स्वार्थ नहीं, सारथ्य बनिए – संबंधों की असली दिशा

संपादकीय :
21 जुलाई 2025

 *"स्वार्थ नहीं, सारथ्य बनिए – संबंधों की असली दिशा"* 
वर्तमान समय की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि मनुष्य ने तकनीकी और आर्थिक विकास में जितनी प्रगति कर ली है, उतनी ही गिरावट उसके भावनात्मक, नैतिक और संबंधों के स्तर पर देखी जा रही है। यही कारण है कि जीवन की आपाधापी में जहां भौतिक वस्तुओं की भरमार हो गई है, वहीं आत्मिक शांति, पारिवारिक संतुलन और रिश्तों की ऊष्मा खोती जा रही है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

हर सुबह की शुरुआत यदि आत्मचिंतन, प्रकृति के सान्निध्य और महापुरुषों की विचारधारा से हो, तो मन न केवल शुद्ध होता है, बल्कि भीतर से एक ऊर्जा का संचार भी होता है। ऐसे लोग दिन भर सकारात्मक, विनम्र और कर्मशील बने रहते हैं। यही मनोबल उन्हें कठिन परिस्थितियों में भी संतुलित रखता है।

हममें से अधिकांश लोग दूसरों को तुच्छ समझने की भूल कर बैठते हैं—कोई छोटा पद पर हो, विरोधी हो, या फिर कोई असहज प्रश्न उठाने वाला। लेकिन यह समझना चाहिए कि जैसे एक छोटा-सा सांप, एक छोटी बीमारी या एक हलकी-सी चिंगारी बड़ा नुकसान कर सकती है, वैसे ही किसी को कम आंकना कभी-कभी महंगी भूल साबित हो सकती है।

सच्ची शक्ति वही है जो किसी को नीचे गिराने के लिए नहीं, बल्कि स्वयं को ऊपर उठाने के लिए उपयोग में ली जाए। यदि आपके पास सामर्थ्य है, तो उसका उपयोग दूसरों को प्रोत्साहित करने, दिशा देने और समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए करें, न कि किसी की उपलब्धियों को नीचा दिखाने के लिए।

रिश्तों की सार्थकता “सारथ्य” में है, “स्वार्थ” में नहीं। जीवन में हम सभी कभी न कभी किसी रिश्ते के रथ के सारथी होते हैं – चाहे वह माता-पिता, मित्र, जीवनसाथी या सहयोगी का हो। यदि हम अपने स्वार्थ में अंधे होकर संबंधों को खींचतान में उलझा देते हैं, तो जीवन की यात्रा रुक जाती है। लेकिन यदि हम सारथी बनकर संयम, समर्पण और सहयोग से आगे बढ़ते हैं, तो न केवल मंजिल पाते हैं, बल्कि दूसरों के लिए प्रेरणा भी बनते हैं।

यहां “सुन लेना” एक कला है, और “सुना देना” अहंकार। समाज में अधिकतर समस्याएं इसलिए हैं क्योंकि हम सुनना नहीं चाहते, सिर्फ सुनाना चाहते हैं। जबकि यदि हम शांत रहकर सुनने की शक्ति विकसित कर लें, तो अनेक उलझाव स्वयं सुलझ जाते हैं।

जिस प्रकार तीखी धूप में भी सरोवर शांत बना रहता है, उसी प्रकार जीवन की तपिश में भी शांत, संयमी और सकारात्मक रहना एक आदर्श मनुष्य की पहचान है। हमें वही बनना है — जो विचारों से महान हो, कार्यों से आदर्श हो और संबंधों से विश्वसनीय।
अंततः यही कहें तो उचित होगा - "जिसने अपने भीतर की अशांति पर विजय पा ली, वही बाहर की दुनिया में बदलाव लाने की ताकत रखता है।

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