झालावाड़ त्रासदी : जब शिक्षा की छांव मौत की छाया बन गई"
संपादकीय
26 जुलाई 2025।
*"झालावाड़ त्रासदी : जब शिक्षा की छांव मौत की छाया बन गई"*
झालावाड़ की दर्दनाक दुर्घटना ने न सिर्फ कई मासूम जिंदगियां लील लीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की खस्ताहाली और प्रशासनिक लापरवाही की परतें भी उधेड़ कर रख दीं। यह कोई सामान्य दुर्घटना नहीं, बल्कि एक सामाजिक-शैक्षणिक विडंबना है, जिसमें हाशिये पर खड़े समाज के बच्चे बेमौत मारे गए — वे बच्चे जो पहली पीढ़ी के शिक्षार्थी थे, जिनके लिए स्कूल ज्ञान की नहीं, जीवन की रोशनी थी। जहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
मृतक छात्रों का सामाजिक-सांस्कृतिक चेहरा हमें झकझोरता है — 4 भील (ST), 2 रैदास (SC) – जो सगे भाई-बहन थे, और 1 लोधा (OBC)। घायल बच्चों में भी अधिकांश भील समुदाय से हैं – कई एक ही परिवार के। यह आंकड़े नहीं, समाज के उस वर्ग की पीड़ा हैं जो दशकों से अवसरों से वंचित रहे और अब शिक्षा तक पहुंचने की उनकी कोशिशें भी जीवन पर भारी पड़ रही हैं।
विडंबना यह है कि यह घटना किसी प्राकृतिक आपदा से नहीं, बल्कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था की लापरवाही से हुई है। विद्यालय की मूलभूत सुविधाएं, जैसे कि सुरक्षित परिवहन, भवन की मजबूती, शिक्षकों की नियमितता, और निगरानी तंत्र — सबकुछ बदहाल है। वर्षों से जर्जर स्कूल भवनों की मरम्मत नहीं हुई, बच्चों की सुरक्षा के लिए कोई ठोस इंतजाम नहीं किया गया, और प्रशासनिक जवाबदेही केवल कागजों तक सीमित रही।
आखिर क्यों इस देश में गरीब, दलित और आदिवासी बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी इतनी उपेक्षित है? क्या इसलिए कि उनके परिवार प्रशासन के गलियारों तक पहुंच नहीं रखते? क्या इसलिए कि उनकी आवाजें मीडिया और मंत्रालय तक नहीं पहुंचतीं? यह न केवल सामाजिक न्याय की हत्या है, बल्कि भारतीय संविधान की आत्मा पर भी चोट है।
घटना का आंखों देखा हाल झकझोर देने वाला है — बिखरे बस्ते, खून से सने कपड़े, चीखते-चिल्लाते परिजन, और मौन खड़ा शिक्षा विभाग। यह दृश्य किसी युद्धभूमि से कम नहीं था, और शहीद हुए वे बच्चे थे जो कल देश का भविष्य बनने निकले थे। यह घटना चेतावनी है — उन अफसरों, शिक्षकों और नीति-निर्माताओं के लिए जो कागजी प्रगति रिपोर्टों से संतुष्ट बैठे हैं। अगर अब भी हमने नहीं चेता, तो अगली बार किसी और गांव की माताएं अपने बच्चों को स्कूल भेजने से डरेंगी।
क्या शिक्षा का अधिकार केवल शहरी बच्चों का विशेषाधिकार रह गया है? कब तक आदिवासी और दलित बच्चे स्कूलों की उपेक्षा का शिकार होते रहेंगे? क्यों नहीं स्कूलों का सामाजिक लेखा-जोखा तय किया जा रहा है? समाधान केवल समाजशास्त्रीय विश्लेषण से ही संभव है।
हर जिले में स्कूल की सामाजिक पृष्ठभूमि के अनुसार विशेष निगरानी हो। कमजोर वर्गों के बच्चों के लिए अतिरिक्त सुरक्षा और परिवहन व्यवस्थाएं हों। जिम्मेदार अफसरों की जवाबदेही तय की जाए और ऐसी घटनाओं की न्यायिक जांच कराई जाए।
वरना यह हादसा एक मिसाल नहीं, बल्कि एक आदत बन जाएगी — और फिर हम सिर्फ गिनती करेंगे... बच्चों की लाशों की।
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