प्रेम – जुड़ाव की भावना है, बंधन नहीं

संपादकीय
24 जुलाई 2025
 *प्रेम – जुड़ाव की भावना है, बंधन नहीं* 
“प्रेम एक जुड़ाव है, बंधन नहीं”  यह कोई केवल सुन्दर कहावत भर नहीं है, बल्कि प्रेम की सबसे शुद्ध और गहन परिभाषा है। प्रेम को यदि बंधन बना दिया जाए, तो वह बोझ बन जाता है। लेकिन जब प्रेम को जुड़ाव के रूप में देखा जाए, तो यह जीवन का सबसे सुंदर अनुभव बन जाता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
आज के दौर में अधिकांश लोग प्रेम को स्वामित्व और अपेक्षाओं की परिधि में परिभाषित करने लगे हैं। परिणामस्वरूप रिश्ते टूटते हैं, मनों में ईर्ष्या और द्वेष उपजता है, और प्रेम जैसे पवित्र भाव का सौंदर्य मलिन हो जाता है।
प्रेम का अर्थ केवल "तुम मेरे हो" कहकर किसी पर अधिकार जताना नहीं है। यह कहना है – “तुम जैसे भी हो, मैं तुम्हें वैसे ही स्वीकार करता हूं।”

 एक वृक्ष की तरह सोचिए – जो पक्षियों को छांव, फल, और स्थान देता है, लेकिन उन पर अधिकार नहीं जताता। वे उड़ जाएं, लौटें या न लौटें – वृक्ष सिर्फ देता है, बदले में अपेक्षा नहीं रखता।
 प्रेम भी ऐसा ही होना चाहिए – मुक्त, स्वीकार और स्थायी।

जब प्रेम में ‘स्वामित्व’, ‘तुलना’ और ‘नियंत्रण’ आने लगता है, तो वह धीरे-धीरे ‘बंधन’ में बदल जाता है। और जहां बंधन है, वहां घुटन है।
 रीमा और अर्जुन कॉलेज में मिले। प्रेम हुआ, रिश्ते में आए। लेकिन कुछ महीनों बाद रीमा को अर्जुन के पहनावे, दोस्तों, और सोशल मीडिया पर की जाने वाली पोस्ट से दिक्कत होने लगी। प्रेम धीरे-धीरे अभियोजन की अदालत बन गया। दोनों एक-दूसरे को बदलने की कोशिश करने लगे। अंततः, प्रेम की वह स्वाभाविकता खत्म हो गई और संबंध टूट गया।

इससे सीख मिलती है – प्रेम में स्वतंत्रता नहीं रही तो रिश्ता संबंध नहीं, संघर्ष बन जाता है। वर्तमान समाज में रिश्तों का स्वरूप देखें तो आज का युग सोशल मीडिया और आभासी अपेक्षाओं का युग है। यहाँ रिश्तों का मूल्य में‘लाइक’, ‘फॉलो’, ‘गिफ्ट’ और ‘स्टेटस’ से आंका जाने लगा है। एक-दूसरे की भावनाओं को समझने की जगह, तस्वीरों में मुस्कान तलाशने की आदत बन चुकी है।
 अधिकांश प्रेम-प्रसंग इस बात से बिगड़ते हैं कि – “तुमने उसे क्यों देखा? उसे लाइक क्यों किया? मेरी स्टोरी क्यों नहीं देखी?”
यह सब दर्शाता है कि प्रेम अब जुड़ाव नहीं, संदेह और स्वार्थ की संज्ञा बनता जा रहा है।
खामियों के साथ प्रेम ही सच्चा प्रेम है। एक अद्भुत उदाहरण देखिए रैदास और उनकी पत्नी लोणा –
रैदास एक साधु थे, जिनका अधिकतर समय प्रभु-भक्ति में बीतता था। वह अपने पत्नी के कार्यों में सहायक नहीं होते थे, जिससे उन्हें कष्ट होता था, लेकिन लोणा ने कभी शिकायत नहीं की। वह जानती थीं कि उनका पति साधना में लीन है, उनका कर्तव्य है सेवा करना। यही था – स्वीकार का प्रेम।

 प्रेम में दोनों पक्षों को एक-दूसरे के विकास के लिए प्रेरक शक्ति बनना चाहिए। यदि प्रेम आपको सुधारने, प्रेरित करने और शांत करने का काम नहीं करता – तो वह प्रेम नहीं, भावनात्मक निर्भरता है। प्रेम में आलोचना नहीं, प्रोत्साहन होना चाहिए। शक नहीं, श्रद्धा होनी चाहिए। स्वार्थ नहीं, साथ होना चाहिए।

आज जरूरत इस बात की है कि हम प्रेम को बंधन नहीं, जुड़ाव मानें।
जब आप अपने साथी, मित्र या परिवारजनों से प्रेम करें, तो उन्हें आज़ादी दें।
उनकी कमियों को अपनाएँ।
उनकी खुशियों में शरीक हों, उनकी समस्याओं में सहभागी बने ।
“जो प्रेम में बाध्य करता है, वह प्रेम नहीं होता। जो प्रेम में मुक्त करता है, वही सच्चा प्रेम होता है।”

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