रोटी खिलाना नहीं, रोटी कमाना सिखाना है असली सेवा
✍️ संपादकीय
14 जुलाई 2025
"रोटी खिलाना नहीं, रोटी कमाना सिखाना है असली सेवा"
समाज सेवा का अर्थ वर्षों से हम केवल एक ही रूप में देखते आए हैं – गरीब को खाना खिलाना, कपड़े देना, और जरूरतमंद को चंद रुपए की सहायता कर देना। इसमें कोई दो राय नहीं कि यह मानवीय करुणा के प्रतीक हैं, लेकिन जब बात समाज को बदलने की हो, तो केवल दान नहीं, दिशा की आवश्यकता होती है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
एक भूखे को रोटी देना पुण्य का काम है, लेकिन उससे भी बड़ा पुण्य है, उसे रोटी कमाने का हुनर सिखा देना। क्योंकि एक समय की भूख मिट सकती है, लेकिन भूख की आदत को आत्मनिर्भरता में बदलना ही वास्तविक परिवर्तन है।
आज भी हमारे आसपास हजारों लोग हैं जो दान पर निर्भर जीवन जी रहे हैं — वे हाथ फैलाने को मजबूर हैं, क्योंकि उनके पास हुनर नहीं, संसाधन नहीं और अवसर नहीं। यदि हम उन्हें हुनर दे दें, तो न केवल वे अपनी आजीविका स्वयं चला सकते हैं, बल्कि आत्मसम्मान के साथ जी सकते हैं।
यही कारण है कि आज समाज को केवल "दानदाता" नहीं, दिशा-निर्देशक" की ज़रूरत है।
हमें खाना बांटने से अधिक रोजगार प्रशिक्षण केंद्र खोलने चाहिए।
हमें प्रसाद की थालियों से अधिक हुनर की कार्यशालाएं आयोजित करनी चाहिए।
हमें त्यौहारों पर मिठाइयाँ बाँटने से ज़्यादा हस्तशिल्प, दस्तकारी और स्वरोजगार की योजनाएँ फैलानी चाहिए।
सरकारें अपने स्तर पर योजना बनाती हैं – स्किल इंडिया मिशन, पीएम-ईजीपी योजना, मुद्रा लोन जैसी पहलें इसका उदाहरण हैं, लेकिन जब तक समाज का जागरूक वर्ग इसमें भागीदारी नहीं करेगा, तब तक यह योजनाएं सिर्फ सरकारी फाइलों की शोभा बनकर रह जाएंगी।
वास्तविक समानता और न्याय तब आएगा जब हम दया की जगह दक्षता देंगे, भीख की जगह व्यवसाय देंगे और आसरा की जगह आत्मनिर्भरता देंगे।
रोटी खिलाना आसान है, लेकिन रोटी कमाना सिखाना ही वह बीज है जिससे समाज में बदलाव की फसल लहलहाएगी।
आइए, एक नए समाज की नींव रखें — जहाँ हर हाथ में हुनर हो, और हर पेट को रोटी अपने परिश्रम से मिले।
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