिसे कभी "रोगी" कहा जाता था, वह अब 'क्लेम जनरेटिंग केस' बन गया है। अस्पतालों की भाषा बदल चुकी है—“इस मरीज में कितना स्कोप है?”, “कितना बिल बनेगा?”, “पैकेज कितना खिंच सकता है?”। ICU, MRI, टेस्ट, स्कैन — हर उपचार एक नंबर बन चुका है, और हर मरीज एक 'टारगेट'।
बुजुर्गों के साथ जो हो रहा है, वह तो हमारी सभ्यता पर प्रश्नचिह्न है। 80-85 वर्ष की उम्र में जब व्यक्ति को सुकून, परिवार का साथ और शांत वातावरण की जरूरत होती है, उसे अस्पतालों की मशीनों में लपेटकर ऑक्सीजन, ड्रिप, स्कैन और 'बेहतर इलाज' के नाम पर एक ऐसी प्रायोगिक प्रयोगशाला में पहुँचा दिया जाता है जहाँ न अपनापन है, न आत्मीयता।
“फ्री इलाज”—सुनने में राहत, असल में शोषण है। सरकारें गरीबों, वरिष्ठ नागरिकों और कमजोर वर्ग के लिए “फ्री इलाज” की घोषणा करती हैं, लेकिन जब ज़मीन पर नज़र डालते हैं तो समझ आता है कि यह योजना नहीं, एक सुनियोजित व्यापार है। अस्पतालों को सरकारी फंडिंग चाहिए, इसलिए फ्री मरीजों को भर्ती करना प्राथमिकता है, चाहे वह भर्ती वास्तव में ज़रूरी हो या नहीं।
जांचें इतनी करवा ली जाती हैं कि मरीज की बीमारी से पहले जेब बीमार हो जाती है — और चूंकि सरकार बिल भर रही है, इसलिए कोई सवाल भी नहीं करता।
डॉक्टर की आत्मा और अस्पताल की अपेक्षा के बीच संघर्ष
जिन डॉक्टरों ने "सेवा" की शपथ ली थी, वे आज अपनी आत्मा और अस्पताल के टारगेट के बीच फंसे हैं। वे जानते हैं कि कई बार यह भर्ती आवश्यक नहीं है, लेकिन उन्हें आंकड़े देने हैं।
यह स्थिति उन्हें असहाय बना देती है — न वे ईमानदारी से अपनी भूमिका निभा पाते हैं, न खुलकर विरोध कर सकते हैं।
मानवता का विकल्प क्या है?
प्रश्न यह है कि क्या इसका कोई विकल्प नहीं?
है — लेकिन भावना चाहिए, व्यवस्था चाहिए और संवेदनशीलता चाहिए।
होम केयर, पेलिएटिव केयर, या फिर 'घर के वातावरण में अंतिम समय' जैसी प्रणालियाँ आज दुनिया में उभर रही हैं। बुजुर्गों के लिए मशीनों से ज़्यादा जरूरी है मानवीय स्पर्श, परिवार की उपस्थिति, और आत्मिक शांति।
हमें यह समझना होगा कि "प्राणवायु" केवल ऑक्सीजन सिलिंडर में नहीं होती — वह सच्चे स्नेह में, अपनत्व में, और गरिमापूर्ण विदाई में होती है।
एक सवाल हम सबके लिए
क्या हम वाकई अपने प्रियजन को 'जीवन देने' की कोशिश कर रहे हैं या उसे 'मशीनों में ज़िंदा रखने' का व्यवसाय कर रहे हैं?
यह समय मौन रहने का नहीं है। यह समय प्रश्न करने का है —इलाज का केंद्र बिंदु मनुष्य है या मुनाफा? जीवन की रक्षा हो रही है या देह के नाम पर धन वसूली?
यदि आज हमने इस सवाल को टाल दिया, तो कल हमारी अगली पीढ़ी भी यही सोचेगी — “बीमार नहीं होना है, वरना बिल से मरना पड़ेगा।”
सरकार, समाज, डॉक्टर और आमजन — सभी को मिलकर इस व्यापारिक होते इलाज के तंत्र को पुनर्परिभाषित करना होगा, नहीं तो स्वास्थ्य सेवा नहीं, स्वास्थ्य बाज़ार ही बचेगा।
अब भी समय है—इलाज को सेवा बनाएँ, सौदा नहीं।
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