सामाजिक समरसता को खंडित करने वाली राजनेताओं की ओछी हरकतें
संपादकीय-
9 अप्रैल 2025।
*सामाजिक समरसता को खंडित करने वाली राजनेताओं की ओछी हरकतें*
हाल ही में रामनवमी के दिन प्रतिपक्ष नेता टीकाराम जूली के मंदिर प्रवेश पर भाजपा नेता ज्ञान देव आहूजा द्वारा गंगाजल छिड़कने और उससे जुड़ी असौभनीय टिप्पणी ने भारतीय लोकतंत्र और सामाजिक समरसता पर एक बार फिर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। यह घटना केवल एक राजनेता के अपमान तक सीमित नहीं, बल्कि यह भारतीय संविधान की आत्मा — सामाजिक समानता और अस्पृश्यता उन्मूलन — को सीधी चुनौती देती है।
जिस देश में बाबा साहेब अंबेडकर ने अस्पृश्यता के खिलाफ संघर्ष कर संविधान की रचना की, वहां आज भी जातिवाद की छाया में राजनीति करना न केवल निंदनीय है बल्कि समाज को पीछे ले जाने वाला कृत्य भी है। यह घटना यह स्पष्ट करती है कि सत्ता की राजनीति अब भी सामाजिक भेदभाव के जहर से अछूती नहीं है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
राजनीति में वैचारिक मतभेद होना स्वाभाविक है, परंतु धार्मिक स्थलों को घृणा और अपमान का माध्यम बनाना भारतीय संस्कृति और लोकतंत्र दोनों के विरुद्ध है। मंदिर सभी के लिए हैं — आस्था, समानता और समरसता के प्रतीक। यदि वहां पर भी जातिगत भेदभाव का प्रदर्शन किया जाए, तो यह केवल व्यक्तिगत अपमान नहीं बल्कि सामूहिक चेतना का भी अपमान है।
राजनीतिक दलों को चाहिए कि वे ऐसी घटनाओं की स्पष्ट रूप से भर्त्सना करें, दोषियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करें और यह सुनिश्चित करें कि भारतीय राजनीति में इंसानियत और समानता के मूल्य सर्वोपरि रहें। समाज को भी अब ऐसी मानसिकताओं के खिलाफ एकजुट होकर खड़ा होना होगा, क्योंकि लोकतंत्र केवल वोट से नहीं, विचारों और व्यवहार से भी बनता है।
भारत, जो विविधताओं में एकता के विचार पर खड़ा हुआ है, वहां आज भी कुछ राजनीतिक मानसिकताएं ऐसी हैं जो समाज को तोड़ने की पुरानी, घिसी-पिटी चालें अपनाने से बाज नहीं आतीं। ताजा मामला प्रतिपक्ष के नेता टीकाराम जूली के मंदिर प्रवेश के बाद भाजपा नेता ज्ञानदेव आहूजा द्वारा गंगाजल छिड़कने और अपमानजनक टिप्पणी करने का है। यह घटना न सिर्फ संविधान की मूल भावना के खिलाफ है, बल्कि यह सामाजिक चेतना के लिए भी एक खतरे की घंटी है।
भारत ने अस्पृश्यता के दंश को सदियों तक झेला है। जातिगत भेदभाव, मंदिरों से बहिष्कार, पानी के कुओं तक पहुंच की मनाही — ये सब हमारे इतिहास के काले पन्ने हैं। स्वतंत्रता संग्राम के समय महात्मा गांधी ने 'हरिजन आंदोलन' चलाया और बाबा साहेब अंबेडकर ने संविधान में अस्पृश्यता को अपराध घोषित किया। लेकिन दुख की बात है कि आज भी कुछ तथाकथित असभ्य नेता इन्हीं पुरानी रूढ़ियों को जी रहे हैं।
राजनीति में जाति का ज़हर घोलने वाले नेता समाज के ताने-दाने को दूषित करने में तुले हुए हैं। क्योंकि भारत की राजनीति में जाति एक संवेदनशील मुद्दा है। लेकिन जब इसका इस्तेमाल किसी व्यक्ति को अपमानित करने के लिए किया जाता है, तो वह राजनीति नहीं, बल्कि सामाजिक विष का प्रसार बन जाती है। टीकाराम जूली का मंदिर प्रवेश और उसके बाद किया गया ‘शुद्धिकरण’ इस बात का प्रमाण है कि राजनीतिक असहमति अब व्यक्तिगत और जातिगत स्तर पर गिर चुकी है।
यह केवल एक नेता की नहीं, बल्कि उस पूरे वर्ग की मानसिकता को दर्शाता है जो यह मानता है कि सामाजिक पदानुक्रम अभी भी जीवित रहना चाहिए — चाहे वह धर्म के नाम पर हो या राजनीति के नाम पर।
वैसे देखा जाए तो आजकल मंदिर: आस्था के नहीं, अब राजनीति के मंच बन गए हैं।
मंदिर सदियों से आस्था, समानता और आत्मिक शांति के केंद्र रहे हैं। वे समाज को जोड़ने का कार्य करते हैं। लेकिन जब वहां ‘शुद्धिकरण’ जैसी घटनाएं होती हैं, तो सवाल यह उठता है कि क्या ये धार्मिक स्थल अब राजनीतिक एजेंडे का मंच बनते जा रहे हैं?
मंदिर में किसी व्यक्ति की जाति, विचारधारा या राजनीतिक पहचान के आधार पर अपमान करना, उसे अछूत समझना — यह न केवल धार्मिक मर्यादा का उल्लंघन है, बल्कि समाज को बांटने की एक खतरनाक कोशिश भी है।
ऐसी घटनाओं पर मौन सहमति भी दोष है। क्योंकि इस तरह की घटनाओं पर अगर समाज चुप रहता है, राजनीतिक दल कोई ठोस कार्रवाई नहीं करते, और जनता इसे एक ‘मामूली बात’ मानकर नजरअंदाज कर देती है, तो यह चुप्पी भी उतनी ही दोषी मानी जाएगी जितना कि बयान देने वाला नेता।
आज जरूरत है कि राजनीतिक दल केवल बयानबाज़ी न करें, बल्कि अपने दलों के भीतर ऐसी मानसिकता रखने वाले लोगों को बाहर का रास्ता दिखाएं। साथ ही, समाज को भी इस तरह की घटनाओं पर खुलकर विरोध करना चाहिए — चाहे वह किसी भी पार्टी या व्यक्ति द्वारा की गई हो।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारा संविधान हर नागरिक को समान अधिकार देता है — बिना किसी जाति, धर्म, या वर्ग भेद के। ऐसी घटनाएं हमें बताती हैं कि सामाजिक समरसता को केवल कागजों पर नहीं, व्यवहार और मानसिकता में भी उतारना ज़रूरी है।
आज का भारत युवाओं का भारत है, तकनीक का भारत है, विज्ञान, कला और उद्यमिता का भारत है। यहां जातिगत भेदभाव के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। हमें न केवल ऐसी घटनाओं की निंदा करनी चाहिए, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि भविष्य में ऐसी सोच पनपने न पाए।
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