“ईर्ष्या और द्वेष – आत्मविनाश की अदृश्य आग* ”
✒️ संपादकीय
20 जुलाई 2025
*“ईर्ष्या और द्वेष – आत्मविनाश की अदृश्य आग* ”
आज के सामाजिक और मानसिक परिदृश्य में सबसे बड़ा रोग यदि कोई है, तो वह है – ईर्ष्या और उसका उग्र रूप द्वेष। यह मानसिक विकृति बाहर से दिखाई नहीं देती, परंतु भीतर ही भीतर एक मनुष्य को खोखला कर देती है। जब मनुष्य दूसरों की सफलता को देखकर दुखी होता है और यह चाहता है कि “मेरे पास भी वही हो”, तो यह ईर्ष्या कहलाती है। लेकिन जब यही भाव यह चाहने लगता है कि “उसके पास वो चीज न रहे”, तो यह द्वेष बन जाता है – और यहीं से शुरू होती है पतन की गाथा। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
आंतरिक अशांति की जड़ें: दूसरों से तुलना में छुपी हुई है। हमारा समाज आज तुलनात्मक मूल्यांकन की मानसिकता में जी रहा है। कोई भी व्यक्ति अपने सुख, सफलता और साधनों से संतुष्ट नहीं है। वह यह नहीं देखता कि उसके पास क्या है, बल्कि यह देखता है कि दूसरों के पास क्या है। सामने वाले का घर बड़ा क्यों है? उसकी गाड़ी मुझसे बेहतर क्यों है? वह समाज में प्रसिद्ध क्यों है, जबकि मैं नहीं? यह तुलनात्मक सोच ही ईर्ष्या का बीज है। और जब यह बीज मन में पनपता है, तो फलस्वरूप मानव का मन अशांत, बेचैन और हताश हो जाता है – भले ही उसके पास भौतिक सुख-सुविधाएं हो।
इसी ईर्ष्या और द्वेष का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करें तो ईर्ष्या, एक सहज मानवीय भावना है जो कभी-कभी हर किसी में उत्पन्न होती है। लेकिन जब यह बार-बार, अनियंत्रित और अंधी होकर सामने आती है, तब यह एक विनाशक विकार बन जाती है। दूसरी ओर, द्वेष एक जहरीला मनोविकार है।
ईर्ष्या तक बात केवल असंतोष और आत्मग्लानि की थी, लेकिन द्वेष के आते ही व्यक्ति दूसरे को हानि पहुंचाने, अपमानित करने या नीचा दिखाने की योजना बनाता है। ऐसे मनोभावों में घिरा व्यक्ति कभी संतुष्ट नहीं हो सकता।
ईर्ष्यालु व्यक्ति खुद अपने ही जीवन से दुखी रहता है। वास्तव में यह कटु सत्य है कि जो ईर्ष्यालु व्यक्ति आपके पीछे आपकी आलोचना करता है, वह स्वयं अपने जीवन में असंतुष्ट, निराश और अप्रसन्न है। वह केवल आपके पास की चीजों को देखकर पीड़ित है, लेकिन अपने पास क्या है – वह भूल चुका है।
इसलिए ऐसे लोगों से घृणा नहीं, दया करना चाहिए। वे भीतर से टूटे हुए, “दूसरे की थाली” देखकर “अपने स्वाद” को भूल चुके लोग हैं।
1. महाभारत का कर्ण यदि अपनी प्रतिभा को पहचानकर आगे बढ़ता, तो महान योद्धा बनता, लेकिन द्रौपदी की तिरस्कार और अर्जुन की प्रसिद्धि ने उसमें द्वेष को जन्म दिया – और अंततः उसकी मृत्यु का कारण बना।
2. रामायण में रावण, असीम ज्ञान, बल और वैभव के बावजूद, राम के धर्म और सीता के सम्मान से द्वेष करता रहा, और अंततः अपने ही वंश का सर्वनाश कर बैठा।
अतः आत्मसंतोष और आत्मबोध की राह पर चल कर समाधान की तलाश कीजिए। अब हमें यह समझना चाहिए कि संसार में हर किसी के पास सब कुछ नहीं हो सकता।
एक किसान के पास भूमि होती है, एक शिक्षक के पास ज्ञान, एक व्यापारी के पास पूंजी, और एक मजदूर के पास श्रम। सबकी अपनी-अपनी भूमिका, सामर्थ्य और जिम्मेदारी है। दूसरों से तुलना करने की बजाय, हमें अपने गुणों, संसाधनों और उपलब्धियों पर ध्यान देना चाहिए। जिस दिन हमने स्वयं की विशेषताओं का सम्मान करना सीख लिया – उस दिन हम ईर्ष्या और द्वेष की आग से मुक्त हो जाएंगे।
ईर्ष्या और द्वेष दिमाग के कैंसर की तरह हैं – जो धीरे-धीरे पूरे जीवन को निगल लेते हैं।
वास्तविक सुख केवल आत्मसंतोष और करुणा में है।
जो व्यक्ति दूसरों की खुशी देखकर मुस्कुरा सकता है, वही सच्चा इंसान है – और वही समाज को रोशनी की ओर ले जाने वाला दीपक है।
“यदि आप स्वयं में काना बनें और दूसरों को अंधा देखना चाहें – तो अंततः पूरे समाज में अंधकार फैलता है।”
“ईर्ष्या से तृप्ति नहीं मिलती – केवल आत्मा जलती है।”
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