"आरटीई की असलियत: अधिकार नहीं, अपमान का दायित्व!"
✍️ संपादकीय
13 जुलाई 2025
*"आरटीई की असलियत: अधिकार नहीं, अपमान का दायित्व!"*
शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 (Right to Education Act - RTE) इस आशा और आकांक्षा का प्रतीक था कि देश का हर बच्चा, चाहे वह किसी भी जाति, धर्म, वर्ग या आर्थिक पृष्ठभूमि से क्यों न हो, समान शिक्षा प्राप्त करेगा। लेकिन आज जब हम जमीनी हकीकत पर नजर डालते हैं, तो यह अधिनियम केवल किताबों में लिखी एक कानूनी भाषा बन कर रह गया है। इसका उद्देश्य था—जरूरतमंद और आर्थिक रूप से पिछड़े परिवारों के बच्चों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ना, लेकिन आज वह मुख्यधारा ही उन्हें किनारे लगा रही है। यहां यदि मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
निजी स्कूलों में 25% आरक्षण का प्रावधान गरीब तबके के बच्चों को अच्छी शिक्षा की उम्मीद देता है, लेकिन यथार्थ में यही आरक्षण इन बच्चों के लिए अपमान और उपेक्षा का कारण बनता जा रहा है। कई स्कूलों में आरटीई के तहत पढ़ने वाले बच्चों को दूसरे दर्जे का नागरिक माना जाता है। उन्हें अलग बैठाया जाता है, उन्हें प्रतियोगिताओं में भाग लेने नहीं दिया जाता, और यहां तक कि शिक्षक और अभिभावक भी उन्हें “सरकारी खर्चे पर पढ़ने वाला” समझ कर तिरस्कार की दृष्टि से देखते हैं।
अभिभावक विरोध करे तो उसे 'असभ्य', 'असहयोगी' घोषित कर दिया जाता है। यह कैसा लोकतंत्र है जहाँ अधिकार मांगना ही अपराध बन जाए? क्या इस देश का संविधान, जो सभी को समानता का अधिकार देता है, इन बच्चों पर लागू नहीं होता?
दूसरी ओर, सरकारी स्कूलों की स्थिति भी किसी से छिपी नहीं है। वहाँ आज भी पौधारोपण, साफ-सफाई, किचन गार्डन जैसे ‘श्रमाधारित कार्यों’ को शिक्षा के नाम पर थोपा जा रहा है। क्या सरकारी स्कूलों में शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ शारीरिक श्रम सिखाना रह गया है? क्या इन बच्चों को केवल मजदूर और सफाई कर्मचारी बनाने की योजना है? वहीं दूसरी ओर, निजी स्कूलों में डिजिटल एजुकेशन, कोडिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और इंग्लिश मीडियम में ग्लोबल एजुकेशन मिल रही है। यह स्पष्ट रूप से दोहरी शिक्षा व्यवस्था है — एक अमीरों के लिए, दूसरी गरीबों के लिए।
शिक्षा में फैली यह संस्थागत असमानता और अपमानजनक व्यवहार एक प्रकार का 'शैक्षिक भ्रष्टाचार' है। और यह उस समय और भी अमानवीय हो जाता है जब बच्चों की स्कॉलरशिप को ही विद्यालय हड़प जाते हैं। एडमिशन किसी और का, पैसा किसी और के नाम पर। यह गरीब बच्चों की उम्मीदों की डकैती है।
आज जरूरत है इस विषय पर संवेदनशील और कठोर कदम उठाने की।
सरकार को चाहिए कि:
सभी आरटीई छात्र/छात्राओं की निगरानी के लिए स्वतंत्र प्राधिकरण बनाया जाए।
प्रत्येक विद्यालय में RTE पालन ऑडिट अनिवार्य हो।
ऐसे स्कूलों की मान्यता रद्द हो जो आरटीई छात्रों से भेदभाव करें।
सरकारी स्कूलों में भी तकनीकी, डिजिटल और करियर केंद्रित शिक्षा का विस्तार हो।
यदि हम वाकई समानता की बात करते हैं तो हमें यह समझना होगा कि शिक्षा केवल किताबें नहीं, एक गरिमा है, और हर बच्चे को यह गरिमा मिलनी चाहिए। वरना आने वाली पीढ़ी हमें माफ नहीं करेगी।
"अगर शिक्षा में ही भेदभाव होगा, तो समानता का सपना केवल भाषणों तक ही सीमित रहेगा।"
सरकार, समाज और शिक्षकों—सभी को आत्ममंथन करने की जरूरत है। वरना 'शिक्षा का अधिकार' नहीं, 'अधिकार का अपमान' बनकर रह जाएगा।
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