डिग्रीधारी चपरासी – भारत के युवाओं की मजबूरी या सिस्टम की विफलता?"
संपादकीय
25 अप्रैल 2025
*"डिग्रीधारी चपरासी – भारत के युवाओं की मजबूरी या सिस्टम की विफलता?"*
भारत को विश्व का सबसे युवा देश कहा जाता है। लेकिन इसी युवा भारत की सबसे बड़ी त्रासदी आज उसकी बेरोजगारी बन गई है। एक हालिया उदाहरण ने इस सच्चाई को फिर से उजागर कर दिया है – राजस्थान में चपरासी की मात्र 53,749 भर्तियों के लिए 24 लाख 76 हजार से अधिक युवाओं ने आवेदन किया। इनमें MBA, PHD, MA, MSc, MCA, M.Ed, B.Ed और यहां तक कि कानून की पढ़ाई करने वाले अभ्यर्थी भी शामिल हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
यह सिर्फ एक आकड़ा नहीं है, यह उस टूटते हुए विश्वास की तस्वीर है, जो इस देश का युवा वर्षों से संजोए बैठा था – कि शिक्षा से नौकरी मिलेगी, नौकरी से सम्मान मिलेगा और सम्मान से भविष्य बनेगा। लेकिन आज वही युवा, जिनके कंधों पर राष्ट्र निर्माण की जिम्मेदारी थी, सरकारी इमारतों में चाय और फाइलें उठाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
*83% बेरोजगारी में युवा – क्या यही था वादा?*
एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत के बेरोजगारों में 83% हिस्सेदारी युवाओं की है। यह आँकड़ा चौंकाने वाला नहीं, शर्मनाक है। यह सिर्फ सरकारी व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि उस राजनीतिक बेईमानी की पोल भी खोलता है, जहां सत्ता में आने से पहले "हर साल 2 करोड़ नौकरियां" देने का वादा किया गया था।
लेकिन वह वादा एक ‘चुनावी जुमला’ निकला – जैसा खुद भाजपा के वरिष्ठ नेता कह चुके हैं। सवाल यह नहीं है कि नौकरियां क्यों नहीं आईं, सवाल यह है कि क्यों आज तक कोई जवाबदेही तय नहीं की गई? क्यों देश का नेतृत्व युवाओं को ‘स्टार्टअप’ या ‘पकौड़े बेचने’ जैसे बयान देकर तिरस्कार करता रहा?
*डिग्री है, लेकिन रोजगार नहीं*
आज स्थिति यह है कि एक PHD धारक युवा 18 हजार की चपरासी की नौकरी के लिए आवेदन करता है, और उसकी डिग्री कोई मायने नहीं रखती। शिक्षा और रोजगार के बीच की खाई इतनी गहरी हो चुकी है कि दोनों अब अलग-अलग रास्तों पर चल रहे हैं।
सरकारी नौकरियों में भर्ती प्रक्रिया वर्षों तक अटकी रहती है, परिणाम घोषित नहीं होते, और निजी क्षेत्र में तो रोजगार का स्वरूप ही अस्थिर है। जहां काम है, वहां सम्मान नहीं; जहां सम्मान है, वहां काम नहीं।
*युवा की आह बनती जा रही है तंत्र की सज़ा।*
आज का युवा न केवल बेरोजगार है, बल्कि मानसिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से भी टूटता जा रहा है। उसके सपनों का दम घुट रहा है, उसकी आकांक्षाएं प्रशासनिक लापरवाही और राजनीतिक वादों की भेंट चढ़ रही हैं। एक डिग्रीधारी युवा जब चपरासी बनने को मजबूर होता है, तो असल में वह पूरे सिस्टम पर एक तमाचा होता है – लेकिन सुनने वाला कोई नहीं।
सरकार को चाहिए कि वह केवल घोषणाओं और योजनाओं से आगे बढ़कर जमीन पर रोजगार निर्माण की ठोस नीतियां बनाए। शिक्षा नीति को रोजगार से जोड़ा जाए, और युवाओं की ऊर्जा को सिर्फ भाषणों में नहीं, योजनाओं और अवसरों में रूपांतरित किया जाए।
देश तब आगे बढ़ेगा जब उसका युवा आगे बढ़ेगा – और वह तभी संभव है जब उसे रोजगार मिलेगा, सम्मान मिलेगा और आत्मनिर्भरता मिलेगी।
भारत की युवा शक्ति आज चपरासी की लाइन में खड़ी है – यह एक खबर नहीं, एक चेतावनी है। अगर अब भी व्यवस्था नहीं चेती, तो यह पीढ़ी व्यवस्था में भरोसा खो देगी, और जब युवा हार मान लेता है – तो राष्ट्र की आत्मा भी थक जाती है।
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