*रोज़गारहीन विकास और दिशाहीन युवा: देश के भविष्य पर मंडराता खतरा*

✍️ संपादकीय
9 जुलाई 2025 

 *रोज़गारहीन विकास और दिशाहीन युवा: देश के भविष्य पर मंडराता खतरा* 
भारत आर्थिक विकास की चमकती तस्वीर पेश कर रहा है। जीडीपी की तेज़ रफ्तार, चमकदार इंफ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल इंडिया और मेक इन इंडिया जैसी योजनाएँ आंकड़ों की दुनिया में बड़ी सफलता की कहानी बुन रही हैं। मगर इन आंकड़ों की परत के नीचे दबा हुआ सच यह है कि देश का सबसे बड़ा संसाधन — उसकी युवा शक्ति — आज सबसे बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। करोड़ों शिक्षित युवा हाथ में डिग्रियां लिए रोजगार की तलाश में दर-दर भटक रहे हैं। बेरोज़गारी अब केवल एक व्यक्तिगत संकट नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आपदा बनती जा रही है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

हर साल लाखों छात्र देशभर के विश्वविद्यालयों से पढ़कर निकलते हैं, लेकिन बाज़ार की ज़रूरत और शिक्षा की दिशा में कोई तालमेल नहीं दिखता। परिणामस्वरूप, एक ओर जहां लाखों युवा रोजगार की तलाश में भटक रहे हैं, वहीं उद्योग जगत को योग्य और प्रशिक्षित कर्मचारी नहीं मिल रहे। शहरों की तुलना में गांवों की स्थिति और भी खराब है। वहां स्किल्स की शिक्षा, तकनीकी प्रशिक्षण और रोजगार के अवसर लगभग न के बराबर हैं। कृषि आधारित जीवन भी टिकाऊ नहीं रह गया, और ऐसे में गांवों के युवा या तो शहरों की ओर पलायन करते हैं या अपराध, अवसाद और हताशा के गर्त में गिरते हैं।

दुखद यह है कि यह सब उस दौर में हो रहा है जब देश डिजिटल क्रांति, स्टार्टअप संस्कृति और ग्लोबल इन्वेस्टमेंट की बात कर रहा है। पर सवाल उठता है कि क्या यह विकास युवाओं को गरिमा और आत्मनिर्भरता दे पा रहा है? आज का विकास ‘जॉबलेस ग्रोथ’ बनता जा रहा है, जिसमें मशीनें तो काम कर रही हैं, लेकिन इंसान खाली हाथ बैठा है। सरकारी नौकरियों की भर्तियाँ वर्षों तक लटकी रहती हैं, और जब आती हैं तो पेपर लीक, कोर्ट केस और अनियमितताओं की भेंट चढ़ जाती हैं।

यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। युवा, जो राष्ट्र निर्माण की नींव है, वह आज सबसे अधिक हताश और दिशाहीन है। स्कॉलरशिप बंद हो रही हैं, कोचिंग महंगी हो रही है और प्रतियोगी परीक्षाएं अविश्वसनीय बन चुकी हैं। “डिग्री नहीं स्किल चाहिए” जैसे नारे खोखले साबित हो रहे हैं, क्योंकि स्किल वाले हाथ भी आज बेरोज़गार हैं।

जरूरत इस बात की है कि शिक्षा प्रणाली को उद्योगों की ज़रूरतों से जोड़ा जाए। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय संसाधनों पर आधारित स्किल डेवलपमेंट सेंटर खोले जाएं। सरकारी नौकरियों की नियमितता और पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए। युवाओं को नए क्षेत्रों जैसे ग्रीन एनर्जी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सुरक्षा, और डिजिटल सर्विसेज़ में प्रशिक्षित किया जाए। साथ ही, स्वरोजगार को बढ़ावा देने वाली योजनाओं में भ्रष्टाचार और लालफीताशाही से मुक्त, सहज ऋण और मेंटरशिप व्यवस्था दी जाए।

देश को यह समझना होगा कि अगर उसका युवा आज असंतुष्ट, बेरोज़गार और दिशाहीन है, तो कल वह या तो सड़कों पर होगा या सिस्टम से मोहभंग कर लेगा। यह स्थिति किसी भी समाज के लिए आत्मघाती है। इसलिए आज यह सबसे जरूरी है कि सरकार, समाज और उद्योग — तीनों मिलकर युवाओं को रोजगार, सम्मान और भविष्य देने की दिशा में ठोस, पारदर्शी और दीर्घकालिक कदम उठाएं।

यदि देश को सच में विश्वगुरु बनना है, तो पहले उसे अपने युवाओं को मार्ग, मंच और अवसर देने होंगे। वरना यह सुनहरा विकास सिर्फ एक भ्रम बनकर रह जाएगा, और युवा पीढ़ी — जो राष्ट्र की रीढ़ है — भविष्य में स्वयं देश के लिए सबसे बड़ा प्रश्नचिन्ह बन जाएगी।

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