"कागज़ों में मरा आदमी: सिस्टम की जीवंत लापरवाही पर एक तीखा व्यंग्य"

संपादकीय 
3 जुलाई 2025

 *"कागज़ों में मरा आदमी: सिस्टम की जीवंत लापरवाही पर एक तीखा व्यंग्य"* 
सिस्टम का पेट इतना बड़ा हो गया है कि अब यह ज़िंदा लोगों को भी पचा जाता है और दस्तावेज़ों में उन्हें 'मृत' घोषित कर देता है। कानपुर में घटित यह घटना, जहाँ एक जीवित युवक को पुलिस और प्रशासन मिलकर पोस्टमॉर्टम के लिए भेजने की तैयारी कर चुके थे, न केवल हास्यास्पद है, बल्कि यह सरकारी तंत्र की गंभीरतम लापरवाही और संवेदनहीनता पर करारा तमाचा है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगी कि बोलता है।

सोचिए, एक सामान्य युवक थाने पहुंचकर गिड़गिड़ा रहा है – "साहब! मैं जिंदा हूं, मेरा पोस्टमॉर्टम रुकवाइए, नहीं तो कागजों में मैं मृत रहूंगा।" यह कोई फ़िल्मी संवाद नहीं, बल्कि एक जीवंत व्यक्ति की प्रशासन के आगे मरने से पहले की अंतिम पुकार है। और यह कोई पहली घटना नहीं, यह हमारे तंत्र की जड़ हो चुकी बेरुखी और कागज़ी कार्यप्रणाली का जीवंत उदाहरण है।

यह घटना सिर्फ पुलिस विभाग की नहीं, बल्कि उस पूरे ‘कागज़ी राज’ की पोल खोलती है, जहां कागज़ों की मौत इंसान की ज़िंदगी से बड़ी हो जाती है। पंचनामा भरकर शव की शिनाख्त बिना ठोस जांच के कर देना, और उसके बाद पोस्टमॉर्टम के लिए भेज देना — यह कार्यवाही प्रशासनिक दक्षता नहीं, बल्कि घोर लापरवाही की श्रेणी में आती है।

व्यवस्था की हालत यह हो गई है कि अब नागरिक को यह भी सिद्ध करना पड़ेगा कि वह जीवित है! यह न सिर्फ मज़ाक है, बल्कि लोकतंत्र में आम आदमी की स्थिति पर एक क्रूर कटाक्ष भी है। इस मामले में युवक का वक्तव्य – "मैं जिंदा हूं, नहीं तो मृत घोषित कर दिए जाऊंगा," – दरअसल पूरे प्रशासन की मानसिक मृत्यु का संकेत है।

इस हास्यास्पद त्रासदी में यह सवाल भी खड़ा होता है कि क्या हमारा तंत्र इतना अमानवीय हो चुका है कि एक ग़लत पहचान को ठीक करने के लिए खुद व्यक्ति को भागकर थाने आना पड़े? क्या हमारे पुलिस महकमे की प्राथमिकता अब सिर्फ फॉर्म भरना और कागज़ों की खानापूर्ति भर रह गई है?

पुलिस की संवेदनहीनता पर तंज कसना जरूरी है — क्या अब थाने में घुसते ही व्यक्ति को “मृत या जीवित” का प्रमाण पत्र साथ लाना होगा? या फिर एक पोस्टर लगा देना चाहिए – "यहाँ कागज़ों से ज़्यादा भरोसेमंद कुछ नहीं!"

यह घटना इस बात की भी मांग करती है कि पुलिस और प्रशासन में जवाबदेही की संस्कृति विकसित हो। जो अफसर मृतक की पहचान किए बिना पंचनामा तैयार कर रहे हैं, उन्हें महज़ 'भूल' कहकर नहीं छोड़ा जाना चाहिए। वरना कल को यदि कोई ज़िंदा आदमी श्मशान से लौट आए तो भी उसे फिर से जिंदा मानने में महीनों लगेंगे!

यह समय है जब हमारी व्यवस्था आत्मावलोकन करे। वरना एक दिन ऐसा भी आएगा जब लोग कागज़ों में जिंदा रहने के लिए भी दर-दर की ठोकरें खाएंगे।

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