"युवा शक्ति की दिशा बदलो: तभी राष्ट्र बनेगा सशक्त"
संपादकीय:
19 जुलाई 2025
*"युवा शक्ति की दिशा बदलो: तभी राष्ट्र बनेगा सशक्त"*
"युवा शक्ति जब तक नशे, दिखावे और धार्मिक अंधानुकरण में उलझी रहेगी, तब तक राष्ट्र निर्माण एक अधूरा सपना ही रहेगा।" यह वाक्य केवल एक विचार नहीं, बल्कि हमारे वर्तमान समाज की जमीनी सच्चाई और भविष्य की चुनौती को रेखांकित करता है। आज का युवा, जो राष्ट्र की रीढ़ माना जाता है, वह अगर भटक जाए तो संपूर्ण समाज और राष्ट्र अपने लक्ष्य से दूर हो जाता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
भारत जैसे युवा देश में जहां जनसंख्या का सबसे बड़ा हिस्सा 18 से 35 वर्ष के बीच का है, वहां यह और भी चिंताजनक हो जाता है कि यह शक्ति आज नशे, सोशल मीडिया के दिखावे, धार्मिक अंधानुकरण और अराजक गतिविधियों में फंसती जा रही है। स्कूल-कॉलेज में पढ़ने वाले युवा आज किताबों की जगह रिल्स, ट्रेंड्स और तमाशों में मशगूल हैं। यह स्थिति केवल उनके भविष्य के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्र के लिए भी एक गहरी चिंता का विषय है।
*नशा और निकम्मापन: सबसे बड़ी चुनौती*
नशे की लत एक कैंसर की तरह युवाओं को खोखला कर रही है। पंजाब से लेकर राजस्थान और हरियाणा तक, गांव-गांव में ड्रग्स, शराब और तंबाकू जैसी लतों ने युवाओं को जड़ से हिलाकर रख दिया है। जो हाथ लैपटॉप या किताब उठाते, वे आज चिलम, गांजा और व्हाइट पाउडर में डूबते जा रहे हैं। नशे से सिर्फ शरीर नहीं मरता, सपने, जिम्मेदारियां और संस्कार भी खत्म हो जाते हैं।
*धार्मिक दिखावे का धंधा बनता अंधानुकरण*
धार्मिक आस्था हमारी संस्कृति की आत्मा है, लेकिन जब आस्था दिखावे और भीड़ में बदल जाती है, तब यह मौन उन्माद बन जाती है। सावन में कावड़ यात्रा का उद्देश्य आध्यात्मिक साधना था, लेकिन आज यह डीजे, नशा, स्टंट और सेल्फी का त्योहार बनकर रह गया है। कुछ नौजवान स्कूल छोड़कर, परीक्षा टालकर, माता-पिता की मदद करने की बजाय भीड़ का हिस्सा बनने निकल पड़ते हैं, जिनका न कोई मार्ग है, न लक्ष्य।
*शिक्षा और राष्ट्र निर्माण की उपेक्षा*
जब राष्ट्र को साइंटिस्ट, इंजीनियर, डॉक्टर, समाज सुधारक और अच्छे नागरिकों की आवश्यकता है, तब युवा अपनी ऊर्जा बर्बाद कर रहे हैं। शिक्षा की जगह "वायरल होना", करियर की जगह "इंस्टाग्राम फेम", और सेवा की जगह "धार्मिक हुड़दंग" ने ले ली है।
अगर आज युवा ज्ञान, चरित्र, विज्ञान और सामाजिक जिम्मेदारी की ओर नहीं मुड़े, तो राष्ट्र निर्माण केवल भाषणों और नारों तक सीमित रह जाएगा। यदि हम समाधान की दिशा में देखें तो-
1. संस्कारयुक्त शिक्षा: स्कूलों और कॉलेजों में मूल्य आधारित शिक्षा के साथ-साथ करियर काउंसलिंग और नैतिक प्रशिक्षण अनिवार्य किया जाए।
2. स्वैच्छिक संगठन: युवा क्लब, एनएसएस, एनसीसी जैसे संगठनों को मजबूत किया जाए, जो युवाओं को सेवा और नेतृत्व की ओर प्रेरित करें।
3. नशा मुक्ति अभियान: गांव-शहर स्तर पर लगातार नशा मुक्ति शिविर और पुलिस-प्रशासन की सख्ती जरूरी है।
4. परिवार और समाज की भूमिका: माता-पिता और समाज को चाहिए कि वे मौन समर्थन छोड़कर सक्रिय हस्तक्षेप करें — बच्चे भटक रहे हैं, तो दोस्त मत बनो, मार्गदर्शक बनो।
यदि आज का युवा जागरूक नहीं हुआ तो कल का भारत कमजोर होगा। लेकिन यदि यही युवा उठ खड़ा हो, आत्ममंथन करे और जिम्मेदारी उठाए, तो वह एक ऐसा सशक्त और समरस राष्ट्र बना सकता है जो केवल आर्थिक रूप से ही नहीं, सांस्कृतिक और नैतिक रूप से भी महाशक्ति बन सके।
अब समय है कि युवा खुद से पूछें —
मैं नशे में खोऊँ या नवभारत का निर्माण करूँ?
मैं भीड़ बनूँ या मार्गदर्शक?
मैं दिखावा करूँ या दिशा बनाऊँ?
Comments
Post a Comment