*संगठन – स्वार्थ नहीं, समर्पण की साधना है*
संपादकीय
29 जुलाई 2025
*संगठन – स्वार्थ नहीं, समर्पण की साधना है*
संगठन का स्वरूप केवल संस्थागत ढांचे या औपचारिक बैठकों तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह एक जीवंत चेतना है, जो व्यक्तियों को ‘मैं’ से उठाकर ‘हम’ की भावना में ढालती है। संगठन नियमों से नहीं, बल्कि व्यवस्था से चलता है। सूचना देने से नहीं, बल्कि समझ विकसित करने से उसकी नींव मजबूत होती है। यहाँ कानून नहीं, अनुशासन आवश्यक होता है। संगठन में डर नहीं, बल्कि आपसी विश्वास ही उसकी असली शक्ति है।
संगठन का उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष का यशगान नहीं, बल्कि सामूहिक उत्थान होता है। यह शोषण नहीं, बल्कि पोषण की भूमि है, जहाँ हर सदस्य को बढ़ने, सीखने और नेतृत्व करने का अवसर मिलता है। संगठन में आज्ञा नहीं, आदर चलता है; संपर्क नहीं, बल्कि भावनात्मक संबंध चलते हैं। अर्पण सीमित होता है, समर्पण अनंत होता है। इसलिए संगठन केवल दीखावटी उपस्थिति या व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि साझा संकल्प और साझा संघर्ष के लिए होता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
संगठन कोई ईंट-पत्थर की संरचना नहीं होती, न ही यह केवल लोगों का समूह भर होता है। संगठन एक जीवंत विचार होता है, एक चलती-फिरती चेतना होती है, जो "मैं" को "हम" में बदल देती है। संगठन का उद्देश्य सत्ता, पद या प्रभुत्व नहीं होता, बल्कि वह एक साझा संकल्प, समान लक्ष्य और सामूहिक उत्थान के लिए सतत प्रयत्नशील मंच होता है। यह केवल नियमों से नहीं चलता, इसकी आत्मा व्यवस्था और अनुशासन में बसती है।
जहाँ संगठन में केवल नियम थोपे जाते हैं, वहां विद्रोह जन्म लेता है, लेकिन जहाँ व्यवस्था समझ से बनती है, वहां सहयोग और समर्पण की भावना फलती-फूलती है। यही कारण है कि संगठन में सूचना नहीं, समझ का आदान-प्रदान होता है। सूचना केवल शब्द देती है, लेकिन समझ अर्थ और दिशा दोनों देती है।
कई बार लोग संगठन को डर, दबाव या भय से जोड़ने लगते हैं, जबकि संगठन का मूल आधार विश्वास होता है। भय का संगठन गुलाम बनाता है, जबकि विश्वास का संगठन नेता बनाता है। संगठन में कोई किसी का मालिक नहीं होता, हर कोई समान रूप से सहभागी होता है। यह सहभागिता ही उसे शक्तिशाली बनाती है।
आज हम जिस सामाजिक और राजनैतिक संक्रमण के दौर से गुजर रहे हैं, उसमें संगठन की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। जब व्यक्ति व्यक्तिगत स्पर्धा और स्वार्थ में डूबा हो, तब संगठन उसे एक बड़ा उद्देश्य, व्यापक सोच और साझा संघर्ष की प्रेरणा देता है। लेकिन यह तभी संभव है जब संगठन में शोषण नहीं, पोषण हो। जब व्यक्ति को आदेश नहीं, आदर मिले।
संगठन संबंधों का निर्माण करता है, संपर्कों का नहीं। संपर्क तो सतही होते हैं, लेकिन संबंध गहरे होते हैं – और यही संबंध संगठन की जड़ों को मज़बूती देते हैं। एक अच्छा संगठन अर्पण की भावना से नहीं, समर्पण की शक्ति से चलता है। अर्पण तो एक बार की घटना होती है, समर्पण जीवन-भर की यात्रा है।
यह भी समझना आवश्यक है कि संगठन में आत्मप्रशंसा नहीं चलती। यहाँ "मैंने किया", "मेरी सोच थी", "मेरा सुझाव था" जैसी बातें नहीं होतीं। यहाँ "हमने किया", "हमारा निर्णय था", "हमारी नीति थी" – यही भाव चलता है। संगठन में सम्मान व्यक्तिगत नहीं, सर्वसमूह का होता है। यह किसी की विजय का मंच नहीं, बल्कि सभी की सहभागिता का उत्सव होता है।
आज के दौर में संगठन को लेकर लोगों की समझ विकृत होती जा रही है। कई लोग संगठन में इसलिए आते हैं ताकि उन्हें कोई पद, पहचान या लाभ मिले। वे संगठन का उपयोग करते हैं, सेवा नहीं करते। ऐसे लोग संगठन की आत्मा को चोट पहुंचाते हैं। संगठन की बुनियाद सेवा, समर्पण, और निष्कलंक आचरण पर होती है।
एक बात स्पष्ट समझनी होगी – संगठन जोड़ता है, तोड़ता नहीं। यदि किसी संगठन से जुड़कर कोई व्यक्ति तोड़ने का कार्य करता है – वह संगठन की पवित्रता को अपवित्र करता है। एक सच्चा कार्यकर्ता संगठन की एकता के लिए अपने मतभेदों को भी पीछे रख देता है। वह आलोचना करता है, लेकिन मर्यादा में रहकर। वह सुझाव देता है, लेकिन अहंकार के बिना।
संगठन में “मैं” का स्थान नहीं होता। वहाँ केवल “हम” होता है। यह "हम" ही संगठन की असली पूंजी है। “मैं” संगठन में विभाजन लाता है, “हम” संगठन को जीवन देता है। जब तक संगठन में “मैं” जीवित रहेगा, संगठन केवल ढांचा रहेगा; जब “हम” सजीव होगा, तब वह एक आंदोलन बनेगा।
आज जब देश, समाज और संस्थाएं अनेक स्तरों पर संघर्षों और चुनौतियों से जूझ रही हैं, तब एक मजबूत, उद्देश्यनिष्ठ और मूल्य आधारित संगठन की महत्ती आवश्यकता है। लेकिन ऐसा संगठन केवल घोषणा या भाषण से नहीं बनता, वह कार्यकर्ताओं की साधना, संयम, त्याग और सेवा से बनता है।
इसलिए हमें चाहिए कि हम स्वयं को संगठन से केवल नाम मात्र से नहीं, बल्कि विचार, व्यवहार और दृष्टिकोण से जोड़ें। संगठन में प्रशंसा सबकी करें, निंदा किसी की नहीं। संगठन को स्वार्थ से नहीं, समर्पण से सींचें। संगठन को सीढ़ी नहीं, सेवा का माध्यम मानें।
जब तक यह चेतना जीवित है, संगठन बचेगा। और जब तक संगठन बचेगा, तब तक विचार और मूल्य बचे रहेंगे।
"संगठन वो दीप है, जो अकेले से नहीं जलता,
हर बाती के समर्पण से उजाला करता है।"
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