पहलगाम की चीख: क्या अब भी हम नहीं जागेंगे?
संपादकीय
27 अप्रैल 2025।
*पहलगाम की चीख: क्या अब भी हम नहीं जागेंगे?*
पहलगाम... जहां बर्फ की सफेदी भी आज लहू के धब्बों से दागदार है।
जहां खुशियों की चहकती आवाजें अब सिसकियों में बदल चुकी हैं।
जहां जिंदगी कुछ देर और इंतजार कर सकती थी — काश, अगर सुरक्षा होती, काश अगर समय पर मदद पहुंचती। जरूर यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे बोलता है।
आज सरकार ने पहली बार अपनी गलती मानी है। यह साहस का नहीं, जिम्मेदारी का पहला कदम है। लेकिन क्या इतना ही काफी है? क्या हम सिर्फ गलती स्वीकार कर के आगे बढ़ जाएंगे, जैसे कुछ हुआ ही नहीं?
जनवरी 2025 तक दो यूनिट CRPF की तैनाती वहां थी। किसने हटाया उन्हें? क्यों हटाया जब इनपुट मौजूद थे?
कौन है इस निर्णय का जिम्मेदार?
इन सवालों के जवाब आज हर भारतीय नागरिक जानना चाहता है — क्योंकि कल को यह लापरवाही किसी और के घर उजाड़ सकती है, किसी और मां की गोद सूनी कर सकती है।
सबसे दुखद पहलू ये है कि कुछ लोगों को अगर समय पर इलाज मिला होता, तो वे आज भी जिंदा होते। डेढ़ घंटे तक न कोई एंबुलेंस पहुँची, न कोई राहत।
क्या हमारी संवेदनाएं भी इस कदर मर चुकी हैं कि हम इंतजार करते रहे... और जिंदगी हमारी उंगलियों से फिसलती रही?
पहलगाम की घटना ने हमारे सिस्टम के हर लूपहोल को उधेड़ कर दिखा दिया है — सुरक्षा में चूक, आपदा प्रबंधन की असफलता, चिकित्सा सुविधाओं की कमी, और हमारी प्रशासनिक उदासीनता।
यह महज एक हादसा नहीं, एक सिस्टम का चरम पतन है।
हम जानते हैं, जानें लौट कर नहीं आतीं। लेकिन क्या हम उन परिवारों को न्याय नहीं दे सकते जिनकी दुनिया उजड़ गई? क्या हम उन्हें मुआवजा, सरकारी नौकरी और एक सम्मानजनक भविष्य नहीं दे सकते? कम से कम उनकी पीड़ा का कुछ बोझ तो बांट सकते हैं।
आज हमें भगत सिंह का वह ऐतिहासिक कथन याद करना चाहिए — "भारत में इतनी जातियां, भाषाएं, संस्कृतियाँ हैं कि इन्हें जोड़े रखना आसान नहीं है। अगर हम सचेत नहीं हुए तो आज़ादी के बाद भी हम शोषित और भ्रष्ट मुल्क बनकर रह जाएंगे।"
जो लोग आज भी जाति, धर्म, भाषा, पार्टी के चश्मे से सच्चाई को देखने से इनकार कर रहे हैं — उनसे एक ही विनती है:
राष्ट्र सबसे ऊपर है।
ना जाति, ना धर्म, ना पार्टी — सिर्फ भारत।
अगर भारत है तो हम हैं। अगर भारत सुरक्षित है तो हम सुरक्षित हैं।
पहलगाम की चीख को सिर्फ समाचारों तक मत सीमित करिए।
इसे अपने दिलों में बसाइए। अपनी चेतना में जगह दीजिए।
और सरकार से माँग करिए —
जांच हो, दोषियों को सजा मिले, पीड़ितों को न्याय मिले, और भविष्य के लिए ऐसी चूकें न दोहराई जाएं।
वरना अगला पहलगाम बहुत दूर नहीं।
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