प्रकृति के क्रोध से पहले चेत जाएं: विनाश की आहट और मानवता की ज़िम्मेदारी
संपादकीय 07-07-2025
*"प्रकृति के क्रोध से पहले चेत जाएं: विनाश की आहट और मानवता की ज़िम्मेदारी"*
वर्तमान समय में जो कुछ हमारे चारों ओर हो रहा है। अप्रत्याशित वर्षा, बाढ़, सूखा, भूस्खलन, लू, ओलावृष्टि, जल स्रोतों का सूखना—यह केवल मौसम नहीं है, यह प्रकृति की चेतावनी है। यह संकेत है कि हमने विकास के नाम पर जो विनाश किया है, अब वह हमें ही निगलने आ रहा है।
भारत के कई राज्यों में बाढ़ का कहर है, तो कहीं किसान पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस रहे हैं। खेत या तो पानी में डूबे हैं या धूप से झुलस रहे हैं। यह केवल “प्राकृतिक घटना” नहीं है, बल्कि मानवजनित आपदा है—जिसकी नींव हमने स्वयं रखी है, अपने लालच, लापरवाही और तथाकथित विकास की अंधी दौड़ में आखिर विकास की परिभाषा क्या हो। पुनर्विचार की आवश्यकता है यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
विकास का अर्थ क्या केवल कंक्रीट की इमारतें, चौड़ी सड़कें, चमकती गाड़ियां, और हरे पेड़ों की जगह हरे रंग के पेंट से भरी दीवारें हैं? कभी गाँवों में बावड़ियाँ, तालाब, कुएँ और चारागाह हुआ करते थे—अब वे ग़ायब हैं। हमने पेड़ काटे, पहाड़ खोदे, नदियों को सीमेंट में कैद किया। अब जब प्रकृति अपना हिसाब बराबर कर रही है, तो हम असहाय से दिखते हैं।
पर्यावरणीय आपातकाल को नजरअंदाज करना आत्मघाती होगा। आज जब बादल नहीं बरसते, तो अकाल आता है। जब बादल ज़रूरत से ज़्यादा बरसते हैं, तो शहर डूब जाते हैं। और यह सिर्फ़ एक जलवायु असंतुलन नहीं, एक सामाजिक संकट भी है।
गरीब सबसे पहले प्रभावित होता है—वह जिसकी झोंपड़ी बहेगी, जिसकी फसल नष्ट होगी, जिसकी रोज़ी छिनेगी। समाज को चाहिए नई सोच, शासन को चाहिए नई नीति इस स्थिति से निकलने के लिए हमें “पर्यावरण संरक्षण” को सिर्फ़ भाषण की विषयवस्तु नहीं, बल्कि व्यवहार की दिनचर्या बनाना होगा। हमें वृक्षारोपण को उत्सव की तरह नहीं, उत्तरदायित्व की तरह अपनाना होगा। वर्षा जल संरक्षण को अनिवार्य बनाना होगा। हर गाँव और शहर में पारंपरिक जल स्रोतों का पुनरुद्धार करना होगा।
जलवायु शिक्षा को स्कूलों में प्राथमिक विषय बनाना होगा।
जनता की भूमिका भी उतनी ही अहम है।हर व्यक्ति को अपने स्तर पर आत्मपरीक्षण करना होगा। क्या आप बिजली का अनावश्यक उपयोग नहीं कर सकते? क्या प्लास्टिक की बजाय कपड़े का थैला नहीं इस्तेमाल कर सकते?
क्या घर में एक पौधा लगाकर उसकी सेवा नहीं कर सकते?
प्रकृति को बचाना अब सरकार की ज़िम्मेदारी भर नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की नैतिक ज़िम्मेदारी है। चेत जाएं, वरना आने वाली पीढ़ी केवल सांस लेने के लिए भी संघर्ष करेगी
आज हम जो कर रहे हैं, उसका परिणाम हमारी अगली पीढ़ियाँ भुगतेंगी। अगर हमने अभी नहीं सोचा, तो भविष्य हमारे बच्चों के लिए केवल “विनाश की विरासत” छोड़ जाएगा।
सवाल अब यह नहीं है कि “क्या किया जा सकता है?”
सवाल यह है कि “क्या अब भी कुछ करने का समय बचा है?”
"प्रकृति को लूटकर हम कभी समृद्ध नहीं हो सकते।
विकास वहीं है जहाँ जीवन बचा रहे।"
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