पीले रंग की परत में लिपटी लापरवाही- बाल वाहिनी की अनदेखी, युवाओं की सुरक्षा पर संकट

✍️ संपादकीय
11 जुलाई 2025
 *पीले रंग की परत में लिपटी लापरवाही* 
 *बाल वाहिनी की अनदेखी, युवाओं की सुरक्षा पर संकट* 

आज की शिक्षा व्यवस्था में विद्यालय केवल शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों का संगम हैं। एक बड़ी जिम्मेदारी बच्चों की सुरक्षित घर से स्कूल और स्कूल से घर वापसी है — यही वह कड़ी है, जिसे ‘बाल वाहिनी’ कहा जाता है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि इस सुरक्षा के नाम पर एनसीआर की नकारा और खटारा बसों को पीले रंग की पोताई देकर सजाया-संवारा जा रहा है, ताकि वे ‘कानूनी दिखावटी बाल वाहिनी’ का रूप धरकर रोज़ाना सैकड़ों बच्चों को लापरवाही की राह पर ढो सकें। 
बरसात का मौसम आते ही यह लापरवाही और भी भयावह रूप ले लेती है। फिसलती सड़कों पर जर्जर टायर, ब्रेक फेल होते वाहन, टूटे शीशे, दरवाजे में फंसी स्कूल यूनिफॉर्म, और ओवरलोडेड बसें—यह सब आज एक आम दृश्य बन गया है।
यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

अधिकांश निजी स्कूल ट्रांसपोर्ट के नाम पर उन वाहनों को शामिल कर रहे हैं, जो रिटायर हो चुके हैं, आरटीओ के मापदंडों से बाहर हैं, और जिनकी कंडिशन देख कर आम नागरिक भी अपने परिजन को उसमें नहीं बैठने देगा। लेकिन स्कूल प्रबंधन चमचमाते विज्ञापनों और पेरेंट्स को दिखाए जाने वाले चमकदार वाहनों की आड़ में बच्चों को खतरे के हवाले कर रहे हैं।

परिवहन विभाग की चुप्पी सबसे खतरनाक हिस्सा है।
जहाँ एक ओर हर बस को फिटनेस सर्टिफिकेट, ड्राइवर को विशेष परमिट और सहायक की नियुक्ति की सख्त आवश्यकता है, वहीं इन सभी नियमों का खुलेआम उल्लंघन हो रहा है। अधिकतर ड्राइवर बिना पुलिस वेरिफिकेशन के, बिना अनुभव और कभी-कभी नाबालिगों को बस सौंप दी जाती है। हेल्पर की जगह बच्चों से झोले पकड़वाए जाते हैं और यदि कोई विरोध करता है, तो उसे असहयोगी अभिभावक मान लिया जाता है।

एनसीआर से सस्ती और पुरानी बसें खरीदी जाती हैं, जो पहले ही स्क्रैप के लायक होती हैं। उन्हें ‘बाल वाहिनी’ का टैग दे दिया जाता है, और पेरेंट्स से हर माह मोटी रकम वसूली जाती है। ये बसें अक्सर ओवरलोड होती हैं, सीट बेल्ट जैसी सुरक्षा सुविधाएं नदारद होती हैं और कोई भी इमरजेंसी उपकरण इनमें नहीं होता।
बरसात के मौसम में यह संकट दोगुना हो जाता है। जलभराव, कीचड़, फिसलन, और दृश्यता की कमी में इन खटारा वाहनों का सड़क पर होना बच्चों के जीवन से खुला खिलवाड़ है। और जब कोई हादसा होता है, तो अधिकारी कहते हैं — “प्रथम दृष्टया चालक की लापरवाही प्रतीत होती है।”
लेकिन क्या कभी प्रशासन, आरटीओ और विद्यालयों की सांठगांठ पर सवाल उठता है?

 अब समय आ गया है कि बाल वाहिनी की सुरक्षा पर सिर्फ कागजों में नहीं, ज़मीनी स्तर पर काम हो।
हर स्कूल बस की फिटनेस, ड्राइवर की जांच, रूट तय, और रीयल टाइम मॉनिटरिंग आवश्यक हो।
हर अभिभावक को यह अधिकार होना चाहिए कि वे स्कूल ट्रांसपोर्ट का निरीक्षण कर सकें।

परिवहन विभाग की जवाबदेही तय हो — किसी भी लापरवाही पर निलंबन और जुर्माना हो।
क्योंकि जो वाहन बच्चों को लेकर चलता है, उसमें केवल उनका शरीर नहीं — उनके सपने, भविष्य और माता-पिता की उम्मीदें भी यात्रा करती हैं।
और उन उम्मीदों को झूठी सुरक्षा की परत में लपेटकर सड़क पर उतार देना न केवल गैर-जिम्मेदारी है, बल्कि यह एक सामाजिक अपराध है।
जब तक बाल वाहिनी के नाम पर पीला रंग केवल दिखावा रहेगा, तब तक यह व्यवस्था एक दिन किसी बच्चे की जिंदगी छीन लेगी।

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