धार्मिक उन्माद नहीं, सामाजिक सद्भाव चाहिए – अनुशासन और आत्मचिंतन समय की मांग"
संपादकीय
25 जुलाई 2025
*"धार्मिक उन्माद नहीं, सामाजिक सद्भाव चाहिए – अनुशासन और आत्मचिंतन समय की मांग"*
वर्तमान समय में आस्था और अंधभक्ति के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है। विशेषकर श्रावण मास में कांवड़ यात्रा जैसे धार्मिक आयोजनों का स्वरूप जिस प्रकार से विकृत होता जा रहा है, वह केवल चिंताजनक नहीं, बल्कि सामाजिक ताने-बाने के लिए घातक भी है। धार्मिक विश्वास व्यक्ति की निजता का विषय है, न कि उसे प्रदर्शन का माध्यम बनाकर दूसरों के अधिकारों और स्वतंत्रता पर हमला करने का। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
कांवड़ चढ़ाने की आड़ में ‘नेतागिरी’चमकने और धार्मिक ‘उन्माद’फैलाने जैसे पिछले कुछ वर्षों में कांवड़ यात्रा का जो रूप सामने आया है, वह किसी धार्मिक साधना का नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन, शोर-शराबा, डीजे, आतिशबाजी, ड्रेस कोड, बाइक रैली और सोशल मीडिया स्टंट का बनकर रह गया है। यह और भी शर्मनाक तब हो जाता है जब कुछ लोग इस धार्मिक यात्रा को ‘जाति श्रेष्ठता’ या ‘धर्म रक्षा’ के नाम पर इस्तेमाल कर समाज में विषाक्त पैदा करते हैं। जो लोग दुष्प्रचार और हिंसा को उकसाने का माध्यम बना रहे हैं। ऐसे लोगों के खिलाफ एक्शन हो।
जब मंदिर रात को खुलवाया गया है। कानूनी अधिकारों का दुरुपयोग करना क्या औचित्यपूर्ण है। एक ताजा उदाहरण सामने आया जिसमें कुछ युवकों ने डाक कांवड़ चढ़ाने के लिए आधी रात को मंदिर खोलने की मांग की और पुलिस सुरक्षा की आड़ लेकर हंगामा किया। यह केवल अनुशासनहीनता नहीं, बल्कि धार्मिक उन्माद और सामाजिक विद्वेष फैलाने की कोशिश है। ऐसे कृत्य किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं हो सकते। प्रशासन को चाहिए कि इस तरह की घटनाओं को केवल ‘युवा जोश’ या ‘धार्मिक उत्साह’ कहकर नजरअंदाज न करें, बल्कि इन पर सख्त कार्रवाई करे।
वंचित वर्ग की दिशा-भ्रमित पीढ़ी
सबसे अधिक पीड़ा तब होती है जब समाज का मेहनतकश वर्ग—जो सदियों से शोषण और उपेक्षा का शिकार रहा है—अपने बच्चों को पढ़ाई-लिखाई और कर्मशीलता की राह पर भेजने के बजाय धार्मिक अंधानुकरण की भीड़ में धकेल देता है। किसान के बेटे को जहां खेतों में मदद करनी चाहिए, वहां वह बाइक रैली में शामिल होकर डीजे पर नाचता हुआ 'कांवड़िए' बनने की होड़ में शामिल हो जाता है।
क्या यह आस्था है? या दिखावा?
यदि यह सच्ची आस्था होती, तो इसे शांत भाव से, सेवा और तपस्या के रूप में किया जाता। न कि डीजे की धुन, पिकअप वाहनों की रैली और आतिशबाजियों के साथ। आस्था में करुणा होती है, संयम होता है, लेकिन आज की कांवड़ यात्रा में उन्माद, शोर और अहंकार भरा जा रहा है।
प्रशासन और समाज की जिम्मेदारी बनती है कि धार्मिक आयोजनों के नाम पर अनुशासनहीनता फैलाना और सामाजिक द्वेष को बढ़ावा देना एक तरह से दंगा भड़काने जैसा ही कृत्य है। पुलिस और प्रशासन को ऐसे मामलों में केवल ‘भीड़ प्रबंधन’ तक सीमित नहीं रह जाना चाहिए, बल्कि धार्मिक उन्माद फैलाने वालों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही सुनिश्चित करनी चाहिए। वहीं सामाजिक संगठनों, शिक्षकों, बुद्धिजीवियों और जिम्मेदार नागरिकों को चाहिए कि वे अपने समाज के युवाओं को समझाएं कि धार्मिक प्रदर्शन से नहीं, कर्मठ जीवन और शिक्षा से समाज का उत्थान होता है।
समाज को चाहिए कि वह धार्मिक आस्था और उन्माद में अंतर समझे। किसी को मंदिर में जबरन घुसने, शोर मचाने और दूसरों की आस्था को अपमानित करने का अधिकार नहीं है। और यदि यह सब केवल ‘सोशल मीडिया स्टंट’ या ‘राजनीतिक चमक’ के लिए किया जा रहा है, तो यह और भी निंदनीय है। वंचित समाज को चाहिए कि वह खुद को ऐसे ढोंगों से दूर रखे, मेहनत और शिक्षा को प्राथमिकता दे और सामाजिक सौहार्द को बचाए रखने में अग्रणी भूमिका निभाए।
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